इलाहाबाद हाईकोर्ट यूपी पुलिस से नाराज, DGP को व्यक्तिगत पेशी का आदेश, जानिए पूरा मामला

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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालती आदेश के अनुपालन में कथित देरी को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। हत्या के एक मामले में जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पूर्व में मांगे गए जवाबी हलफनामे के दाखिल न होने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि यदि न्यायालय के निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है तो यह गंभीर विषय है। अदालत ने पुलिस की कथित अनिच्छा को लेकर भी सवाल उठाए।

यह मामला आरोपी पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू की जमानत अर्जी से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान घटना के बताए गए समय और CCTV फुटेज में दिखाई दे रहे समय के बीच अंतर का मुद्दा भी सामने आया। इसी संबंध में अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाबी हलफनामा मांगा था, लेकिन निर्धारित प्रक्रिया के बावजूद जवाब दाखिल नहीं किया गया।

हत्या के मामले में जमानत अर्जी पर सुनवाई

इलाहाबाद हाईकोर्ट में पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान मामले से जुड़े तथ्यों पर चर्चा हुई। अदालत के सामने घटना के समय और CCTV फुटेज में दर्ज समय को लेकर अंतर का मुद्दा महत्वपूर्ण माना गया।

अदालत ने इससे पहले राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा था। कोर्ट के निर्देश के बावजूद जब जवाबी हलफनामा प्रस्तुत नहीं हुआ तो सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि आखिर न्यायालय के आदेश का अनुपालन क्यों नहीं किया गया।

इस पर सरकारी पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित अधिकारियों को दो बार पत्र भेजे गए थे। इसके बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं हो सका।

कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान अदालत ने अदालती आदेशों के अनुपालन में कथित देरी को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्यायालय के निर्देशों को समय पर पूरा किया जाना चाहिए।

अदालत की नाराजगी का मुख्य कारण यह रहा कि पहले से दिए गए निर्देश के बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया था। सरकारी वकील द्वारा अधिकारियों को पत्र भेजे जाने की जानकारी दिए जाने के बाद भी कोर्ट ने स्थिति को संतोषजनक नहीं माना।

हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के DGP को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली कार्यवाही में पुलिस महानिदेशक की उपस्थिति महत्वपूर्ण होगी।

CCTV फुटेज के समय को लेकर उठे सवाल

मामले में CCTV फुटेज भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना। अदालत ने घटना के बताए गए समय और 21 जून 2025 की CCTV फुटेज में दिखाई दे रहे समय के बीच अंतर को लेकर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था।

कोर्ट ने इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य यह समझना था कि रिकॉर्ड में दर्ज अलग-अलग समय के पीछे वास्तविक स्थिति क्या है।

ऐसे मामलों में CCTV फुटेज जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। इसलिए अदालत द्वारा संबंधित समय के अंतर को लेकर स्पष्टीकरण मांगा जाना मामले की सुनवाई के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

16 जुलाई 2026 के आदेश का मामला

अदालत ने 16 जुलाई 2026 को घटना के बताए गए समय और CCTV फुटेज में दर्ज समय के अंतर पर राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा था। इसके लिए जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था।

हालांकि, अगली कार्यवाही तक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि संबंधित अधिकारियों को दो बार पत्र भेजे गए थे, लेकिन इसके बावजूद जवाब अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं हो सका।

इसके बाद अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस प्रशासन के उच्च स्तर पर जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाया।

‘Reluctance’ पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अदालती आदेशों के पालन को लेकर यूपी पुलिस की कथित ‘reluctance’ यानी अनिच्छा पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय माना।

कोर्ट की टिप्पणी का केंद्र यह था कि यदि किसी न्यायिक आदेश के अनुपालन में लगातार देरी होती है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होना जरूरी है।

अदालत ने इसी संदर्भ में DGP को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया। यह आदेश पुलिस विभाग के लिए न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन की गंभीरता को रेखांकित करता है।

‘कोर्ट का घोर अपमान’ टिप्पणी का संदर्भ

सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से न्यायालय के आदेशों के पालन को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की गई। रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने इसे “यह कोर्ट का घोर अपमान है” जैसे कड़े शब्दों में संबोधित किया।

यह टिप्पणी उस स्थिति के संदर्भ में सामने आई, जब अदालत के निर्देश के बावजूद आवश्यक जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया था। हालांकि, इस टिप्पणी का पूरा कानूनी संदर्भ अदालत के विस्तृत आदेश से ही स्पष्ट होगा।

न्यायिक प्रक्रिया में समय पर जवाब दाखिल करना और अदालत के निर्देशों का पालन करना संबंधित पक्षों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में हाईकोर्ट की नाराजगी को इसी प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जा रहा है।

DGP की व्यक्तिगत पेशी क्यों महत्वपूर्ण?

किसी मामले में पुलिस महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश सामान्य प्रक्रिया से अलग एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम माना जाता है। इसका उद्देश्य संबंधित मामले में पुलिस प्रशासन का पक्ष सीधे अदालत के सामने रखना हो सकता है।

इस मामले में DGP की व्यक्तिगत पेशी के जरिए अदालत यह जानना चाह सकती है कि आदेश के अनुपालन में देरी क्यों हुई और संबंधित अधिकारियों ने जवाबी हलफनामा समय पर क्यों दाखिल नहीं किया।

इसके अलावा, अदालत की ओर से आगे की प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक निर्देश भी दिए जा सकते हैं।

न्यायालय के आदेशों का पालन जरूरी

कानूनी प्रक्रिया में अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों का समयबद्ध तरीके से पालन महत्वपूर्ण होता है। खासकर आपराधिक मामलों में दस्तावेज, CCTV फुटेज और जांच से जुड़े तथ्यों को समय पर अदालत के सामने रखना सुनवाई के लिए जरूरी हो सकता है।

ऐसे में यदि किसी कारण से जवाब दाखिल करने में देरी होती है तो संबंधित पक्ष को अदालत को इसकी स्पष्ट जानकारी देनी होती है। इस मामले में सरकारी पक्ष की ओर से दो पत्र भेजे जाने की जानकारी दी गई, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना।

अब आगे की सुनवाई में इस बात पर नजर रहेगी कि DGP अदालत के समक्ष क्या पक्ष रखते हैं और हाईकोर्ट इस मामले में आगे क्या निर्देश जारी करता है।

आगे की सुनवाई पर रहेगी नजर

फिलहाल मामला अदालत के समक्ष विचाराधीन है और आरोपी की जमानत अर्जी पर अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई के दौरान लिया जाएगा। साथ ही CCTV फुटेज के समय में अंतर और जवाबी हलफनामे से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालती आदेश के अनुपालन में कथित देरी को गंभीरता से लेते हुए यूपी पुलिस के DGP को व्यक्तिगत पेशी का निर्देश दिया है। अदालत की नाराजगी के बाद अब पुलिस प्रशासन की ओर से मामले में क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है, यह आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा।

यह मामला न्यायालय के आदेशों के समयबद्ध अनुपालन और जांच से जुड़े दस्तावेजों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, मामले के अंतिम निष्कर्ष के लिए अदालत के आगे के आदेश और सुनवाई का इंतजार करना होगा।

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