सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिरासत में लेते ही शुरू होगी 204 घंटे की समयसीमा, पुलिस की मनमानी पर लगेगी लगाम
रिपोर्ट- अनुग्रह देवी
नई दिल्ली। देश की न्याय व्यवस्था और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से ही गिनी जाएगी। पुलिस द्वारा गिरफ्तारी को सरकारी दस्तावेजों में दर्ज करने के समय से यह समयसीमा शुरू नहीं होगी। इस फैसले से पुलिस हिरासत में रखे जाने वाले लोगों के संवैधानिक अधिकारों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा संदेश है कि जांच एजेंसियां औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके किसी व्यक्ति को अतिरिक्त समय तक हिरासत में नहीं रख सकतीं। इसके साथ ही अदालत ने गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर करने की कोशिश को असंवैधानिक करार दिया है।
अनुच्छेद 22(2) के तहत मिली संवैधानिक सुरक्षा को किया स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इस प्रावधान के अनुसार, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
हालांकि, इस अवधि की गणना करते समय गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय शामिल नहीं किया जाता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में रखकर पूछताछ, जांच, तलाशी या जब्ती की कार्रवाई करती है और बाद में उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाती है, तो इस बीच का समय 24 घंटे की समयसीमा से बाहर नहीं रखा जा सकता। यानी व्यक्ति की स्वतंत्रता जिस समय वास्तव में प्रतिबंधित होती है, उसी समय से संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है।
त्रिपुरा के NDPS मामले में आया महत्वपूर्ण फैसला
यह फैसला त्रिपुरा से जुड़े एक नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (NDPS) मामले में चार आरोपियों की अपील पर आया है। इन आरोपियों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
मामले के अनुसार, चारों आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था। हालांकि, पुलिस रिकॉर्ड में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दिखाई गई।
इस तरह वास्तविक हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच लगभग 21 घंटे का अंतर था। आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि इस अवधि को भी संवैधानिक 24 घंटे की समयसीमा में शामिल किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि 24 घंटे की गणना 29 सितंबर को दोपहर 2 बजे से ही की जानी चाहिए थी। अदालत ने पाया कि आरोपियों को निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने चारों आरोपियों की तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
मजिस्ट्रेट की भी होगी अहम जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केवल पुलिस की जिम्मेदारी तय नहीं की, बल्कि मजिस्ट्रेट की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया है। अदालत के अनुसार, जब किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए तो मजिस्ट्रेट को उसकी वास्तविक हिरासत की तारीख और समय दर्ज करना चाहिए।
इसके बाद यह स्वतंत्र रूप से जांचना होगा कि संबंधित व्यक्ति को संवैधानिक समयसीमा के भीतर अदालत में पेश किया गया है या नहीं।
यदि हिरासत की अवधि 24 घंटे से अधिक हो जाती है और इस दौरान व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि 24 घंटे की निर्धारित अवधि के भीतर भी हिरासत अनावश्यक रूप से लंबी नहीं होनी चाहिए। यदि परिस्थितियों को देखते हुए हिरासत की अवधि अनुचित पाई जाती है, तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकता है।
पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?
इस फैसले से पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को अपनी कार्यप्रणाली में संवैधानिक प्रावधानों का सख्ती से पालन करना होगा। अब किसी व्यक्ति को पूछताछ या जांच के नाम पर हिरासत में रखकर औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करना कानूनी चुनौती का आधार बन सकता है।
दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 22 नागरिकों को मनमानी गिरफ्तारी और लंबे समय तक बिना न्यायिक निगरानी के हिरासत में रखे जाने से सुरक्षा प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी संवैधानिक भावना को मजबूत करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कागजी औपचारिकताओं को वास्तविक परिस्थितियों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में अहम कदम
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और कानून के शासन को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि पुलिस किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने के वास्तविक समय को छिपाकर संवैधानिक समयसीमा को प्रभावित न कर सके।
अदालत ने साफ कर दिया है कि कानून के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। यह फैसला न केवल आरोपियों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की जवाबदेही को भी रेखांकित करता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि गिरफ्तारी की तारीख और समय कागजों में बदलने से हिरासत की वास्तविक अवधि नहीं बदल सकती। नागरिकों की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

