प्रयागराज: समय से पहले रिहाई पर इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला, राज्यपाल की शक्ति पर कही अहम बात
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को सजा में छूट देने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इस संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मामले में निर्णय लेने से पहले उपलब्ध रिकॉर्ड और वास्तविक तथ्यों की सही तरीके से जांच करना आवश्यक है।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने राम प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने समय से पहले रिहाई की अर्जी को खारिज करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग निर्धारित नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। यदि रिकॉर्ड में कोई महत्वपूर्ण तथ्य गलत दर्ज हो या मामले से जुड़े वास्तविक तथ्यों पर पर्याप्त विचार न किया गया हो, तो केवल उसी आधार पर किसी व्यक्ति की समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती।
अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की शक्ति पर टिप्पणी
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को कुछ मामलों में सजा को माफ करने, कम करने या उसमें छूट देने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस शक्ति के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है।
अदालत के अनुसार, संवैधानिक शक्ति होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका इस्तेमाल बिना तथ्यों और रिकॉर्ड की जांच के किया जा सकता है। इसके लिए संबंधित मामले के दस्तावेजों, जेल रिकॉर्ड और अन्य आवश्यक तथ्यों का सही तरीके से परीक्षण किया जाना जरूरी है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि समय से पहले रिहाई की अर्जी पर निर्णय लेते समय रिकॉर्ड में दर्ज जेल अवधि को लेकर गंभीर समस्या सामने आई। इसी वजह से अदालत ने संबंधित आदेश को उचित नहीं माना और उसे निरस्त कर दिया।
समय से पहले रिहाई की अर्जी पर फिर से विचार का निर्देश
राम प्रताप सिंह की ओर से समय से पहले रिहाई के लिए आवेदन किया गया था। हालांकि, उनकी अर्जी को खारिज कर दिया गया था। इसके बाद मामले को हाईकोर्ट के सामने चुनौती दी गई।
याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मामले से जुड़े रिकॉर्ड और तथ्यों को रखा गया। सुनवाई के दौरान जेल में बिताई गई अवधि के रिकॉर्ड में कथित रूप से गलत जानकारी दर्ज होने का मुद्दा भी सामने आया।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की समय से पहले रिहाई से जुड़े मामले में निर्णय लेते समय जेल में बिताई गई वास्तविक अवधि सहित सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का सही होना आवश्यक है।
इसके बाद कोर्ट ने 26 जून 2025 को पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज की गई थी।
जेल अवधि गलत दर्ज होने पर कोर्ट की नाराजगी
मामले की सुनवाई के दौरान जेल अवधि से जुड़े रिकॉर्ड में गलती का मुद्दा सामने आया। हाईकोर्ट ने इस पर गंभीर नाराजगी जताई और कहा कि किसी व्यक्ति की रिहाई से संबंधित निर्णय गलत रिकॉर्ड के आधार पर नहीं लिया जा सकता।
दरअसल, समय से पहले रिहाई के मामलों में जेल में बिताई गई अवधि महत्वपूर्ण आधारों में से एक होती है। इसलिए रिकॉर्ड में दर्ज अवधि और वास्तविक अवधि के बीच अंतर होने पर निर्णय प्रभावित हो सकता है।
ऐसे में हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि मामले के सभी संबंधित रिकॉर्ड और तथ्यों की दोबारा जांच की जाए। इसके बाद नियमों के अनुसार नए सिरे से निर्णय लिया जाए।
मनमाने तरीके से नहीं हो सकती संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को मिली शक्ति महत्वपूर्ण संवैधानिक शक्ति है, लेकिन इसका प्रयोग निर्धारित प्रक्रिया और सही तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
अदालत का यह रुख संवैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल में पारदर्शिता और नियमों के पालन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। किसी भी मामले में निर्णय लेते समय संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों की जांच जरूरी है।
इसके अलावा, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड की अनदेखी करके या गलत जानकारी के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा।
सरकार को एक महीने में फैसला लेने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से देखने का निर्देश देते हुए सरकार के लिए समय सीमा भी तय की है। अदालत ने कहा है कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर मामले पर नए सिरे से फैसला लिया जाए।
इसका मतलब है कि संबंधित प्राधिकारी को अब राम प्रताप सिंह की समय से पहले रिहाई की अर्जी पर दोबारा विचार करना होगा। इस दौरान सभी उपलब्ध रिकॉर्ड, जेल में बिताई गई अवधि और मामले से जुड़े अन्य प्रासंगिक तथ्यों की जांच करनी होगी।
इसके बाद नियमानुसार निर्णय लिया जाएगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश के माध्यम से यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है कि फैसला सही तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर हो।
26 जून 2025 का आदेश हुआ निरस्त
हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की अर्जी को खारिज करने वाले 26 जून 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद अब संबंधित मामले में नए सिरे से प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर समय से पहले रिहाई का आदेश नहीं दिया है। अदालत ने सरकार को मामले पर दोबारा विचार करके नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
इस अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट का फैसला संबंधित अर्जी को खारिज करने वाले पुराने आदेश को हटाता है और मामले पर नए सिरे से विचार का रास्ता खोलता है। अंतिम निर्णय संबंधित प्राधिकारी को रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर लेना होगा।
सही तथ्यों की जांच जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि सही तथ्यों के बिना किसी मामले में उचित निर्णय नहीं लिया जा सकता। खासकर जब मामला किसी व्यक्ति की सजा और समय से पहले रिहाई से जुड़ा हो, तब रिकॉर्ड की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
अदालत के अनुसार, निर्णय लेने वाले प्राधिकारी के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड सही और पूर्ण होना चाहिए। यदि किसी महत्वपूर्ण तथ्य में गलती है, तो उससे निर्णय की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा जांचने और नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
संवैधानिक प्रक्रिया और नियमों का पालन जरूरी
इस फैसले में हाईकोर्ट ने संवैधानिक शक्तियों और प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया के बीच संतुलन की ओर भी ध्यान दिलाया है। राज्यपाल को संविधान के तहत प्राप्त अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल स्थापित नियमों और सही तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में जेल प्रशासन, सरकार और अन्य संबंधित विभागों के रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इन रिकॉर्ड में किसी भी तरह की त्रुटि को दूर करना आवश्यक है।
अदालत का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल में प्रक्रिया, तथ्य और नियम सभी का पालन किया जाना चाहिए।
फैसले से क्या संदेश मिला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश जाता है कि समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में केवल औपचारिक प्रक्रिया पूरी करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित व्यक्ति की जेल अवधि, रिकॉर्ड और अन्य तथ्यों की सही तरीके से जांच करना भी जरूरी है।
साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए। यदि रिकॉर्ड में गलती पाई जाती है, तो उसे नजरअंदाज करके निर्णय नहीं लिया जा सकता।
कुल मिलाकर, राम प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज करने वाले 26 जून 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार करने और आदेश की प्रति मिलने के एक महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। साथ ही, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। इसके लिए उपलब्ध रिकॉर्ड, सही तथ्यों और निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक है।

