मेरठ में अवैध कॉलोनियों की जांच करने पहुंचा 7 सदस्यीय न्यायिक आयोग, उल्देपुर की 150 से अधिक कॉलोनियां रडार पर

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रिपोर्ट – मनीष पाराशर 

मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में अवैध कॉलोनियों और अनधिकृत निर्माणों के मामले में जांच तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सात सदस्यीय न्यायिक आयोग गुरुवार को मेरठ पहुंचा। आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सुधांशु धूलिया कर रहे हैं। जांच का मुख्य केंद्र उल्देपुर क्षेत्र है, जहां 150 से अधिक अवैध कॉलोनियां विकसित किए जाने का मामला सामने आया है। आयोग यह भी पड़ताल करेगा कि मेरठ विकास प्राधिकरण (MEDA) ने इन निर्माणों को रोकने के लिए समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए।

इस जांच का उद्देश्य केवल अवैध कॉलोनियों की पहचान करना नहीं, बल्कि जमीन के स्वामित्व, भूखंडों के लेन-देन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका का पता लगाना भी है। हालांकि, जांच पूरी होने और तथ्यों की पुष्टि होने से पहले किसी व्यक्ति या अधिकारी की जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तेज हुई जांच

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 21 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के अध्यक्ष पी. गुरुप्रसाद की ओर से दाखिल स्टेटस रिपोर्ट पर संज्ञान लिया था। रिपोर्ट में मेरठ में अनधिकृत निर्माणों और कॉलोनियों से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जांच और कार्रवाई से संबंधित निर्देश दिए।

उल्देपुर क्षेत्र में बड़ी संख्या में कॉलोनियों के विकसित होने का मामला विशेष रूप से जांच के दायरे में है। अदालत ने जोन-ए सहित विभिन्न क्षेत्रों में चिह्नित 16,726 अवैध निर्माणों और अनधिकृत इमारतों को सील करने तथा नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इन निर्देशों के अनुपालन की स्थिति भी प्रशासन और संबंधित प्राधिकरण के लिए महत्वपूर्ण होगी।

इसके अलावा, न्यायिक आयोग के कामकाज और सचिवालय से जुड़ी व्यवस्थाओं के लिए राज्य सरकार को 35 लाख रुपये की राशि जमा कराने का आदेश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। आयोग इसी व्यवस्था के तहत संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों का परीक्षण कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा।

सर्किट हाउस में अधिकारियों के साथ बैठक

मेरठ पहुंचने के बाद न्यायिक आयोग ने सर्किट हाउस में प्रशासनिक अधिकारियों और विकास प्राधिकरण के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। बैठक में नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव एवं नोडल अधिकारी पी. गुरुप्रसाद, मेरठ के मंडलायुक्त भानु चंद्र गोस्वामी, जिलाधिकारी डॉ. वी.के. सिंह, एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति और मेरठ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष संजय कुमार मीणा सहित संबंधित अधिकारी मौजूद रहे।

बैठक के दौरान अवैध कॉलोनियों से जुड़े मामलों, प्रशासनिक कार्रवाई और जांच के लिए आवश्यक जानकारी पर चर्चा किए जाने की जानकारी दी गई। आयोग के सामने संबंधित विभागों के रिकॉर्ड, जमीन के दस्तावेज और अब तक की गई कार्रवाई का विवरण महत्वपूर्ण होगा। इन अभिलेखों के आधार पर यह समझने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में किस प्रकार के निर्माण हुए और उनके खिलाफ क्या कदम उठाए गए।

बैठक समाप्त होने के बाद आयोग की टीम उल्देपुर क्षेत्र के स्थलीय निरीक्षण के लिए रवाना हुई। मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लेने से रिकॉर्ड में दर्ज तथ्यों और वास्तविक हालात का मिलान किया जा सकेगा।

पांच प्रमुख बिंदुओं पर होगी पड़ताल

न्यायिक आयोग की जांच में पांच प्रमुख सवालों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। पहला, जिन बड़े भूखंडों पर अवैध आवासीय कॉलोनियां विकसित की गई हैं, क्या उनमें सरकारी जमीन भी शामिल है? दूसरा, यदि संबंधित जमीन निजी है, तो उसके वैध दस्तावेजी मालिक कौन हैं?

तीसरा, निजी जमीन होने की स्थिति में भूमि मालिकों और खरीदारों के बीच वित्तीय तथा कानूनी लेन-देन किस प्रक्रिया से हुआ? चौथा, मेरठ विकास प्राधिकरण पिछले पांच वर्षों से अधिक समय तक इन गतिविधियों को रोकने में प्रभावी क्यों नहीं रहा? पांचवां, क्या इन निर्माणों के पीछे प्राधिकरण के अधिकारियों और भू-माफिया के बीच किसी प्रकार की सांठगांठ थी और यदि ऐसा पाया जाता है, तो किन अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनती है?

इन सवालों के जवाब जांच की दिशा तय करेंगे। विशेष रूप से जमीन के स्वामित्व और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच के साथ यह भी देखा जा सकता है कि कॉलोनियों के विकास के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं। वहीं, प्राधिकरण की ओर से जारी नोटिस, निरीक्षण रिपोर्ट और कार्रवाई के रिकॉर्ड से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि नियमों के उल्लंघन पर कब और क्या कदम उठाए गए।

हालांकि, किसी भी तरह की मिलीभगत या व्यक्तिगत लापरवाही को तभी स्थापित माना जाएगा, जब जांच में उसके समर्थन में पर्याप्त तथ्य और साक्ष्य सामने आएंगे।

आयोग के दौरे से पहले MEDA की कार्रवाई

न्यायिक आयोग के मेरठ पहुंचने से पहले मेरठ विकास प्राधिकरण ने भी अवैध प्लॉटिंग और निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई तेज की है। जानकारी के मुताबिक, शहर के विभिन्न हिस्सों में नियमों के विरुद्ध विकसित की जा रही कॉलोनियों और निर्माणों पर बुलडोजर से कार्रवाई की गई है।

प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में नियमित रूप से कार्रवाई कर रहे हैं। ऐसे में जांच के दौरान पहले की कार्रवाई, जारी नोटिस और आगे की कार्ययोजना का विवरण भी अहम हो सकता है। आयोग यह देख सकेगा कि कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुरूप हुई या नहीं और क्या चिह्नित मामलों में सभी जरूरी कदम उठाए गए हैं।

अवैध कॉलोनियों का मामला आम नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना जरूरी मंजूरी के विकसित क्षेत्रों में सड़क, जल निकासी, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा, जमीन खरीदने वाले लोगों के लिए स्वामित्व और निर्माण की वैधता से जुड़े जोखिम भी हो सकते हैं। इसलिए किसी भी भूखंड या कॉलोनी में निवेश करने से पहले संबंधित भूमि के दस्तावेजों और प्राधिकरण की स्वीकृति की जांच करना जरूरी है।

9 दिसंबर 2026 से पहले सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाएगी रिपोर्ट

न्यायिक आयोग की जांच के बाद तैयार होने वाली रिपोर्ट में जमीन के स्वामित्व, कॉलोनियों के विकास की प्रक्रिया, प्रशासनिक कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका से जुड़े निष्कर्ष शामिल होने की उम्मीद है। आयोग अपनी विस्तृत रिपोर्ट 9 दिसंबर 2026 को प्रस्तावित अगली सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगा।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि स्थलीय निरीक्षण और दस्तावेजों की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं। रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई की दिशा स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल, उल्देपुर की 150 से अधिक कॉलोनियों और मेरठ विकास प्राधिकरण की भूमिका से जुड़े सवाल जांच के केंद्र में हैं।

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