आयुर्वेद: समग्र जीवन शैली की बुनियाद, आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ रहा 5,000 साल पुराना ज्ञान

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रिपोर्ट- अमित सिंह यादव

नई दिल्ली। भारत की करीब 5,000 वर्ष पुरानी चिकित्सा परंपरा आयुर्वेद अब पारंपरिक ज्ञान से आगे बढ़कर आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ रही है। 23 सितंबर 2026 को देश 11वां आयुर्वेद दिवस मनाएगा। इस वर्ष इसका विषय “स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” रखा गया है। मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित किया जाएगा।

आयुर्वेद को केवल उपचार की पद्धति के तौर पर नहीं, बल्कि संतुलित जीवनशैली और स्वास्थ्य संरक्षण से जुड़ी ज्ञान परंपरा के रूप में देखा जाता है। ‘आयु’ यानी जीवन और ‘वेद’ यानी ज्ञान से बने आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगग्रस्त व्यक्ति के विकारों को दूर करना है। इसकी परंपरागत अवधारणाओं में शरीर, मन और पर्यावरण के बीच संतुलन को विशेष महत्व दिया गया है।

आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से बढ़ रहा जुड़ाव

सरकार आयुर्वेद समेत आयुष चिकित्सा प्रणालियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय आयुष मिशन और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से विभिन्न कदम उठा रही है। इसके तहत आयुष क्लीनिक, अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और एकीकृत चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से भी लोगों तक आयुष सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 तक देश में 12,260 आयुष आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सामान्य चिकित्सा सेवाओं के साथ आयुष सेवाओं को भी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को उनके नजदीक ही विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध कराना है। साथ ही, आयुष चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है।

टेलीमेडिसिन से घर बैठे आयुर्वेद परामर्श

डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ आयुर्वेद की पहुंच भी ऑनलाइन माध्यमों तक बढ़ी है। सरकार की ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन सेवा के माध्यम से आयुष ओपीडी की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके जरिए मरीज ऑनलाइन आयुर्वेद और अन्य आयुष विशेषज्ञों से परामर्श ले सकते हैं।

इससे विशेष रूप से उन लोगों को सुविधा मिल सकती है, जिन्हें विशेषज्ञ सेवाओं के लिए दूर की यात्रा करनी पड़ती है। हालांकि, किसी भी उपचार को अपनाने से पहले योग्य चिकित्सक से उचित परामर्श और आवश्यक जांच कराना महत्वपूर्ण है।

आयुर्वेद शिक्षा और अनुसंधान पर जोर

आयुर्वेद को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ जोड़ने के लिए शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान को महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 13 मार्च 2026 तक देश में 593 आयुर्वेद कॉलेज, 45,245 स्नातक सीटें और 5,673 स्नातकोत्तर सीटें उपलब्ध थीं।

इसके साथ ही आयुर्वेद में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए आयुर्ज्ञान और आयुर स्वास्थ्य जैसी योजनाओं के माध्यम से शोध परियोजनाओं और उत्कृष्टता केंद्रों को सहायता दी जा रही है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) भी देशभर में अनुसंधान, प्रशिक्षण और छात्र-केंद्रित कार्यक्रमों के माध्यम से इस क्षेत्र में वैज्ञानिक क्षमता विकसित कर रही है।

मार्च 2026 में सीसीआरएएस ने ‘अनुवादिनी एआई’ के साथ साझेदारी की, जिसके माध्यम से आयुर्वेद से संबंधित शोध और शैक्षिक सामग्री को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इससे शोध सामग्री की पहुंच छात्रों, चिकित्सकों और आम लोगों तक बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

दवाओं की गुणवत्ता और नियमन पर ध्यान

आयुर्वेदिक औषधियों की बढ़ती मांग के बीच गुणवत्ता और सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय बन गए हैं। आयुर्वेदिक दवाएं औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत नियमन के दायरे में आती हैं। विनिर्माताओं के लिए निर्धारित गुणवत्ता मानकों और अच्छी विनिर्माण प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

इसके अलावा, दवा निर्माण लाइसेंस प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ई-औषधि जैसे ऑनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, आयुर्वेद आहार के लिए भी मानकीकरण और नियामक व्यवस्था विकसित की जा रही है, ताकि पारंपरिक खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में गुणवत्ता और उपभोक्ता सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।

वैश्विक स्तर पर बढ़ रही आयुर्वेद की पहुंच

भारत आयुर्वेद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए विभिन्न देशों और संस्थानों के साथ सहयोग कर रहा है। अनुसंधान, शिक्षा, अकादमिक आदान-प्रदान और पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में कई समझौते किए गए हैं। इसके अलावा विभिन्न देशों में आयुष सूचना केंद्र और छात्रवृत्ति कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ सहयोग के तहत पारंपरिक चिकित्सा के लिए मानकीकरण, अनुसंधान और नीति निर्माण पर भी काम हो रहा है। वहीं, आयुर्वेद की शब्दावली को आईसीडी-11 से जुड़े वर्गीकरण ढांचे में शामिल किए जाने से निदान संबंधी सूचनाओं को मानकीकृत तरीके से दर्ज करने की दिशा में मदद मिली है।

11वें आयुर्वेद दिवस पर नई दिशा

2026 का आयुर्वेद दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब भारत पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक अनुसंधान, गुणवत्ता मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने पर जोर दे रहा है। आधिकारिक तौर पर इस वर्ष का अभियान “स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” पर केंद्रित है। देशभर में आयुर्वेद दिवस से पहले 9,700 से अधिक गतिविधियां रिपोर्ट की गई हैं और 89 लाख से ज्यादा नागरिकों ने आयुर्वेद के समर्थन का संकल्प लिया है।

कुल मिलाकर, आयुर्वेद का वर्तमान विस्तार शिक्षा, स्वास्थ्य अवसंरचना, डिजिटल सेवाओं, अनुसंधान, औषधि गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे कई क्षेत्रों को जोड़ रहा है। इसके साथ ही आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में आयुर्वेद की भूमिका को मजबूत करने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता नियंत्रण और जिम्मेदार चिकित्सा उपयोग पर निरंतर ध्यान देना आवश्यक है। यही दृष्टिकोण पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक स्वास्थ्य जरूरतों के बीच बेहतर समन्वय का आधार बन सकता है।

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