भारतीयों में कम उम्र में हार्ट डिजीज का बढ़ रहा खतरा, KGMU डॉक्टर ने बताया इसका कारण – जरूर पढ़ें
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लखनऊ: भारत में हृदय रोग यानी हार्ट डिजीज को लेकर विशेषज्ञ लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं। खासतौर पर कम उम्र में हृदय संबंधी समस्याओं के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ाई है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. ऋषि सेठी के अनुसार, भारतीयों में हृदय रोग कई अन्य आबादी की तुलना में अपेक्षाकृत कम उम्र में विकसित हो सकता है। उन्होंने इसके पीछे आनुवंशिक कारणों के साथ-साथ खराब जीवनशैली, खान-पान और पर्यावरणीय कारकों को भी महत्वपूर्ण बताया है।
विशेषज्ञ के मुताबिक, भारतीयों में हार्ट डिजीज करीब 10 साल पहले शुरू होने का जोखिम हो सकता है। उपलब्ध चिकित्सा शोध में भी भारतीयों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज के अपेक्षाकृत कम उम्र में सामने आने की बात कही गई है। एक अध्ययन के अनुसार, भारतीयों में हृदय रोग अन्य आबादी की तुलना में लगभग 5 से 10 वर्ष पहले दिखाई दे सकता है।
आनुवंशिक कारण भी निभाते हैं भूमिका
हृदय रोग का खतरा केवल खान-पान या व्यायाम की कमी से नहीं जुड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीयों में कुछ आनुवंशिक प्रवृत्तियां भी हृदय संबंधी जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। खासतौर पर शरीर के अंदरूनी हिस्सों में जमा होने वाली चर्बी यानी विसरल फैट को महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है।
विसरल फैट सामान्य तौर पर पेट और आंतरिक अंगों के आसपास जमा होती है। बाहर से शरीर सामान्य दिखाई देने के बावजूद पेट के आसपास अधिक चर्बी होना मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। इसके साथ ही ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
KGMU के प्रो. ऋषि सेठी ने भी भारतीयों में विसरल फैट की आनुवंशिक प्रवृत्ति और इसके साथ जुड़े मेटाबॉलिक जोखिमों पर जोर दिया है।
खराब खान-पान और कम एक्सरसाइज भी बड़ी वजह
आज की व्यस्त जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि कम होना और असंतुलित खान-पान आम समस्या बनती जा रही है। लंबे समय तक बैठे रहना, नियमित व्यायाम न करना और अत्यधिक कैलोरी वाले भोजन का सेवन शरीर के वजन तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
इसके अलावा, अधिक नमक, असंतुलित वसा और अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन का नियमित सेवन भी हृदय स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं माना जाता। इसलिए विशेषज्ञ संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि को हृदय की सेहत बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर भारतीय को कम उम्र में हार्ट डिजीज होगी। बल्कि विशेषज्ञों की सलाह का उद्देश्य यह है कि जोखिम को पहचानकर समय रहते आवश्यक सावधानी बरती जाए।
डायबिटीज और हाई BP को नजरअंदाज न करें
डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर हृदय रोग के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। लंबे समय तक ब्लड शुगर या ब्लड प्रेशर नियंत्रित न रहने पर रक्त वाहिकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी तरह शरीर में अस्वास्थ्यकर कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से भी धमनियों में फैटी डिपॉजिट बनने का खतरा बढ़ सकता है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति को डायबिटीज, हाई BP, मोटापा या कोलेस्ट्रॉल की समस्या है, तो उसे इसे सामान्य समस्या मानकर टालना नहीं चाहिए। समय-समय पर डॉक्टर की सलाह लेकर आवश्यक जांच और जीवनशैली में सुधार करना उपयोगी हो सकता है।
तनाव और स्मोकिंग भी बढ़ाते हैं जोखिम
आधुनिक जीवन में मानसिक तनाव भी लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। लगातार तनाव, पर्याप्त नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि का अभाव लंबे समय में स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा, धूम्रपान हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है।
विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट है कि हृदय स्वास्थ्य की चिंता केवल उम्र बढ़ने के बाद नहीं करनी चाहिए। बल्कि जिन लोगों में पहले से जोखिम मौजूद है, उन्हें कम उम्र से ही अपनी जीवनशैली और स्वास्थ्य जांच पर ध्यान देना चाहिए।
परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास हो तो रहें सतर्क
यदि परिवार में माता-पिता या अन्य करीबी रिश्तेदारों को कम उम्र में हृदय रोग हुआ है, तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। आनुवंशिक जोखिम को पूरी तरह बदला नहीं जा सकता, लेकिन जीवनशैली और अन्य नियंत्रित किए जा सकने वाले जोखिम कारकों पर काम करके हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
ऐसे लोगों को डॉक्टर से सलाह लेकर अपने लिए उपयुक्त स्वास्थ्य जांच की योजना बनानी चाहिए। खासकर यदि साथ में हाई BP, डायबिटीज, मोटापा या असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्या भी मौजूद हो।
Lp(a) जांच की भी हो सकती है भूमिका
हृदय रोग के आनुवंशिक जोखिम को समझने के लिए लिपोप्रोटीन(a), जिसे Lp(a) कहा जाता है, भी चर्चा में है। KGMU से संबंधित रिपोर्ट में इसे ऐसे परीक्षण के रूप में बताया गया है जो कुछ लोगों में विरासत में मिले हृदय संबंधी जोखिम का संकेत दे सकता है। इसका स्तर काफी हद तक आनुवंशिक होता है और सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट ठीक होने के बावजूद कुछ लोगों में जोखिम की जानकारी दे सकता है।
हालांकि, किसी भी जांच की जरूरत व्यक्ति की उम्र, पारिवारिक इतिहास और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों के आधार पर डॉक्टर तय कर सकते हैं। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के जांच या दवा शुरू करना उचित नहीं है।
बचाव के लिए रोजमर्रा की आदतों में करें बदलाव
हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी कदम रोजमर्रा की आदतों में सुधार करना है। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, वजन पर नियंत्रण और धूम्रपान से दूरी इसमें मददगार हो सकती है।
इसके साथ ही ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की समय-समय पर जांच कराना भी उपयोगी है। खासकर उन लोगों को ज्यादा ध्यान देना चाहिए जिनके परिवार में हृदय रोग का इतिहास है या जिनमें पहले से कोई जोखिम कारक मौजूद है।
कुल मिलाकर, KGMU विशेषज्ञ का संदेश यही है कि हृदय रोग का खतरा सामने आने का इंतजार करने के बजाय पहले से सावधानी बरती जाए। भारतीयों में कम उम्र में हृदय रोग के जोखिम को देखते हुए जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली और समय पर चिकित्सकीय सलाह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

