दलित नाबालिग से छेड़छाड़ के दोषी को चार वर्ष का कठोर कारावास, 20 हजार रुपये जुर्माना
रिपोर्ट – हर्ष वर्मा
फर्रुखाबाद ः दलित नाबालिग बालिका को बहला-फुसलाकर ले जाने और उसके साथ छेड़छाड़ करने के मामले में विशेष न्यायालय पॉक्सो एक्ट ने दोषी को चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट रितिका त्यागी ने मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद निहाल खां को दोषी करार दिया। न्यायालय ने दोषी पर 20 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में उसे तीन माह का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना होगा।
यह मामला फर्रुखाबाद के शमसाबाद थाना क्षेत्र से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता की मां ने वर्ष 2017 में पुलिस अधिकारियों को प्रार्थना पत्र देकर अपनी नाबालिग बेटी के लापता होने और उसे बहला-फुसलाकर बाहर ले जाने का आरोप लगाया था। शिकायत में शमसाबाद निवासी निहाल खां और उसके तीन साथियों पर बालिका को बहला-फुसलाकर जयपुर ले जाने का आरोप लगाया गया था।
नाबालिग के लापता होने पर परिजनों ने शुरू की तलाश
मामले के अनुसार, नाबालिग बालिका के अचानक लापता होने के बाद उसके परिजन काफी परेशान हो गए। उन्होंने अपने स्तर से उसकी तलाश शुरू की और पुलिस को भी इसकी जानकारी दी। तलाश के दौरान परिजनों को जानकारी मिली कि बालिका निहाल खां के संपर्क में है और उसके पास मौजूद है।
परिजनों ने आरोपित से फोन पर संपर्क कर बालिका को वापस करने की मांग की। हालांकि, अभियोजन के मुताबिक आरोपित ने तत्काल उसे वापस करने से इनकार कर दिया। इसके बाद परिजनों की चिंता और बढ़ गई तथा उन्होंने बालिका की सुरक्षित वापसी के लिए पुलिस और प्रशासन से मदद मांगी।
बाद में निहाल खां बालिका को बस से फर्रुखाबाद लेकर आया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसे घटियाघाट रोड के पास छोड़ दिया गया। इसके बाद बालिका अपनी मौसी के घर पहुंची और परिवार के लोगों को पूरी घटना की जानकारी दी।
पुलिस में शिकायत के बाद शुरू हुई कार्रवाई
बालिका के वापस मिलने के बाद परिजनों ने घटना की जानकारी शमसाबाद पुलिस को दी। आरोप है कि शुरुआती स्तर पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद पीड़िता की मां ने जिलाधिकारी से शिकायत की और मामले में कार्रवाई की मांग की।
प्रशासनिक स्तर पर शिकायत पहुंचने के बाद मामले में पुलिस को कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके पश्चात पीड़िता का चिकित्सकीय परीक्षण लोहिया अस्पताल में कराया गया। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मुकदमा दर्ज कर विवेचना शुरू की।
विवेचना के दौरान पुलिस ने मामले से जुड़े तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को एकत्र किया। इसके साथ ही संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए। जांच पूरी होने के बाद विवेचक ने आरोपित निहाल खां के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया।
न्यायालय में चली लंबी सुनवाई
आरोपपत्र दाखिल होने के बाद मामले की सुनवाई विशेष न्यायालय पॉक्सो एक्ट में हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता तेज सिंह राजपूत ने न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा। अभियोजन ने मामले से जुड़े गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
वहीं, न्यायालय ने मामले में प्रस्तुत सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण किया। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर अपना निर्णय सुनाया।
विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट रितिका त्यागी ने निहाल खां को नाबालिग बालिका से छेड़छाड़ के मामले में दोषी माना। इसके बाद अदालत ने उसे चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
जुर्माना नहीं देने पर अतिरिक्त सजा
अदालत के आदेश के अनुसार, दोषी को निर्धारित 20 हजार रुपये का अर्थदंड भी जमा करना होगा। यदि वह जुर्माने की राशि अदा नहीं करता है तो उसे तीन माह का अतिरिक्त कठोर कारावास भुगतना पड़ेगा।
न्यायालय का यह फैसला पॉक्सो अधिनियम के तहत नाबालिगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया के महत्व को भी सामने लाता है। ऐसे मामलों में पुलिस जांच, चिकित्सकीय परीक्षण, गवाहों के बयान और न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी प्रक्रिया के तहत इस मामले में भी पुलिस ने विवेचना पूरी कर आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया था।
वर्षों बाद आया न्यायालय का फैसला
यह मामला वर्ष 2017 का है और इसकी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने दोषी को सजा सुनाई है। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने मामले से संबंधित साक्ष्यों और गवाहों को न्यायालय के सामने रखा। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय दिया।
इस फैसले के बाद पीड़ित पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से राहत मिली है। वहीं, अदालत द्वारा सुनाई गई सजा यह भी दर्शाती है कि नाबालिगों से संबंधित मामलों में कानून के प्रावधानों के तहत दोष सिद्ध होने पर न्यायालय सजा निर्धारित करता है।
पॉक्सो कानून के तहत मामलों में साक्ष्य महत्वपूर्ण
नाबालिग बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में पॉक्सो कानून महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था है। इसके तहत बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई है। ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान की गोपनीयता बनाए रखना भी कानूनी रूप से आवश्यक होता है।
फर्रुखाबाद के इस मामले में भी न्यायालय ने पीड़िता की पहचान को सार्वजनिक किए बिना उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सुनवाई पूरी की। अभियोजन पक्ष की दलीलों तथा विवेचना के दौरान सामने आए तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने आरोपित को दोषी माना।
प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई भी रही महत्वपूर्ण
मामले में शुरुआती शिकायत के बाद प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप हुआ। इसके बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर विवेचना की और आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया। इस तरह शिकायत से लेकर जांच और फिर न्यायालय में सुनवाई तक पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ी।
कानूनी मामलों में समय लग सकता है, लेकिन साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर न्यायालय अंतिम निर्णय करता है। इस मामले में भी अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का परीक्षण करने के बाद दोषसिद्धि का फैसला सुनाया।

