पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर BJP का पलटवार, सुधांशु त्रिवेदी बोले खुद सामने आ गए
Digital UP News Desk
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद देश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पीएम मोदी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस टिप्पणी के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया था, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही ‘दिमागी नक्सल’ खुद सामने आ गए।
सुधांशु त्रिवेदी ने इस पूरे विवाद को नक्सलवाद के पुराने इतिहास और कांग्रेस शासन के दौरान आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से जोड़ते हुए कई सवाल उठाए। साथ ही उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर भाजपा की राजनीतिक व्याख्या भी सामने रखी। इस बयान के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने की संभावना है।
पीएम मोदी ने लाल किले से क्या कहा था?
दरअसल, 15 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई और उससे मिली सफलता का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर हुआ है, लेकिन नक्सली विचारधारा से जुड़े ऐसे लोग अभी भी मौजूद हैं, जिन्हें उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ कहा। उन्होंने ऐसे तत्वों की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री के इस बयान में किसी व्यक्ति, पार्टी या संगठन का नाम नहीं लिया गया था। हालांकि, उनके संबोधन के बाद विपक्षी दलों की ओर से इस शब्द को लेकर प्रतिक्रिया सामने आने लगी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए इसे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने की कोशिश बताया।
चिदंबरम ने कहा- ‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है’
पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। उनके इस बयान को भाजपा ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर सीधी प्रतिक्रिया के तौर पर लिया और इसके आधार पर कांग्रेस पर हमला तेज कर दिया।
चिदंबरम के बयान के बाद भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन उनके बयान के 24 घंटे के भीतर ही यह स्पष्ट हो गया कि किसके दिमाग में नक्सली विचार हैं। भाजपा ने इसे कांग्रेस की कथित वैचारिक स्थिति से जोड़ते हुए सवाल उठाया कि आखिर पार्टी नक्सलवाद को किस नजरिए से देखती है।
सुधांशु त्रिवेदी ने बताई ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा
भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने अपने बयान में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की राजनीतिक परिभाषा बताते हुए कई उदाहरण गिनाए। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों को आतंकवाद और कट्टरपंथ से जुड़े कुछ विवादित चेहरों के प्रति सहानुभूति दिखाई देती है।
भाजपा की ओर से रखे गए उदाहरणों में ऐसे लोगों का उल्लेख किया गया, जिन्हें त्रिवेदी के अनुसार हाफिज सईद में ‘साहब’, याकूब मेमन के मामले में ‘ज्यूडिशियल किलिंग’, ओसामा बिन लादेन के लिए सम्मानसूचक संबोधन, जाकिर नाईक में ‘शांति का मसीहा’, इशरत जहां में ‘बेटी’ और बुरहान वानी में ‘भटका हुआ नौजवान’ दिखाई देता है। उन्होंने भारतीय सेना के प्रमुख के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी करने वालों को भी अपनी इस परिभाषा में शामिल किया।
हालांकि, ये भाजपा प्रवक्ता की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप और उदाहरण हैं। इन्हें किसी स्वतंत्र या आधिकारिक परिभाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण में किया गया था, जबकि उसके बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों ने इसकी अपनी-अपनी व्याख्या पेश की है।
झीरम घाटी और नक्सलवाद का मुद्दा भी उठा
सुधांशु त्रिवेदी ने अपने बयान में छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी हत्याकांड का भी उल्लेख किया। झीरम घाटी की घटना लंबे समय से देश में नक्सली हिंसा और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी गंभीर घटनाओं में गिनी जाती है। भाजपा ने इसी संदर्भ के जरिए कांग्रेस से नक्सलवाद के खिलाफ उसके पुराने रुख को लेकर सवाल किए।
इसके अलावा, भाजपा ने पी. चिदंबरम के पूर्व गृह मंत्री के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश के कई हिस्सों में नक्सलवाद बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बना हुआ था। भाजपा के अनुसार, उस दौर में नक्सल प्रभावित जिलों और हिंसा की घटनाओं की संख्या काफी अधिक थी। हालांकि, इन आंकड़ों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग दावे रहे हैं, इसलिए इन्हें संबंधित सरकारी आंकड़ों के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
मनमोहन सिंह के पुराने बयान का भी जिक्र
सुधांशु त्रिवेदी ने इस विवाद में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 2006 के बयान का भी हवाला दिया। उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि नक्सलवाद को लेकर सही दृष्टिकोण किसका था—मनमोहन सिंह का या पी. चिदंबरम का?
भाजपा प्रवक्ता ने याद दिलाया कि 13 अप्रैल 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने गंभीर चुनौती बताया था। भाजपा का तर्क है कि यदि उस समय कांग्रेस नेतृत्व नक्सलवाद को गंभीर सुरक्षा समस्या मानता था, तो वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर गर्व जताना पार्टी की स्थिति पर सवाल खड़े करता है।
कांग्रेस और BJP के बीच बढ़ी राजनीतिक तकरार
इस पूरे विवाद से एक बार फिर साफ है कि नक्सलवाद का मुद्दा केवल सुरक्षा नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन चुका है। एक तरफ भाजपा प्रधानमंत्री के बयान को वैचारिक चुनौती के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक विरोध और असहमति को निशाना बनाने वाली भाषा के तौर पर देख रहा है।
कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर सवाल उठाए गए हैं। पार्टी नेताओं का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना या असहमति व्यक्त करना किसी व्यक्ति को किसी विचारधारा से जोड़ने का आधार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि प्रधानमंत्री का बयान राजनीतिक विरोधियों के लिए नहीं, बल्कि नक्सली विचारधारा का समर्थन करने वाले तत्वों के खिलाफ चेतावनी के रूप में था। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी को विपक्षी नेताओं के खिलाफ सीधे तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
‘दिमागी नक्सल’ पर आगे भी जारी रह सकती है सियासत
फिलहाल पी. चिदंबरम की टिप्पणी और सुधांशु त्रिवेदी के पलटवार ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का प्रमुख मुद्दा बना दिया है। भाजपा जहां चिदंबरम के बयान को कांग्रेस की वैचारिक स्थिति से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इस शब्द के इस्तेमाल को लेकर सरकार पर सवाल उठा रही है।
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया था। इसके बावजूद चिदंबरम की प्रतिक्रिया और उसके बाद भाजपा के हमले ने इसे व्यक्तिगत तथा पार्टी स्तर की राजनीतिक बहस में बदल दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राजनीतिक मंचों पर भी चर्चा का विषय बन सकता है।
कुल मिलाकर, ‘दिमागी नक्सल’ को लेकर शुरू हुई यह बहस नक्सलवाद, वैचारिक असहमति, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक विमर्श के बीच की सीमाओं को लेकर नई राजनीतिक बहस को जन्म दे रही है। अब देखना होगा कि कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे को आगे किस तरह उठाती हैं और क्या दोनों दल नक्सलवाद तथा आंतरिक सुरक्षा के सवाल पर किसी व्यापक राजनीतिक सहमति की दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।

