फर्रुखाबाद मे अपहरण और पॉक्सो मामले में दोषी को सात साल की सजा, अदालत ने लगाया जुर्माना जानिए क्या है पूरी खबर

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रिपोर्ट – हर्ष वर्मा

फर्रुखाबाद: उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में वर्ष 2017 में दर्ज एक पॉक्सो (POCSO) मामले में विशेष न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट)/अपर सत्र न्यायाधीश रेखा शर्मा की अदालत ने नाबालिग के अपहरण और यौन अपराध से संबंधित मामले में आरोपी आनन्द शाक्य को दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और 40 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।

अदालत के आदेश के बाद दोषी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। साथ ही न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि जुर्माने की राशि जमा नहीं की जाती है तो दोषी को छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

यह मामला लगभग नौ वर्ष पहले दर्ज हुआ था। लंबी न्यायिक प्रक्रिया, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने अपना निर्णय सुनाया। अदालत का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि बच्चों से जुड़े गंभीर अपराधों में कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मामलों का निस्तारण किया जाता है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय निर्णय देता है।

वर्ष 2017  में दर्ज हुआ था मुकदमा

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला मऊदरवाजा थाना क्षेत्र का है। शिकायतकर्ता महिला ने पुलिस को दी गई तहरीर में बताया था कि 23 अप्रैल 2017 की शाम वह खेत पर काम करने गई थीं और उस समय उनकी बड़ी नाबालिग पुत्री घर पर अकेली थी।

महिला का आरोप था कि जब वह वापस लौटीं तो उनकी पुत्री घर पर नहीं मिली। इसके साथ ही घर में रखे सोने-चांदी के आभूषण और लगभग 74 हजार रुपये नकद भी गायब बताए गए। इसके बाद परिवार ने आसपास खोजबीन की और मामले की सूचना पुलिस को दी।

प्रत्यक्षदर्शियों की सूचना के आधार पर दर्ज हुई रिपोर्ट

शिकायत के अनुसार, कुछ ग्रामीणों ने परिजनों को बताया कि उन्होंने कथित रूप से आरोपी आनन्द शाक्य को नाबालिग के साथ ई-रिक्शा में जाते हुए देखा था। इस सूचना के आधार पर पुलिस ने मामले की जांच प्रारंभ की।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर आनन्द शाक्य, उसकी मां कलावती, पिता मिजाजी तथा रंजीत के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं और पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।

विवेचना के दौरान तीन आरोपियों के हटाए गए नाम

पुलिस जांच के दौरान मामले के सभी पहलुओं की पड़ताल की गई। विवेचना के दौरान पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान और अन्य तथ्यों का परीक्षण किया।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने पाया कि कलावती, मिजाजी और रंजीत के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसके बाद उनके नाम आरोपपत्र से हटा दिए गए। वहीं, आरोपी आनन्द शाक्य के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर उसके खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल किया गया।

यह तथ्य इस बात को भी दर्शाता है कि जांच एजेंसियां प्रत्येक आरोपी के संबंध में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग निर्णय लेती हैं और बिना पर्याप्त प्रमाण के किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाता।

अदालत में चली विस्तृत सुनवाई

मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट)/अपर सत्र न्यायाधीश रेखा शर्मा की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से तेज सिंह राजपूत ने न्यायालय के समक्ष उपलब्ध साक्ष्य, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए।

दूसरी ओर, न्यायालय ने बचाव पक्ष की दलीलों को भी सुना। दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने पूरे मामले का परीक्षण किया।

साक्ष्यों के आधार पर दोषी करार

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर आरोपी आनन्द शाक्य के विरुद्ध लगाए गए आरोप सिद्ध होते हैं। इसके आधार पर न्यायालय ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम, अपहरण तथा संबंधित अन्य धाराओं में दोषी ठहराया।

भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जाता जब तक न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर उसे दोषी घोषित न कर दे। इस मामले में भी अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद अपना निर्णय सुनाया।

सात वर्ष की कैद और आर्थिक दंड

दोष सिद्ध होने के बाद अदालत ने आरोपी को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यदि दोषी निर्धारित जुर्माना जमा नहीं करता है तो उसे छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य

पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences Act) बच्चों को यौन अपराधों से कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया विशेष कानून है।

इस अधिनियम के तहत नाबालिगों से जुड़े मामलों की सुनवाई विशेष अदालतों में की जाती है ताकि मामलों का प्रभावी और संवेदनशील तरीके से निस्तारण हो सके।

विशेष अदालतें ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय देती हैं।

न्यायिक प्रक्रिया का महत्व

इस मामले में वर्ष 2017 से लेकर निर्णय आने तक न्यायिक प्रक्रिया के विभिन्न चरण पूरे किए गए। इनमें पुलिस जांच, आरोपपत्र दाखिल करना, गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें शामिल रहीं।

अंततः न्यायालय ने सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अपना फैसला सुनाया। यह प्रक्रिया न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता और विधिक मानकों का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है|

फर्रुखाबाद के इस बहुचर्चित पॉक्सो मामले में विशेष न्यायालय द्वारा सुनाया गया फैसला न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद आया है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपी आनन्द शाक्य को दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कारावास और 40 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।

वहीं, विवेचना के दौरान जिन तीन अन्य आरोपियों के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, उनके नाम आरोपपत्र से हटा दिए गए।

इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय का निर्णय जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही दिया जाता है।

अब अदालत के आदेश के अनुसार दोषी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है और आगे की कार्रवाई विधिक प्रक्रिया के अनुरूप की जाएगी।

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