GSVM कॉलेज में डीआईसी पर सीएमई आयोजित, विशेषज्ञों ने मातृ मृत्यु दर कम करने के उपायों पर दी जानकारी – जानिए पूरी जानकारी

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रिपोर्ट – सर्वेश शर्मा

कानपुर: गणेश शंकर विद्यार्थी (जीएसवीएम) मेडिकल कॉलेज के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग द्वारा Disseminated Intravascular Coagulation (DIC) विषय पर एक सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम (Continuing Medical Education-CME) का आयोजन किया गया।

इस शैक्षणिक सम्मेलन का उद्देश्य चिकित्सकों, संकाय सदस्यों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को डीआईसी जैसी गंभीर चिकित्सकीय स्थिति की समय पर पहचान, आधुनिक उपचार और प्रभावी प्रबंधन के संबंध में नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराना था।

विशेषज्ञों ने कार्यक्रम के दौरान बताया कि डीआईसी (Disseminated Intravascular Coagulation) एक गंभीर चिकित्सकीय आपात स्थिति है, जो विशेष परिस्थितियों में गर्भवती महिलाओं सहित अन्य मरीजों में भी विकसित हो सकती है।

प्रसूति चिकित्सा में यह मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल मानी जाती है। इसलिए इसकी समय पर पहचान और बहुविषयक उपचार व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है।

डीआईसी पर स्वास्थ विशेषज्ञों ने साझा किए नवीनतम चिकित्सकीय अनुभव

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. नीना गुप्ता रहीं। उन्होंने अपने व्याख्यान में डीआईसी की चिकित्सा संबंधी अवधारणा, इसके संभावित कारणों, शुरुआती लक्षणों, समय पर निदान और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने कहा कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान कुछ जटिल परिस्थितियों में डीआईसी विकसित होने का जोखिम बढ़ सकता है। यदि इसकी शीघ्र पहचान कर समय पर उपचार शुरू किया जाए तो गंभीर जटिलताओं की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि समय पर रेफरल, प्रभावी मॉनिटरिंग और प्रशिक्षित मेडिकल टीम इस स्थिति के सफल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मातृ मृत्यु दर कम करने पर दिया गया विशेष जोर

सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के लिए केवल आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समय पर रोग की पहचान, समन्वित उपचार और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल भी आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की समय रहते पहचान कर उचित चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए तो कई गंभीर परिस्थितियों से बचा जा सकता है। इसी उद्देश्य से ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम चिकित्सा क्षेत्र में निरंतर आयोजित किए जाते हैं।

विभागाध्यक्ष ने टीमवर्क को बताया महत्वपूर्ण

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. सीमा द्विवेदी, प्रोफेसर एवं कार्यवाहक विभागाध्यक्ष, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि गंभीर प्रसूति आपात स्थितियों के सफल उपचार के लिए टीम आधारित चिकित्सा प्रणाली अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों के साथ-साथ एनेस्थीसिया, मेडिसिन, पैथोलॉजी, ब्लड बैंक और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय से मरीजों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।

उन्होंने गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और समय पर चिकित्सा परामर्श लेने के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

बहुविषयक प्रबंधन पर विशेषज्ञों ने रखे अपने  विचार

सम्मेलन में विभिन्न विभागों के वरिष्ठ चिकित्सकों ने भी भाग लिया और डीआईसी के बहुविषयक प्रबंधन (Multidisciplinary Management) पर अपने अनुभव साझा किए।

इस अवसर पर डॉ. एस. के. गौतम, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग ने गंभीर मरीजों के समग्र उपचार की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. लुबना खान, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पैथोलॉजी विभाग ने डीआईसी के निदान में प्रयोगशाला जांचों की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तृत जानकारी दी।

इसके अतिरिक्त डॉ. अपूर्वा अग्रवाल, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, एनेस्थीसिया विभाग ने गंभीर प्रसूति मामलों में एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की भूमिका और आपातकालीन प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

संकाय सदस्यों और पीजी विद्यार्थियों की सक्रिय रही भागीदारी

इस शैक्षणिक सम्मेलन में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के संकाय सदस्यों, वरिष्ठ चिकित्सकों तथा स्नातकोत्तर (पीजी) विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने विषय से जुड़े विभिन्न चिकित्सकीय पहलुओं को समझा तथा विशेषज्ञों से प्रत्यक्ष संवाद का अवसर प्राप्त किया।

इससे युवा चिकित्सकों को व्यावहारिक अनुभव और नवीनतम उपचार पद्धतियों की जानकारी मिली।

प्रश्नोत्तर सत्र रहा आकर्षण का केंद्र

कार्यक्रम के अंत में आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र प्रतिभागियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी रहा। इस दौरान पीजी विद्यार्थियों और चिकित्सकों ने डीआईसी के निदान, उपचार, आपातकालीन प्रबंधन और विभिन्न क्लीनिकल परिस्थितियों से जुड़े अनेक प्रश्न विशेषज्ञों के समक्ष रखे।

विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक तथ्यों और अपने चिकित्सकीय अनुभवों के आधार पर प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का विस्तार से समाधान किया। इससे सम्मेलन का शैक्षणिक महत्व और अधिक बढ़ गया।

कार्यक्रम का रहा सफल संचालन

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रश्मि यादव और डॉ. दिव्या गुप्ता ने किया। उन्होंने विभिन्न सत्रों का प्रभावी संचालन करते हुए सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों के बीच बेहतर संवाद स्थापित किया।

कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष डॉ. रेनू गुप्ता, सीएमएस डॉ. अनीता गौतम सहित विभिन्न विभागों के अनेक वरिष्ठ चिकित्सक एवं मेडिकल कॉलेज के संकाय सदस्य भी उपस्थित रहे।

चिकित्सा शिक्षा में ऐसे कार्यक्रमों की अहम भूमिका

विशेषज्ञों का कहना है कि चिकित्सा विज्ञान लगातार विकसित हो रहा है। ऐसे में चिकित्सकों के ज्ञान और कौशल को अद्यतन बनाए रखने के लिए सीएमई जैसे शैक्षणिक कार्यक्रम अत्यंत आवश्यक हैं।

इन कार्यक्रमों के माध्यम से चिकित्सकों को नवीनतम शोध, उपचार पद्धतियों और अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों की जानकारी मिलती है, जिसका सीधा लाभ मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाओं के रूप में मिलता है।

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में आयोजित डीआईसी विषयक सीएमई ने प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों, अन्य विभागों के चिकित्सकों और पीजी विद्यार्थियों को गंभीर प्रसूति आपात स्थितियों के प्रभावी प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि डीआईसी जैसी गंभीर स्थिति में समय पर पहचान, बहुविषयक टीमवर्क, आधुनिक उपचार और समन्वित चिकित्सा व्यवस्था मातृ मृत्यु दर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इस प्रकार का शैक्षणिक सम्मेलन न केवल चिकित्सकों के ज्ञानवर्धन के लिए उपयोगी साबित हुआ, बल्कि भविष्य में मरीजों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है

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