इटावा में बुजुर्ग राजकुमार सक्सेना का अपनों ने नहीं किया अंतिम संस्कार, संस्था ने निभाया फर्ज – जानिए कौन थे वो
रिपोर्ट – रोहित सिंह चौहान
इटावा: उत्तर प्रदेश के इटावा से रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक मामला सामने आया है। 70 वर्षीय राजकुमार सक्सेना की सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में इलाज के दौरान मौत के बाद उनके शव को लेने और अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए परिवार का कोई सदस्य आगे नहीं आया। परिवार की पहचान होने के बावजूद जब उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी किसी अपने ने नहीं उठाई, तो रक्तदाता समूह के सदस्यों और पुलिस की मौजूदगी में बुजुर्ग का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कराया गया।
राजकुमार सक्सेना मूल रूप से एटा के मारहरा के रहने वाले बताए गए हैं। जानकारी के मुताबिक, वह करीब दो साल से एटा के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में भर्ती कराया गया था। उपचार के दौरान 12 अगस्त को उनकी मौत हो गई। इसके बाद अस्पताल प्रशासन और पुलिस की ओर से उनके परिजनों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन अंतिम विदाई के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं पहुंचा।
12 अगस्त को इलाज के दौरान हुई मौत
जानकारी के अनुसार, राजकुमार सक्सेना की तबीयत 16 जुलाई को बिगड़ी थी। इसके बाद उन्हें सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी के अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों ने उनका इलाज किया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका। आखिरकार 12 अगस्त को उन्होंने दम तोड़ दिया।
मौत के बाद अस्पताल में जब कोई करीबी रिश्तेदार शव लेने के लिए नहीं पहुंचा तो मामले की जानकारी रक्तदाता समूह के पदाधिकारियों को दी गई। इसके बाद समूह के संस्थापक शरद तिवारी और उनके साथियों ने राजकुमार के परिवार की तलाश शुरू की।
अस्पताल और पुलिस की ओर से भी उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर परिजनों से संपर्क करने का प्रयास किया गया। शव को नियमानुसार 72 घंटे के लिए शवगृह में रखा गया, ताकि परिवार के किसी सदस्य के सामने आने की संभावना बनी रहे।
दस्तावेजों से मिली परिवार की जानकारी
रक्तदाता समूह के सदस्यों को राजकुमार सक्सेना के पास उपलब्ध दस्तावेजों से उनके बेटे कुबेर सक्सेना का नाम और गाजियाबाद का पता मिला। इसके बाद मोबाइल फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की गई।
समूह के पदाधिकारियों के मुताबिक, परिवार से संपर्क करने के दौरान राजकुमार की पहचान को लेकर बातचीत हुई। वहीं, अस्पताल के काउंसलर डॉ. मनोज मौर्य ने भी बेटे से फोन पर बात कर उन्हें पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए समझाने का प्रयास किया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार परिवार की ओर से शव लेने या अंतिम संस्कार में शामिल होने को लेकर सकारात्मक पहल नहीं हुई।
इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों की तलाश भी शुरू की गई। राजकुमार के भतीजे पंकज सक्सेना से संपर्क हुआ। उन्होंने बताया कि राजकुमार के तीन बेटे कुबेर, भारत और धादू गाजियाबाद में रहते हैं। इसके अलावा उनकी एक बेटी और पत्नी के जीवित होने की जानकारी भी सामने आई।
घर पहुंचने पर मिला ताला
परिवार की तलाश में जुटे रक्तदाता समूह के सदस्य गाजियाबाद के नंदग्राम, दीनदयालपुर स्थित बताए गए पते पर भी पहुंचे। वहां उन्हें मकान पर ताला लगा मिला। पड़ोसियों ने बताया कि मकान कुबेर सक्सेना का है।
पुलिस की ओर से भी परिवार के सदस्यों से संपर्क करने का प्रयास किया गया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुबेर सक्सेना मौके पर नहीं मिले। इस मामले में बेटों या परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से कोई प्रत्यक्ष सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए परिवार की ओर से अंतिम संस्कार में शामिल न होने के कारणों की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
कभी कारोबारी रहे राजकुमार
परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार, राजकुमार सक्सेना कभी आर्थिक रूप से संपन्न कारोबारी थे। उनके परिवार के पास संपत्ति और जमीन होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, समय के साथ उनकी परिस्थितियां बदलती गईं और वह वृद्धाश्रम में रहने लगे।
भतीजे पंकज सक्सेना के अनुसार, राजकुमार के पिता एटा की अदालत में मुंशी थे और परिवार के पास जमीन भी थी। परिवार में संपत्ति या पैसों को लेकर विवाद रहने की बात भी सामने आई है। हालांकि, ये पारिवारिक दावे हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए राजकुमार के पारिवारिक जीवन और उनके परिवार से दूरी के वास्तविक कारणों को लेकर अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
रक्तदाता समूह ने निभाई जिम्मेदारी
जब परिवार की ओर से अंतिम संस्कार के लिए कोई आगे नहीं आया तो रक्तदाता समूह ने मानवीय जिम्मेदारी निभाने का निर्णय लिया। समूह के संस्थापक शरद तिवारी और उनके साथियों ने बुजुर्ग के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की।
शरद तिवारी ने कहा कि राजकुमार का अंतिम संस्कार करते समय उन्हें काफी भावुक स्थिति का सामना करना पड़ा। उनका कहना था कि परिवार में तीन बेटे, एक बेटी और पत्नी होने के बावजूद अंतिम विदाई के समय किसी का मौजूद न होना बेहद संवेदनशील स्थिति है।
वहीं, रक्तदाता समूह के सदस्य आदित्य शाक्य ने बताया कि उनके जीवन में यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें परिवार की जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद किसी सदस्य ने बुजुर्ग के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी नहीं उठाई।
72 घंटे बाद पूरी हुई प्रक्रिया
पुलिस और अस्पताल की प्रक्रिया के तहत राजकुमार सक्सेना के शव को 72 घंटे तक शवगृह में रखा गया। इस दौरान परिवार के सदस्यों की तलाश और उनसे संपर्क की कोशिश जारी रही। लेकिन तय अवधि के भीतर कोई परिजन शव लेने नहीं पहुंचा।
इसके बाद 15 अगस्त को शाम करीब पांच बजे इटावा में यमुना नदी के किनारे स्थित श्मशान घाट पर राजकुमार सक्सेना का अंतिम संस्कार किया गया। हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई।
इस दौरान सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी पुलिस चौकी के प्रभारी राजीव कुमार पुलिस टीम के साथ मौजूद रहे। रक्तदाता समूह के पदाधिकारियों और सदस्यों ने भी अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई।
रिश्तों की संवेदना पर उठे सवाल
राजकुमार सक्सेना की कहानी कई सामाजिक सवाल भी खड़े करती है। परिवार और रिश्तों की अहमियत केवल जीवन के सुख-दुख तक सीमित नहीं होती, बल्कि किसी व्यक्ति की अंतिम विदाई भी पारिवारिक जिम्मेदारियों का हिस्सा मानी जाती है। ऐसे में इस मामले ने समाज में बदलते पारिवारिक संबंधों को लेकर चर्चा जरूर शुरू कर दी है।
हालांकि, परिवार के सदस्यों की अपनी परिस्थितियां या इस दूरी के पीछे क्या कारण रहे, इसकी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इस मामले को लेकर किसी व्यक्ति या परिवार पर सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
फिलहाल इतना जरूर सामने आया है कि राजकुमार सक्सेना की पहचान होने के बावजूद उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी परिवार के किसी सदस्य ने नहीं उठाई। ऐसे में रक्तदाता समूह के सदस्यों ने आगे बढ़कर उनका अंतिम संस्कार कराया।
मानवीय पहल बनी मिसाल
राजकुमार सक्सेना की अंतिम यात्रा में परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था, लेकिन रक्तदाता समूह और पुलिस की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें सम्मानजनक विदाई मिले। संस्था के सदस्यों ने उनके अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई।
कुल मिलाकर, इटावा का यह मामला पारिवारिक संबंधों के साथ-साथ समाज में मानवीय जिम्मेदारी के महत्व को भी सामने लाता है। राजकुमार सक्सेना ने जीवन के अंतिम समय में अपनों का साथ भले न पाया हो, लेकिन अजनबी लोगों ने उनकी अंतिम विदाई को सम्मान के साथ पूरा किया। यह घटना इस बात की ओर भी ध्यान दिलाती है कि किसी जरूरतमंद या अकेले बुजुर्ग के लिए सामाजिक संस्थाएं और संवेदनशील नागरिक किस तरह सहारा बन सकते हैं।

