केडीए को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, 12,008 वर्ग गज सीलिंग भूमि पर प्राधिकरण के पक्ष में फैसला

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रिपोर्ट- विक्की रघुवंशी

कानपुर: कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) को सीलिंग भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। ग्राम बारा, सिरोही तहसील सदर में स्थित आराजी संख्या 357, 358, 359 और 360 की कुल 12,008 वर्ग गज भूमि को लेकर लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया का अब अंत हो गया है। उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने इस मामले में दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए भूमि से संबंधित निर्णय केडीए के पक्ष में सुनाया है।

यह मामला करीब 16 वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित था। वर्ष 2010 में संबंधित पक्षों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल किए जाने के बाद अदालत ने स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके चलते इतने लंबे समय तक उक्त भूमि के संबंध में प्राधिकरण की ओर से आगे की कार्रवाई और निस्तारण की प्रक्रिया प्रभावित रही। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद केडीए के लिए इस भूमि को लेकर आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया है।

12,008 वर्ग गज भूमि से जुड़ा है मामला

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम बारा, सिरोही तहसील सदर में स्थित आराजी संख्या 357, 358, 359 और 360 की कुल भूमि का क्षेत्रफल 12,008 वर्ग गज है। आवासीय सर्किल दर के आधार पर इस भूमि का अनुमानित मूल्य करीब 39 करोड़ 65 लाख 80 हजार रुपये बताया गया है।

यानी यह भूमि न केवल क्षेत्रफल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि वर्तमान आवासीय सर्किल दर के हिसाब से इसका आर्थिक मूल्य भी काफी अधिक है। ऐसे में इस भूमि से संबंधित न्यायालय का फैसला केडीए के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नगर भूमि सीमा कानून के तहत घोषित हुई थी सीलिंग भूमि

इस भूमि से जुड़ा विवाद नगर भूमि सीमा संबंधी कानून के प्रावधानों के तहत शुरू हुआ था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संबंधित भूमि को नगर भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 के प्रावधानों के तहत सीमाधिक्य भूमि घोषित किया गया था। इसके बाद भूमि पर कब्जा प्राधिकरण को प्राप्त कराया गया था।

सीलिंग कानून का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित करना और निर्धारित सीमा से अधिक भूमि के संबंध में कानूनी प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई करना था। इसी कानूनी प्रक्रिया के तहत उक्त भूमि को सीमाधिक्य घोषित किए जाने के बाद इसका कब्जा प्राधिकरण को प्राप्त हुआ था।

हालांकि, बाद में भूमि से जुड़े पक्षकारों की ओर से इस कार्रवाई को न्यायालय में चुनौती दी गई। इसी चुनौती के चलते मामला लंबे समय तक अदालत में विचाराधीन रहा।

वर्ष 2010 में दाखिल हुई थी रिट याचिका

उक्त भूमि को लेकर कृष्ण कुमार मिश्रा व अन्य की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 12144/2010 दाखिल की गई थी। याचिका दाखिल होने के बाद मामले की सुनवाई न्यायालय में चलती रही।

रिट याचिका के दौरान वर्ष 2010 से ही स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश प्रभावी रहा। इस आदेश का सीधा असर भूमि के निस्तारण की प्रक्रिया पर पड़ा। चूंकि भूमि की स्थिति को लेकर न्यायालय का आदेश लागू था, इसलिए प्राधिकरण के लिए इस संपत्ति के संबंध में आगे की कार्रवाई करना संभव नहीं था।

इस प्रकार लगभग 16 वर्षों तक यह मामला कानूनी प्रक्रिया में बना रहा। इस अवधि में प्राधिकरण की ओर से भूमि का निस्तारण नहीं किया जा सका।

16 साल बाद समाप्त हुआ कानूनी विवाद

करीब डेढ़ दशक से अधिक समय तक लंबित रहने के बाद अब इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला आया है। उच्च न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही भूमि के संबंध में प्राधिकरण के पक्ष में निर्णय पारित किया गया।

इस फैसले को केडीए के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से न्यायालय के आदेश के कारण जिस भूमि के संबंध में कार्रवाई रुकी हुई थी, अब उस पर आगे की प्रक्रिया की संभावना बन गई है।

हालांकि, भूमि के वास्तविक निस्तारण, उपयोग या किसी अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया के संबंध में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, यह संबंधित नियमों और प्राधिकरण की आगामी कार्रवाई पर निर्भर करेगा।

करोड़ों की भूमि होने के कारण फैसला अहम

12,008 वर्ग गज भूमि का आवासीय सर्किल दर के अनुसार मूल्य करीब 39.65 करोड़ रुपये बताया गया है। ऐसे में हाईकोर्ट का फैसला आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय से कानूनी विवाद में फंसी इस संपत्ति को लेकर अब प्राधिकरण के स्तर पर आगे की प्रक्रिया की जा सकती है।

इसके अलावा, यह मामला इस बात को भी रेखांकित करता है कि भूमि से जुड़े विवादों में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक संबंधित संपत्ति का निस्तारण किस तरह प्रभावित हो सकता है। वर्ष 2010 में यथास्थिति का आदेश आने के बाद से प्राधिकरण इस भूमि के संबंध में अंतिम स्तर पर कार्रवाई नहीं कर सका था।

अब रिट याचिका खारिज होने और प्राधिकरण के पक्ष में निर्णय आने के बाद इस मामले की स्थिति बदल गई है।

केडीए के लिए आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ

हाईकोर्ट के आदेश के बाद केडीए के सामने अब संबंधित भूमि के संबंध में नियमानुसार आगे की कार्रवाई करने का अवसर उपलब्ध होगा। प्राधिकरण को भूमि के दस्तावेजों, पूर्व में की गई कार्रवाई और न्यायालय के आदेश के अनुरूप आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

वहीं, इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि लंबे समय से लंबित भूमि विवादों में न्यायालय के अंतिम निर्णय का प्रशासनिक और संपत्ति प्रबंधन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। केडीए के लिए यह फैसला इसलिए राहत वाला है क्योंकि करीब 16 वर्षों से न्यायिक स्थगन के कारण जिस भूमि का निस्तारण नहीं हो पाया था, अब उस पर आगे बढ़ने की स्थिति बनी है।

क्या है पूरे मामले का सार?

पूरे मामले को संक्षेप में देखें तो ग्राम बारा, सिरोही तहसील सदर में आराजी संख्या 357, 358, 359 और 360 की कुल 12,008 वर्ग गज भूमि को नगर भूमि सीमा संबंधी कानून के तहत सीमाधिक्य घोषित किया गया था। इसके बाद भूमि का कब्जा प्राधिकरण को प्राप्त कराया गया।

इसके विरुद्ध कृष्ण कुमार मिश्रा व अन्य ने वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 12144/2010 दाखिल की। न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। इसके कारण करीब 16 वर्षों तक भूमि का निस्तारण नहीं हो सका।

अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज करते हुए भूमि के संबंध में निर्णय केडीए के पक्ष में सुनाया है। इस फैसले के बाद संबंधित भूमि को लेकर प्राधिकरण की आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

फिलहाल, करीब 39.65 करोड़ रुपये की आवासीय सर्किल दर वाली इस भूमि पर हाईकोर्ट का फैसला केडीए के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। आगे प्राधिकरण न्यायालय के आदेश और लागू नियमों के अनुसार भूमि के संबंध में आवश्यक प्रक्रिया पूरी करेगा।

केडीए को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। बारा की 12,008 वर्ग गज सीलिंग भूमि पर 16 साल बाद फैसला प्राधिकरण के पक्ष में आया।