सावन के महीने में विशेष: जानिए भगवान शिव के गले में धारण की गई 108 मुण्ड माला का रहस्य और सती-पार्वती की दिव्य कथा

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Digital UP News Desk

श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र और शुभ समय माना जाता है। इस पूरे महीने में शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और शिव मंत्रों का जाप किया जाता है। भगवान शिव के स्वरूप का प्रत्येक अंग अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश समेटे हुए है। उनके जटाजूट में विराजमान गंगा, मस्तक पर अर्धचंद्र, गले में नाग और शरीर पर भस्म जितने रहस्यमयी हैं, उतनी ही रहस्यमयी उनके गले में सुशोभित मुण्ड माला भी मानी जाती है।

शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव के गले में धारण की गई यह माला केवल अलंकरण नहीं है, बल्कि जीवन, मृत्यु, पुनर्जन्म और आत्मा की अनश्वरता का प्रतीक मानी जाती है। श्रावण मास के अवसर पर आइए जानते हैं इस दिव्य मुण्ड माला का रहस्य और भगवान शिव तथा माता सती के अद्भुत प्रेम से जुड़ी प्रसिद्ध पौराणिक कथा।

भगवान शिव और माता सती का दिव्य संबंध

हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शिव और माता सती का संबंध आदर्श प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक माना गया है। सती, प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। अंततः उनका विवाह भगवान शिव से हुआ।

हालांकि, दक्ष भगवान शिव को अपना दामाद स्वीकार नहीं कर पाए। इसी कारण उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। जब माता सती बिना निमंत्रण के यज्ञ में पहुंचीं तो वहां भगवान शिव का अपमान होता देख वे अत्यंत व्यथित हुईं। अंततः उन्होंने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया।

इसके बाद भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हुए और सती के शरीर को अपने कंधों पर उठाकर तांडव करने लगे। पौराणिक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर गिराए, जहां आगे चलकर 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इस घटना को शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

नारद जी के प्रश्न से खुला मुण्ड माला का रहस्य

एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारद के प्रेरित करने पर माता सती ने भगवान शिव से उनके गले में धारण की गई मुण्ड माला का रहस्य जानने का आग्रह किया। प्रारंभ में भगवान शिव इस विषय पर मौन रहे, क्योंकि वे जानते थे कि यह रहस्य अत्यंत गूढ़ है। किंतु जब माता सती बार-बार आग्रह करती रहीं, तब उन्होंने इस रहस्य से पर्दा उठाया।

भगवान शिव ने कहा कि उनके गले में जितने भी मुण्ड हैं, वे किसी अन्य के नहीं बल्कि माता सती के ही पूर्व जन्मों के प्रतीक हैं। यह सुनकर माता सती आश्चर्यचकित रह गईं और उन्होंने भगवान शिव से इसका कारण पूछा।

108 जन्मों से जुड़ी पौराणिक मान्यता

भगवान शिव ने माता सती को बताया कि वर्तमान जन्म उनका 108वां जन्म है। इससे पहले वे 107 बार विभिन्न रूपों में जन्म लेकर अपना शरीर त्याग चुकी हैं। उनके प्रत्येक पूर्व जन्म की स्मृति के रूप में एक-एक मुण्ड इस माला में पिरोया गया है।

भगवान शिव ने आगे कहा कि उस समय इस माला में अभी एक मुण्ड की कमी है और वर्तमान जन्म के बाद यह माला पूर्ण हो जाएगी। इस प्रकार यह मुण्ड माला केवल जन्म और मृत्यु का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा और पुनर्जन्म के चक्र का भी संकेत मानी जाती है।

माता सती का प्रश्न और अमरत्व का रहस्य

भगवान शिव की बात सुनने के बाद माता सती ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें बार-बार जन्म लेकर शरीर त्याग करना पड़ता है, तो भगवान शिव ऐसा क्यों नहीं करते?

इस पर भगवान शिव मुस्कुराए और उत्तर दिया कि वे अमर कथा के ज्ञाता हैं। इसी कारण उन्हें शरीर त्यागने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान शिव ने बताया कि जो इस दिव्य ज्ञान का वास्तविक अर्थ समझ लेता है, वह जन्म और मृत्यु के बंधन से परे हो जाता है।

यह उत्तर सुनकर माता सती के मन में भी अमर कथा सुनने की इच्छा जागृत हुई।

जब अधूरी रह गई अमर कथा

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव माता सती को अमरत्व का रहस्य सुनाने लगे। उन्होंने एकांत स्थान का चयन किया ताकि इस गूढ़ ज्ञान को कोई अन्य न सुन सके।

कथा आरंभ हुई, लेकिन कुछ समय बाद माता सती को निद्रा आ गई। परिणामस्वरूप वे अमर कथा पूरी तरह नहीं सुन सकीं। मान्यता है कि इसी कारण उन्हें आगे चलकर दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर त्यागना पड़ा।

इसके बाद भगवान शिव ने माता सती के अंतिम जन्म का प्रतीक मुण्ड भी अपनी माला में पिरो लिया और इस प्रकार 108 मुण्डों की माला पूर्ण हुई।

पार्वती के रूप में पुनर्जन्म

शरीर त्यागने के बाद माता सती ने हिमालयराज के घर माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे पुनः विवाह किया।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस जन्म में माता पार्वती ने भगवान शिव के साथ दिव्य ज्ञान प्राप्त किया और उनका शिव से पुनर्मिलन सृष्टि के संतुलन का महत्वपूर्ण आधार बना।

108 संख्या का आध्यात्मिक महत्व

सनातन परंपरा में 108 संख्या को अत्यंत पवित्र माना जाता है। जपमाला में 108 मनके होते हैं, अनेक मंत्रों का जाप 108 बार करने की परंपरा है और योग तथा ध्यान में भी इस संख्या का विशेष महत्व बताया गया है।

इसी संदर्भ में भगवान शिव की 108 मुण्डों की माला को भी पूर्णता, आध्यात्मिक उन्नति और जीवन के चक्र का प्रतीक माना जाता है। यह कथा श्रद्धालुओं को यह संदेश देती है कि आत्मा अमर है, जबकि शरीर नश्वर है।

श्रावण मास में इस कथा का संदेश

श्रावण मास केवल पूजा-अर्चना का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का भी अवसर है। भगवान शिव की मुण्ड माला की यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में अहंकार का स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही यह भी संदेश मिलता है कि ज्ञान, भक्ति और समर्पण ही मनुष्य को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं।

हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह कथा विभिन्न पुराणों और लोकमान्यताओं में प्रचलित धार्मिक वर्णनों पर आधारित है। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में इसके विवरण में कुछ अंतर मिल सकते हैं। श्रद्धालु इसे आस्था और आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण करते हैं।

भगवान शिव के गले में धारण की गई 108 मुण्डों की माला केवल एक अलंकार नहीं, बल्कि जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म और आत्मा की अमरता का गहन प्रतीक मानी जाती है। श्रावण मास में इस पौराणिक कथा का स्मरण श्रद्धालुओं को भगवान शिव के प्रति भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसी कारण यह कथा आज भी शिवभक्तों के बीच विशेष श्रद्धा और आस्था के साथ सुनाई और पढ़ी जाती है।

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