इटावा में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में दो दोषियों को 20-20 साल की सजा, 63 हजार का जुर्माना

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रिपोर्ट – रोहित सिंह चौहान 

इटावा: उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में नाबालिग युवती के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के वर्ष 2021 के मामले में न्यायालय ने दो आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 20-20 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोनों दोषियों पर 63-63 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। यह फैसला टीआरसी कोर्ट की ओर से सुनाया गया। मामले में पुलिस की प्रभावी पैरवी और एडीजीसी मंजू शाक्य की ओर से न्यायालय में रखे गए पक्ष को सजा दिलाने में महत्वपूर्ण बताया गया है।

न्यायालय के इस फैसले से नाबालिग के साथ हुए अपराध के मामले में कानूनी कार्रवाई पूरी हुई है। वहीं, यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों में समयबद्ध जांच, साक्ष्यों का संकलन और न्यायालय में प्रभावी पैरवी कितनी महत्वपूर्ण होती है।

वर्ष 2021 में भरथना थाना क्षेत्र में हुई थी वारदात

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला इटावा जिले के भरथना थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2021 में दो आरोपियों जीतू और सागर पर एक नाबालिग युवती को अगवा करने और उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करने का आरोप लगा था। घटना के बाद पीड़िता से संबंधित शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू की थी।

पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच की और उपलब्ध साक्ष्यों तथा संबंधित तथ्यों को जुटाते हुए आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। चूंकि मामला नाबालिग से संबंधित था, इसलिए इसकी सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया में पीड़िता की पहचान तथा निजता की सुरक्षा का विशेष महत्व रहा।

हालांकि, घटना से जुड़ी विस्तृत परिस्थितियों और जांच के प्रत्येक चरण की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसलिए मामले के संबंध में वही तथ्य सामने रखे जा रहे हैं, जिनकी जानकारी पुलिस और अभियोजन पक्ष की ओर से दी गई है।

टीआरसी कोर्ट ने दोनों आरोपियों को माना दोषी

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा गया। पुलिस की ओर से जुटाए गए साक्ष्यों और अभियोजन की पैरवी के आधार पर न्यायालय ने दोनों आरोपियों जीतू और सागर को दोषी ठहराया।

इसके बाद टीआरसी कोर्ट ने दोनों को 20-20 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। साथ ही प्रत्येक दोषी पर 63 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। इस प्रकार दोनों आरोपियों पर कुल एक लाख 26 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।

सश्रम कारावास का अर्थ है कि दोषी को जेल में सजा काटने के दौरान निर्धारित नियमों के अनुसार श्रम भी करना होता है। हालांकि, सजा से संबंधित अन्य शर्तों और जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में लागू होने वाले प्रावधानों का विस्तृत विवरण उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।

पुलिस और एडीजीसी की पैरवी रही अहम

इस मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष की ओर से न्यायालय में प्रभावी पैरवी की गई। एडीजीसी मंजू शाक्य ने अभियोजन की ओर से न्यायालय में पक्ष रखा। वहीं, पुलिस ने विवेचना के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में सहयोग किया।

किसी भी आपराधिक मामले में केवल प्राथमिकी दर्ज होना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि जांच के दौरान साक्ष्यों का सही तरीके से संकलन और उनका न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा, गवाहों के बयान और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अभियोजन पक्ष को अपना मामला साबित करना होता है।

इसी प्रक्रिया के तहत इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और अंततः न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई। पुलिस और अभियोजन पक्ष की पैरवी को इस फैसले में महत्वपूर्ण बताया गया है।

महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों में कानूनी कार्रवाई का महत्व

नाबालिगों के विरुद्ध अपराधों से जुड़े मामलों में कानून विशेष संरक्षण प्रदान करता है। ऐसे मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी होती है कि शिकायत मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए, पीड़ित की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और जांच के दौरान आवश्यक साक्ष्य जुटाए जाएं।

इसके साथ ही अभियोजन पक्ष की भूमिका भी अहम होती है, क्योंकि न्यायालय में मामले से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना आवश्यक है। वहीं, न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनों के आधार पर अपना निर्णय सुनाता है।

इटावा के भरथना क्षेत्र से जुड़े इस मामले में वर्ष 2021 की घटना के बाद चली कानूनी प्रक्रिया के अंत में दोनों आरोपियों को 20-20 साल की सजा सुनाई गई है। इसके अलावा, प्रत्येक दोषी पर 63 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

पीड़िता की पहचान गोपनीय रखना जरूरी

नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना कानूनन प्रतिबंधित है। इसलिए ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय नाम, पता, परिवार की पहचान या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए, जिससे पीड़िता की पहचान उजागर हो सके।

इस मामले में भी पीड़िता की निजता को ध्यान में रखते हुए उसकी पहचान से जुड़ी कोई जानकारी साझा नहीं की गई है।

कुल मिलाकर, इटावा के भरथना थाना क्षेत्र में वर्ष 2021 में हुई इस घटना के मामले में टीआरसी कोर्ट का फैसला सामने आया है। न्यायालय ने जीतू और सागर को दोषी ठहराते हुए दोनों को 20-20 वर्ष के सश्रम कारावास और 63-63 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। पुलिस और एडीजीसी मंजू शाक्य की पैरवी के बाद आए इस फैसले को नाबालिग से जुड़े अपराध के मामले में महत्वपूर्ण न्यायिक कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।

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