पोलैंड में सत्ता और संविधान की जंग तेज, कोर्ट अध्यक्ष निलंबित; राष्ट्रपति ने बीच में छोड़ा अफ्रीका दौरा

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Digital UP News

वारसॉ। यूरोप के देश पोलैंड में राजनीतिक और संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और विपक्षी दलों के बीच न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा संवैधानिक न्यायालय के अधिकारों को लेकर जारी टकराव अब सड़कों तक पहुंच गया है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को संवैधानिक न्यायालय के अध्यक्ष बोगदान स्विएंत्चकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोखांस्की को एक महीने के लिए उनके दायित्वों से अलग किए जाने का आदेश सामने आया। हालांकि, इस कार्रवाई की वैधता को लेकर न्यायालय के भीतर ही विवाद खड़ा हो गया। स्थिति तनावपूर्ण होने पर न्यायालय परिसर में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।इस पूरे घटनाक्रम ने पोलैंड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार पर संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने और न्यायपालिका पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि न्यायपालिका में कानून का शासन बहाल करना और संवैधानिक संस्थाओं को सुचारु रूप से संचालित करना उसकी जिम्मेदारी है।

न्यायालय के अध्यक्ष को हटाने के आदेश से मचा राजनीतिक घमासान

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 30 अक्टूबर को पोलैंड के संवैधानिक न्यायालय में उस समय बड़ा घटनाक्रम हुआ, जब वरिष्ठ न्यायाधीश अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने न्यायालय के अध्यक्ष बोगदान स्विएंत्चकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोखांस्की को उनके आधिकारिक दायित्वों से एक महीने के लिए अलग करने का आदेश जारी किया। इस फैसले के बाद अन्ना ने न्यायालय की कार्यवाही का नेतृत्व संभालने की बात कही।उनका तर्क था कि न्यायालय का मौजूदा नेतृत्व संसद के वर्तमान बहुमत द्वारा निर्वाचित न्यायाधीशों को काम करने का अवसर देने में बाधा उत्पन्न कर रहा है। हालांकि, इस फैसले के बाद न्यायालय के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए। न्यायालय की ओर से जारी बयान में इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए गए और कहा गया कि मौजूदा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष अपने पदों पर बने हुए हैं।

न्यायालय परिसर में पुलिस का पहरा, प्रदर्शनकारियों ने किया विरोध

न्यायालय के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को दायित्वों से अलग किए जाने की खबर सामने आते ही राजधानी वारसॉ में राजनीतिक हलचल तेज हो गई। विपक्षी दल लॉ एंड जस्टिस पार्टी के समर्थक न्यायालय के बाहर जुटने लगे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के खिलाफ नारेबाजी की।स्थिति को देखते हुए पुलिस ने न्यायालय परिसर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई और प्रवेश मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बाड़ पार करने की कोशिश की और पुलिसकर्मियों की ओर वस्तुएं फेंकीं। पुलिस के अनुसार, इस घटनाक्रम में तीन लोगों को हिरासत में लिया गया।

संवैधानिक संकट के बीच राष्ट्रपति ने बीच में छोड़ा सेनेगल दौरा

पोलैंड के राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की की अचानक स्वदेश वापसी इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू रही। राष्ट्रपति उस समय अफ्रीकी देश सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे थे। वहां उनकी महत्वपूर्ण राजनयिक मुलाकातें प्रस्तावित थीं, लेकिन संवैधानिक न्यायालय में बढ़ते विवाद और देश में तनावपूर्ण स्थिति की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा बीच में ही रोकने का फैसला किया।राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संदेश जारी करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थिति में उनका देश में मौजूद रहना आवश्यक है। इसके बाद उनका विमान वापस पोलैंड की ओर लौट आया। राष्ट्रपति की इस वापसी ने स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक संकट अब केवल सरकार और विपक्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की भी महत्वपूर्ण भूमिका बन गई है।

डोनाल्ड टस्क सरकार और विपक्ष में क्यों बढ़ रही है तनातनी?

पोलैंड में मौजूदा विवाद की जड़ें कई साल पुरानी हैं। वर्ष 2015 से 2023 के बीच लॉ एंड जस्टिस पार्टी (PiS) की सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की नियुक्तियों और न्यायिक सुधारों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। यूरोपीय संघ और कई कानूनी विशेषज्ञों ने उस दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए थे।

वर्ष 2023 में डोनाल्ड टस्क के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद न्यायिक व्यवस्था में सुधार और कानून के शासन को बहाल करने का वादा किया गया। हालांकि, इन सुधारों को लागू करने के दौरान सरकार और राष्ट्रपति के बीच लगातार मतभेद सामने आते रहे हैं। मौजूदा राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की को लॉ एंड जस्टिस पार्टी का समर्थक माना जाता है। ऐसे में न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्यायालय के संचालन को लेकर टकराव और गहरा गया है।

यूरोप की राजनीति पर भी पड़ सकता है पोलैंड संकट का असर

पोलैंड यूरोपीय संघ का महत्वपूर्ण सदस्य है। ऐसे में वहां न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा है। यूरोपीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को विशेष महत्व दिया जाता है।यदि सरकार, राष्ट्रपति और न्यायपालिका के बीच यह टकराव लंबा खिंचता है, तो इसका असर देश की प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक स्थिरता और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने फैसलों को संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क कानून का शासन बहाल करने की बात कर रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे न्यायपालिका में सरकारी हस्तक्षेप बता रहा है।

अब किसके हाथ में होगी संवैधानिक न्यायालय की कमान?

पोलैंड में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक न्यायालय का नेतृत्व किसके नियंत्रण में रहेगा और अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को दायित्वों से अलग करने की कार्रवाई को कानूनी रूप से किस तरह देखा जाएगा। इस मामले में न्यायालय के अधिकारों, न्यायाधीशों की नियुक्ति और राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका को लेकर आगे भी विवाद जारी रहने की आशंका है।

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