कानपुर देहात में कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार, दिवाली के लिए तैयार हो रहे मिट्टी के दीपक और करवे

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रिपोर्ट – विशाल मिश्रा

कानपुर देहात: दशहरा के बाद जिले में दीपावली और करवा चौथ की तैयारियां तेज हो गई हैं। त्योहारों का मौसम नजदीक आते ही कुम्हारों के चाक की रफ्तार बढ़ गई है। गांवों से लेकर कस्बों तक मिट्टी के दीपक और करवे बनाने का काम जोर पकड़ने लगा है। वहीं, कुम्हार परिवारों के सदस्य दीपकों को आकार देने, करवों को तैयार करने और उनकी रंगाई-पुताई में जुटे हुए हैं। त्योहारों की बढ़ती आहट के बीच इन परिवारों को उम्मीद है कि इस बार मिट्टी के पारंपरिक उत्पादों की मांग अच्छी रहेगी।

त्योहारों की तैयारी में जुटे कुम्हार परिवार

दीपावली और करवा चौथ भारतीय संस्कृति के प्रमुख त्योहारों में शामिल हैं। इन अवसरों पर मिट्टी के दीपकों और करवों का विशेष महत्व होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए कानपुर देहात के कुम्हारों ने अपने काम में तेजी ला दी है। चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीपक और करवे तैयार किए जा रहे हैं। इसके बाद इन्हें सुखाने, पकाने और जरूरत के अनुसार रंगने का काम किया जा रहा है।

दरअसल, त्योहारों के दौरान समय पर उत्पाद तैयार करना कुम्हारों के लिए बड़ी चुनौती होता है। इसलिए परिवार के सदस्य पहले से ही तैयारी में जुट जाते हैं। कोई मिट्टी को तैयार करता है, तो कोई चाक पर दीपक बनाता है। वहीं, परिवार के अन्य सदस्य तैयार उत्पादों की रंगाई-पुताई और सजावट में सहयोग करते हैं। इस तरह घर के अधिकतर सदस्य मिलकर त्योहारों के लिए मिट्टी के बर्तनों और दीपकों का उत्पादन करते हैं।

डिजाइनर दीपकों और रंग-बिरंगे करवों की तैयारी

बदलते समय के साथ त्योहारों में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक वस्तुओं के स्वरूप में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। अब साधारण दीपकों के साथ आकर्षक डिजाइन वाले मिट्टी के दीपक भी तैयार किए जा रहे हैं। इनकी सजावट और रंगाई-पुताई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार उत्पाद खरीद सकें।

इसके अलावा, करवा चौथ को देखते हुए मिट्टी के करवों की तैयारी भी की जा रही है। कुम्हार इन्हें अलग-अलग आकार में तैयार कर रहे हैं। सूखने के बाद करवों पर रंग-रोगन किया जाता है, जिससे वे आकर्षक दिखाई दें। त्योहारों के दौरान इन उत्पादों की बिक्री से कुम्हार परिवारों को अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद रहती है।

पहले रहती थी मिट्टी के दीपकों और करवों की अधिक मांग

स्थानीय कुम्हारों के मुताबिक, करीब एक दशक पहले तक करवा चौथ और दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीपकों तथा करवों की मांग काफी अधिक रहती थी। उस समय त्योहार से कई सप्ताह पहले ही उत्पादन शुरू करना पड़ता था। कई बार मांग इतनी बढ़ जाती थी कि समय पर सभी ग्राहकों की जरूरत पूरी करना मुश्किल हो जाता था।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में बाजार में बदलाव आया है। तांबे और पीतल के करवों का प्रचलन बढ़ा है। इसके साथ ही बिजली की झालरों और अन्य सजावटी लाइटों की लोकप्रियता ने भी पारंपरिक मिट्टी के दीपकों के बाजार को प्रभावित किया है। ऐसे में कुम्हारों के सामने अपनी पारंपरिक कला को बनाए रखने और बाजार की जरूरतों के अनुसार उत्पादन करने की चुनौती है।

इसके बावजूद मिट्टी के दीपकों और करवों का महत्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और पारंपरिक रीति-रिवाजों में इनका उपयोग आज भी किया जाता है। यही वजह है कि कुम्हारों को त्योहारों के मौसम में बिक्री की उम्मीद बनी रहती है।

अकबरपुर से रूरा तक तेज हुआ उत्पादन

कानपुर देहात के अकबरपुर, रूरा, रसूलाबाद और मूसानगर सहित कई कस्बों तथा गांवों में मिट्टी के दीपक और करवे बनाने का काम तेज हो गया है। इन क्षेत्रों में कुम्हार परिवार त्योहारों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लगातार उत्पाद तैयार कर रहे हैं।

रूरा के गरीबे प्रजापति, पप्पू प्रजापति, बबलू प्रजापति और सुनील प्रजापति सहित अन्य कुम्हार दीपक बनाने के काम में जुटे हैं। परिवार के सदस्य दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, ताकि त्योहार से पहले पर्याप्त संख्या में दीपक तैयार किए जा सकें। इसके बाद इन्हें बाजार में बिक्री के लिए पहुंचाया जाएगा।

पारंपरिक कला और रोजगार का माध्यम है कुम्हारी

मिट्टी के दीपक बनाना केवल एक पारंपरिक काम नहीं, बल्कि अनेक परिवारों की आजीविका का साधन भी है। त्योहारों के समय होने वाली बिक्री से कुम्हार परिवारों को रोजगार मिलता है। साथ ही, मिट्टी से उपयोगी और सजावटी वस्तुएं बनाने की सदियों पुरानी कला भी आगे बढ़ती है।

आज बिजली की रोशनी और आधुनिक सजावटी उत्पादों का चलन बढ़ने के बावजूद मिट्टी के दीपकों की अपनी अलग पहचान है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाले दीपकों की खरीदारी कुम्हार परिवारों के काम को प्रोत्साहन दे सकती है।

कुल मिलाकर, कानपुर देहात में त्योहारों को लेकर बाजार और कुम्हारों के घरों में हलचल बढ़ गई है। चाक पर आकार लेते दीपक और रंगाई-पुताई के लिए तैयार करवे इस बात का संकेत हैं कि पारंपरिक कारीगर दीपावली की तैयारी में पूरी मेहनत से जुटे हैं। अब उन्हें त्योहार के दौरान अच्छी बिक्री होने और अपनी मेहनत का उचित लाभ मिलने की उम्मीद है।