जानिए कहां है नेपाल के बाद दूसरा पशुपतिनाथ महादेव मंदिर: पढ़िए इतिहास और अद्भुत मान्यताओं का संगम
Digital UP News Desk
कुरुक्षेत्र: भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में भगवान शिव के अनगिनत प्राचीन मंदिर अपनी अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं में हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पिहोवा (प्राचीन पृथूदक) स्थित श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता और धार्मिक मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है, बल्कि इसे नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के बाद दूसरा प्रमुख पशुपतिनाथ मंदिर भी माना जाता है। यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर भगवान शिव की कृपा, बाबा श्रवण नाथ की तपस्या और अनेक लोक विश्वास का साक्षी रहा है। विशेष रूप से यहां स्थित जलहेड़ी के जल को बीमार पशुओं के लिए लाभकारी माना जाता है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इस मंदिर की अलग पहचान है।
बाबा श्रवण नाथ की तपस्या से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
पिहोवा स्थित इस प्राचीन मंदिर की देखरेख श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा द्वारा की जाती है। मान्यता है कि इसी स्थान पर संत बाबा श्रवण नाथ ने वर्षों तक कठोर तपस्या कर भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सिद्धि प्रदान की। बाद में बाबा श्रवण नाथ ने इसी स्थान पर श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर का निर्माण कराया।
बताया जाता है कि यह स्थान कभी बाबा श्रवण नाथ की हवेली हुआ करता था, जिसे बाद में धार्मिक स्थल के रूप में विकसित किया गया। आज भी श्रद्धालु बाबा श्रवण नाथ की तपोस्थली के रूप में इस स्थान का विशेष सम्मान करते हैं।
नेपाल के बाद दूसरा प्रमुख पशुपतिनाथ मंदिर
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे विश्व में भगवान पशुपतिनाथ के दो प्रमुख मंदिर माने जाते हैं। पहला नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर और दूसरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पिहोवा में स्थित यह प्राचीन मंदिर।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित भगवान शिव का पंचमुखी शिवलिंग है। बताया जाता है कि यह शिवलिंग कसौटी पत्थर की एक ही शिला से निर्मित है। इसके चार मुख चारों दिशाओं की ओर हैं, जबकि पांचवां मुख ऊपर की ओर स्थित है। मान्यता है कि यह दुर्लभ पत्थर नेपाल से लाया गया था। कसौटी पत्थर का उपयोग पारंपरिक रूप से सोने की शुद्धता की पहचान के लिए भी किया जाता रहा है।
जलहेड़ी का जल माना जाता है विशेष
मंदिर के पुजारी पंडित विक्रांत के अनुसार, यहां स्थित जलहेड़ी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत विशेष है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस जल का उपयोग बीमार पशुओं के लिए लाभकारी माना जाता है। हालांकि यह एक धार्मिक मान्यता है और इसका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, फिर भी श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ यहां जल अर्पित करते हैं तथा अपने पशुओं के स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
इसी प्रकार मंदिर में गाय का पहला दूध भगवान पशुपतिनाथ को अर्पित करने की भी वर्षों पुरानी परंपरा चली आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक परिवार आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं।
12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के बाद यहां आने की मान्यता
श्रद्धालुओं के बीच यह भी मान्यता प्रचलित है कि भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के पश्चात पिहोवा स्थित पशुपतिनाथ महादेव के दर्शन करना विशेष फलदायी माना जाता है। इसी कारण कई श्रद्धालु अपनी शिव तीर्थ यात्रा के दौरान इस मंदिर को भी अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बनाते हैं।
हालांकि यह धार्मिक विश्वास है और विभिन्न परंपराओं में इसकी मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं, फिर भी शिव भक्तों के बीच इस मंदिर का विशेष स्थान बना हुआ है।
मंदिर के नीचे स्थित है प्राचीन गुफा
मंदिर सरस्वती नदी के प्राचीन तट क्षेत्र में स्थित है। यहां मंदिर के नीचे एक प्राचीन गुफा भी मौजूद है। मान्यता है कि बाबा श्रवण नाथ इसी गुफा में बैठकर तपस्या किया करते थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह गुफा कुरुक्षेत्र तक जाती थी। हालांकि वर्तमान समय में इस मार्ग को बंद कर दिया गया है। मंदिर परिसर में संचालित बाबा श्रवण नाथ स्कूल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस गुफा के प्रवेश मार्ग को सील कर दिया गया है। यह गुफा आज भी श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई है।
1763 में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार
ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार वर्ष 1763 में इस मंदिर का व्यापक जीर्णोद्धार कराया गया था। मंदिर की वास्तुकला आज भी अपनी प्राचीन शैली को सुरक्षित रखे हुए है।
मंदिर में बने विशाल गुंबद, चूने से निर्मित मजबूत छतें तथा पारंपरिक नक्काशी उस दौर की उत्कृष्ट स्थापत्य कला का परिचय देती हैं। यही कारण है कि धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सोमवार, मंगलवार और शिवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
भगवान शिव के प्रति श्रद्धा रखने वाले भक्त विशेष रूप से सोमवार और मंगलवार को बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं। इसके अलावा महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
वहीं चैत्र माह में आयोजित होने वाला वार्षिक मेला भी इस मंदिर की प्रमुख पहचान है। इस दौरान हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करते हैं।
परिसर में स्थित है दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर
पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में भगवान हनुमान का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है। यहां अष्टधातु से निर्मित लगभग आठ फीट ऊंची दक्षिणमुखी हनुमान प्रतिमा स्थापित है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा खुदाई के दौरान बाबा श्रवण नाथ को प्राप्त हुई थी। कहा जाता है कि वे इस प्रतिमा को हरिद्वार ले जाकर स्थापित करना चाहते थे, लेकिन अनेक प्रयासों के बावजूद प्रतिमा को वहां से हटाया नहीं जा सका। इसके बाद इसे इसी स्थान पर विधिवत स्थापित कर दिया गया।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि लगातार 11 मंगलवार तक भगवान हनुमान को चोला चढ़ाने और श्रद्धा पूर्वक पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह भी एक धार्मिक मान्यता है, जिसे भक्त पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं।
आस्था, इतिहास और संस्कृति का अनूठा केंद्र
पिहोवा का पशुपतिनाथ महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, प्राचीन इतिहास और लोक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के साथ-साथ मंदिर की ऐतिहासिक वास्तुकला, बाबा श्रवण नाथ की तपोस्थली और धार्मिक परंपराओं को भी निकट से अनुभव करते हैं।
इसी वजह से यह मंदिर हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। यदि कोई व्यक्ति हरियाणा के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्रा की योजना बना रहा है, तो कुरुक्षेत्र के पिहोवा स्थित श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर निश्चित रूप से उसकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव हो सकता है।
हर-हर महादेव।

