आरोपी के सरेंडर के लिए निर्दोष परिजन को हिरासत में रखना गैरकानूनी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया ₹40 हजार जुर्माना
रिपोर्ट – डिजिटल उप्रन्यूज़
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति को पुलिस के सामने सरेंडर कराने के उद्देश्य से उसके निर्दोष परिजन को हिरासत में रखना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। पुलिस किसी ऐसे व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीन सकती, जिसका संबंधित अपराध से प्रथम दृष्टया कोई संबंध न हो।
अदालत ने मामले में याचिकाकर्ता को कथित तौर पर गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने पर 40 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि उस गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूल की जाए। कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों के आचरण को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का भी निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला याचिकाकर्ता अरविंद कुमार यादव से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि उनके भाई के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले में पुलिस ने उन्हें 23 जून 2026 को जौनपुर स्थित उनके घर से उठाया और प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने ले गई।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उनका उस आपराधिक मामले से कोई सीधा संबंध नहीं था। इसके बावजूद उन्हें पुलिस थाने में रखा गया। अदालत के समक्ष पेश किए गए रिकॉर्ड, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और CCTV फुटेज की जानकारी के आधार पर प्रथम दृष्टया यह सामने आया कि याचिकाकर्ता को कम से कम चार दिनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता स्वयं उस अपराध में शामिल नहीं थे। ऐसे में उन्हें उनके भाई पर दबाव बनाने और उसे पुलिस के सामने सरेंडर कराने के उद्देश्य से हिरासत में रखा जाना प्रथम दृष्टया उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से गैरकानूनी वंचना के रूप में सामने आता है।
आरोपी पर दबाव बनाने के लिए परिजन को हिरासत में रखना गलत
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कानून पुलिस को किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल इसलिए हिरासत में लेने की अनुमति नहीं देता कि उसके माध्यम से किसी अन्य आरोपी पर दबाव बनाया जा सके।
अदालत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति संबंधित अपराध में आरोपी या संदिग्ध नहीं है, तो केवल उसके रिश्तेदार होने के आधार पर उसे पुलिस हिरासत में रखना उसकी स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। इसके अलावा, किसी आरोपी को सरेंडर कराने के लिए उसके परिवार के सदस्य को थाने में रखना पुलिस की वैधानिक शक्तियों के दायरे से बाहर माना जा सकता है।
इस मामले में अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को गंभीरता से लेते हुए मुआवजे का आदेश दिया है। यह आदेश पुलिस हिरासत में व्यक्ति के अधिकारों और जांच के दौरान पुलिस की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूला जाएगा मुआवजा
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 40,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। खास बात यह है कि अदालत ने इस राशि की वसूली संबंधित गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से करने का आदेश दिया है।
इस आदेश के जरिए अदालत ने यह भी संकेत दिया कि पुलिस अधिकारियों द्वारा अपनी शक्तियों के कथित दुरुपयोग की स्थिति में व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है। यानी किसी व्यक्ति को बिना वैधानिक आधार के हिरासत में रखने की स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों पर आर्थिक जिम्मेदारी भी डाली जा सकती है।
दो पुलिस अधिकारियों के आचरण पर कोर्ट की नाराजगी
मामले में अदालत ने SHO योगेंद्र कुमार सिंह और जांच अधिकारी (IO) अश्वनी साविता के आचरण पर भी नाराजगी व्यक्त की। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों अधिकारियों के आचरण को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।
अदालत का यह निर्देश पुलिस अधिकारियों के लिए जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जांच के दौरान पुलिस को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों का पालन करना आवश्यक है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
भारतीय कानून व्यवस्था में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। पुलिस को अपराध की जांच और आरोपियों की तलाश करने का अधिकार है, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया के दायरे में ही किया जाना चाहिए।
विशेष रूप से किसी आरोपी के परिवार के सदस्य को केवल इसलिए हिरासत में लेना कि आरोपी पुलिस के सामने पेश हो जाए, एक अलग कानूनी सवाल खड़ा करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश इसी पहलू को रेखांकित करता है।
दरअसल, आपराधिक जांच का उद्देश्य संबंधित अपराध की सच्चाई तक पहुंचना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना है। इसलिए जांच एजेंसियों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान या हिरासत में न रखें।
क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश?
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पुलिस की जांच शक्तियों और आम नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच कानूनी संतुलन पर जोर दिया गया है। अदालत ने साफ किया कि किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उसके निर्दोष परिजन को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इस मामले में अदालत के समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर दिए गए निष्कर्ष मामले के तथ्यों तक सीमित हैं। फिर भी, आदेश में पुलिस की जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी सामने आई है।
इस प्रकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां पुलिस पर आरोपियों के परिवार या परिचितों को दबाव बनाने के लिए हिरासत में लेने के आरोप लगते हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराध की जांच के दौरान भी नागरिकों की स्वतंत्रता तथा कानूनी अधिकारों का सम्मान किया जाना आवश्यक है।

