कानपुर में दुष्कर्म-पॉक्सो मामले में चार आरोपी बरी, किराएदारी विवाद का मामला

12345anu

रिपोर्टर/ हनुमंत सिंह पिंटू

कानपुर। कानपुर नगर के बजरिया थाना क्षेत्र से जुड़े करीब दो साल पुराने दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के मामले में अदालत ने चार आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत के फैसले के बाद बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य सामने नहीं आए और मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता की गवाही ने अभियोजन की कहानी पर सवाल खड़े किए। बचाव पक्ष के अनुसार, पूरा मामला मकान की किराएदारी से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि में सामने आया था।

मामले में सऊद, उसके भाई दाऊद, उनकी मां शाहजहां बेगम और यतीमखाना प्रबंधक मेहदी हसन आरोपी बनाए गए थे। इन सभी के खिलाफ बजरिया थाने में वर्ष 2022 में गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस की विवेचना के बाद आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया और इसके बाद मामला अदालत में विचारण के लिए पहुंचा।

2022 में दर्ज हुआ था मुकदमा

बचाव पक्ष के अधिवक्ता अनन्त शर्मा के मुताबिक, 16 अगस्त 2022 को बजरिया थाने में मु0अ0सं0 99/2022 दर्ज किया गया था। इसमें सऊद, दाऊद, शाहजहां बेगम और मेहदी हसन के खिलाफ दुष्कर्म, छेड़छाड़ तथा पॉक्सो एक्ट से संबंधित धाराओं में आरोप लगाए गए थे।

पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया। इसके बाद अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई और अभियोजन तथा बचाव पक्ष की ओर से साक्ष्य एवं गवाह पेश किए गए।

अदालत में पीड़िता की गवाही बनी अहम आधार

मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता की अदालत में हुई गवाही को बचाव पक्ष ने महत्वपूर्ण बताया। अधिवक्ता अनन्त शर्मा के अनुसार, पीड़िता ने अदालत में आरोपियों के संबंध में अलग तथ्य प्रस्तुत किए। उसने सऊद और दाऊद को अपने भाई जैसा बताते हुए कहा कि उन्होंने उसके साथ किसी तरह का गलत व्यवहार नहीं किया।

बचाव पक्ष के अनुसार, पीड़िता ने अदालत को यह भी बताया कि यतीमखाने की एक कर्मचारी के कहने पर उसने कुछ कागजों पर बिना पढ़े हस्ताक्षर किए थे। साथ ही, उसने पूर्व में दिए गए बयान के संबंध में पुलिस के दबाव और पिता के साथ मारपीट के डर की बात अदालत के समक्ष रखी।

हालांकि, इन दावों और पूर्व बयानों के बीच अंतर को अदालत ने मामले के साक्ष्यों के साथ देखा। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए।

मेडिकल रिपोर्ट और घटना की तारीख को लेकर उठे सवाल

बचाव पक्ष की ओर से अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि करने वाला कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला। इसके अलावा, कथित घटना वर्ष 2015 की बताई गई थी, जबकि मुकदमा वर्ष 2022 में दर्ज हुआ।

अधिवक्ता के अनुसार, घटना और एफआईआर के बीच करीब सात वर्ष का अंतर था। साथ ही, प्राथमिकी में कथित घटना की स्पष्ट तारीख और समय का उल्लेख नहीं होने की बात भी बचाव पक्ष ने अदालत के सामने रखी।

इसके अलावा, पीड़िता की उम्र से संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए। अधिवक्ता अनन्त शर्मा के मुताबिक, विवेचना के दौरान उम्र के संबंध में पर्याप्त प्रमाण पत्र या ठोस दस्तावेज केस रिकॉर्ड में शामिल नहीं किए गए थे।

किराएदारी विवाद को बताया गया मुकदमे की वजह

बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के पीछे मकान की किराएदारी से जुड़े विवाद को मुख्य कारण बताया। उनका कहना है कि इसी विवाद के चलते आरोपियों को गंभीर मुकदमे में फंसाया गया।

हालांकि, किराएदारी विवाद से जुड़े इस दावे को बचाव पक्ष का कथन माना जाना चाहिए। मामले में अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर ही अंतिम निर्णय हुआ।

अदालत ने चारों आरोपियों को किया दोषमुक्त

मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने सऊद, दाऊद, शाहजहां बेगम और मेहदी हसन को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। बचाव पक्ष के अनुसार, अदालत ने साक्ष्यों, पीड़िता की गवाही और मामले से जुड़े विभिन्न तथ्यों पर विचार करने के बाद आरोपियों को बरी किया।

इस फैसले के बाद अधिवक्ता अनन्त शर्मा ने इसे आरोपियों के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्णय बताया। वहीं, दाऊद अली खान ने भी मामले में अदालत के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

यह मामला एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि गंभीर आपराधिक आरोपों में अंतिम निष्कर्ष अदालत द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों की गवाही और कानून के अनुरूप किया जाता है। केवल आरोप लगने से किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं माना जाता। इस मामले में अदालत ने सुनवाई के बाद चारों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।

You may have missed