सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश: आवासीय संपत्तियों में व्यावसायिक गतिविधि मिलने पर होगी सीलिंग
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नई दिल्ली। आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने देशभर के नगर निगमों और नगर निकायों को निर्देश दिया है कि वे आवासीय संपत्तियों में नियमों के विपरीत संचालित की जा रही व्यावसायिक गतिविधियों की पहचान कर प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करें। यदि जांच में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित संपत्ति को सील करने की कार्रवाई की जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद ऐसे मकान, फ्लैट और अन्य आवासीय परिसरों पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है, जहां निर्धारित उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। हालांकि, कोर्ट ने स्थानीय निकायों को कार्रवाई करते समय नियमों और निर्धारित भूमि उपयोग का ध्यान रखने के साथ-साथ समानता के सिद्धांत का पालन करने की भी हिदायत दी है।
आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर सख्ती
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे। पीठ ने देशभर के स्थानीय निकायों को आवासीय संपत्तियों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की जांच करने का निर्देश दिया। कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि यदि किसी संपत्ति का इस्तेमाल उसके निर्धारित आवासीय उद्देश्य के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि के लिए किया जा रहा है और यह नियमों का उल्लंघन है, तो संबंधित नगर निकाय को कार्रवाई करनी होगी।
दरअसल, कई शहरों में आवासीय इलाकों में दुकानों, कार्यालयों, प्रतिष्ठानों या अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर भूमि उपयोग और भवन संबंधी नियमों के उल्लंघन का सवाल उठता है। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नगर निकायों को ऐसे मामलों की प्राथमिकता के आधार पर जांच करनी होगी।
उल्लंघन मिलने पर संपत्ति सील करने का निर्देश
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां आवासीय संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग नियमों के विपरीत पाया जाए, वहां सीलिंग की कार्रवाई की जा सकती है। इसका उद्देश्य नियमों के उल्लंघन को रोकना और स्थानीय स्तर पर निर्धारित भूमि उपयोग व्यवस्था को बनाए रखना है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर आवासीय संपत्ति में किसी भी प्रकार की गतिविधि को स्वतः अवैध माना जाएगा। कार्रवाई संबंधित क्षेत्र के लागू नियमों, भूमि उपयोग और नगर निकाय के प्रावधानों के आधार पर होगी। इसलिए किसी संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई से पहले संबंधित नियमों और उपयोग की स्थिति की जांच महत्वपूर्ण होगी।
मिश्रित उपयोग वाले इलाकों पर भी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने उन इलाकों का भी उल्लेख किया, जिन्हें स्पष्ट रूप से न तो केवल आवासीय और न ही केवल व्यावसायिक उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है। ऐसे क्षेत्रों की भी पहचान और जांच करने को कहा गया है।
हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल ऐसे क्षेत्रों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है। यानी स्थानीय निकाय इन क्षेत्रों में स्थिति की जांच कर सकते हैं, लेकिन तत्काल सीलिंग या अन्य दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई शहरी क्षेत्रों में भूमि उपयोग की स्थिति स्पष्ट नहीं होती या अलग-अलग प्रकार के उपयोग की अनुमति होती है। ऐसे में बिना नियमों की स्थिति स्पष्ट किए कार्रवाई करने से विवाद पैदा हो सकता है। कोर्ट ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए फिलहाल ऐसे क्षेत्रों में कार्रवाई से दूरी बनाए रखने को कहा है।
‘चुनिंदा कार्रवाई’ पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों को कार्रवाई में भेदभाव नहीं करने की भी स्पष्ट चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि कार्रवाई सभी संबंधित संपत्तियों के खिलाफ समान रूप से की जानी चाहिए। किसी खास व्यक्ति या संपत्ति को चुनकर कार्रवाई करना स्वीकार्य नहीं होगा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि अधिकारियों द्वारा चुनिंदा तरीके से कार्रवाई किए जाने की बात सामने आती है, तो कोर्ट इसे गंभीरता से लेगा। इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नियमों का पालन कराने की प्रक्रिया पारदर्शी और समान हो।
इससे स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। उन्हें केवल शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने के बजाय निर्धारित नियमों के अनुसार व्यवस्थित तरीके से जांच और कार्रवाई करनी होगी।
नगर निकायों की बढ़ेगी जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नगर निगम, नगर पालिका और अन्य स्थानीय निकायों को अपने-अपने क्षेत्रों में आवासीय संपत्तियों के उपयोग की समीक्षा करनी पड़ सकती है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा जहां आवासीय परिसरों में लंबे समय से व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने की शिकायतें हैं।
इसके अलावा, अधिकारियों को यह भी देखना होगा कि संबंधित संपत्ति किस श्रेणी में आती है और वहां किस प्रकार के उपयोग की अनुमति है। यदि गतिविधि नियमों के अनुरूप है, तो केवल व्यावसायिक गतिविधि होने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। वहीं, यदि स्पष्ट नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
संपत्ति मालिकों के लिए क्या मायने?
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद आवासीय संपत्ति मालिकों और वहां व्यावसायिक गतिविधियां संचालित करने वाले लोगों के लिए अपने भवन के उपयोग से जुड़े नियमों की जानकारी रखना महत्वपूर्ण हो गया है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि संपत्ति का इस्तेमाल स्थानीय भवन उपनियमों, भूमि उपयोग नियमों और नगर निकाय की अनुमति के अनुरूप हो।
साथ ही, नगर निकायों के लिए भी जरूरी होगा कि वे कार्रवाई करते समय स्पष्ट नियमों और समान प्रक्रिया का पालन करें। इससे एक ओर नियमों का पालन सुनिश्चित होगा, वहीं दूसरी ओर मनमानी या चुनिंदा कार्रवाई की आशंका भी कम होगी।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़े मामलों में स्थानीय निकायों की भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। अब नियमों के उल्लंघन की पहचान, निष्पक्ष जांच और आवश्यक होने पर सीलिंग की कार्रवाई पर विशेष ध्यान देना होगा। वहीं, मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्रों में फिलहाल केवल जांच और स्थिति का आकलन किया जाएगा।

