एमकॉम-बीएड के बाद खेती की राह, ड्रैगन फ्रूट ने बदली देवांश की किस्मत
रिपोर्टर- राकेश गिरी
बस्ती। आमतौर पर उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद युवाओं की प्राथमिकता अच्छी नौकरी हासिल करना होती है। हालांकि, बस्ती जिले के गौर ब्लॉक के कोठवा गांव निवासी देवांश पाण्डेय ने इस पारंपरिक सोच से अलग रास्ता चुना। एमकॉम और बीएड की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी की तलाश करने के बजाय खेती को अपना व्यवसाय बनाने का फैसला किया। खास बात यह है कि उन्होंने पारंपरिक खेती के बजाय ड्रैगन फ्रूट की व्यावसायिक खेती को चुना और इसी प्रयोग ने उनके लिए रोजगार तथा आय का नया रास्ता खोल दिया।
देवांश पाण्डेय ने वर्ष 2023 में करीब डेढ़ एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की थी। शुरुआती प्रयोग के बाद उन्हें बेहतर उत्पादन और बाजार से अच्छी प्रतिक्रिया मिली। अब वह न केवल ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं, बल्कि इसकी नर्सरी तैयार कर पौधों की बिक्री भी शुरू कर चुके हैं। इस तरह खेती उनके लिए सिर्फ उत्पादन का माध्यम नहीं रही, बल्कि एक व्यवस्थित व्यवसाय का रूप लेती जा रही है।
एमकॉम और बीएड के बाद खेती को बनाया करियर
देवांश ने लखनऊ की एमिटी यूनिवर्सिटी से वर्ष 2022 में एमकॉम और वर्ष 2024 में बीएड की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने बताया कि 12वीं तक की पढ़ाई भी उन्होंने कॉमर्स विषय से की थी। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें कारोबार, लागत और मुनाफे के बीच संबंध समझने में रुचि थी। इसी सोच के चलते उन्होंने पारंपरिक खेती की तुलना में व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर विचार करना शुरू किया।
हालांकि, उनके परिवार की सोच शुरुआत में अलग थी। परिवार में अधिकतर लोग सरकारी नौकरी से जुड़े रहे हैं और पिता सुनील पाण्डेय समेत परिवार के अन्य सदस्य चाहते थे कि देवांश भी सरकारी नौकरी की तैयारी करें। इसके बावजूद देवांश ने अपने परिवार को समझाया कि वह नौकरी के बजाय व्यावसायिक खेती को करियर के रूप में अपनाना चाहते हैं।
आखिरकार परिवार ने उनके फैसले का समर्थन किया। उनके पिता ने ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए जरूरत के अनुसार करीब 12 लाख रुपये उपलब्ध कराए। इसके बाद देवांश ने नई फसल के रूप में ड्रैगन फ्रूट का चयन किया।
हैदराबाद से मंगाए पौधे, 610 पिलर पर शुरू हुई खेती
देवांश ने बताया कि उन्होंने ड्रैगन फ्रूट के पौधे हैदराबाद से मंगाए। एक पौधे की कीमत करीब 90 रुपये थी, जबकि परिवहन का खर्च अलग से वहन करना पड़ा। फरवरी 2023 में उन्होंने करीब डेढ़ एकड़ जमीन में 610 पिलर पर 2,440 ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए।
शुरुआती दौर में खेत तैयार करने और पौधों को स्थापित करने में लागत अधिक आई। हालांकि, देवांश के मुताबिक ड्रैगन फ्रूट की खेती में शुरुआती निवेश के बाद रखरखाव पर अपेक्षाकृत कम खर्च आता है। यही वजह है कि उन्होंने इस फसल को आगे भी बढ़ाने का फैसला किया।
पहली फसल से करीब 3 लाख रुपये की आय
करीब 18 महीने बाद जून 2024 में देवांश के खेत में पहली बार ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन हुआ। उस वर्ष उन्हें लगभग एक टन फल प्राप्त हुआ। बाजार तक उत्पाद पहुंचाने के लिए उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ी। खेत से ही लगभग पूरा उत्पादन करीब 300 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बिक गया।
इससे उन्हें करीब 3 लाख रुपये की आय प्राप्त हुई। पहली फसल से मिले उत्साह के बाद उन्होंने खेती पर और ध्यान देना शुरू किया। परिणामस्वरूप वर्ष 2025 में उत्पादन बढ़कर करीब 3 टन पहुंच गया। बाजार भाव के आधार पर इससे लगभग 9 लाख रुपये की आमदनी हुई।
देवांश बताते हैं कि ड्रैगन फ्रूट के पौधों की देखभाल में हर वर्ष करीब एक से डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है। उनके अनुसार, पौधों की उम्र बढ़ने के साथ उत्पादन में भी वृद्धि की संभावना रहती है।
अब नर्सरी से भी बढ़ाई कमाई की राह
खेती से मिले अनुभव के बाद देवांश ने एक और कदम आगे बढ़ाया। फरवरी 2026 से उन्होंने ड्रैगन फ्रूट की नर्सरी तैयार करने का काम भी शुरू कर दिया। अब तक वह करीब 60 हजार रुपये के ड्रैगन फ्रूट पौधे बेच चुके हैं।
इस नर्सरी से दूसरे किसानों को भी ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करने में मदद मिल रही है। पड़ोसी जिले अयोध्या के आशुतोष शर्मा ने अकेले 500 पौधे देवांश से खरीदे हैं। इससे साफ है कि क्षेत्र में इस फसल को लेकर किसानों की रुचि बढ़ रही है।
सहफसली खेती से अतिरिक्त आय की तैयारी
देवांश अब अपनी खेती में सहफसली मॉडल को भी शामिल करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस वर्ष से वह ड्रैगन फ्रूट के साथ दूसरी फसलों की खेती पर भी काम करेंगे, ताकि उपलब्ध जमीन से अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सके।
उनका मानना है कि किसानों को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित रहने के बजाय बाजार की मांग और लागत-मुनाफे का आकलन करते हुए व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए।
युवाओं के लिए खेती में रोजगार का अवसर
देवांश के अनुसार, ड्रैगन फ्रूट की खेती युवाओं के लिए स्वरोजगार का अच्छा माध्यम बन सकती है। उन्होंने बताया कि इस फसल को चुनने का एक कारण यह भी है कि पौधों में कांटे होते हैं, जिससे खेत में पशुओं से फसल को नुकसान होने की आशंका अपेक्षाकृत कम रहती है।
उन्होंने यह भी बताया कि ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए किसान उद्यान विभाग की योजनाओं के तहत अनुदान की उपलब्धता के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि, अनुदान की वास्तविक राशि और पात्रता संबंधित विभाग के वर्तमान नियमों पर निर्भर करती है।
देवांश का कहना है कि ड्रैगन फ्रूट के पौधे एक बार लगाने के बाद लंबे समय तक फल देते हैं। उनके अनुसार, उचित देखभाल के साथ पौधों से करीब 20 से 25 वर्ष तक उत्पादन मिलने की संभावना रहती है। शुरुआत में लागत अधिक हो सकती है, लेकिन बाद के वर्षों में मुख्य खर्च रखरखाव का रहता है और उत्पादन बढ़ने के साथ आय की संभावना भी बढ़ती है।
देवांश पाण्डेय की कहानी बताती है कि उच्च शिक्षा के बाद करियर का रास्ता केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। सही योजना, बाजार की समझ और नई तकनीक के साथ खेती भी युवाओं के लिए व्यवसाय और स्वरोजगार का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

