भारत में डेटा सेंटर: डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रहा अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा

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Digital UP News Desk

भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। ऑनलाइन बैंकिंग से लेकर डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी सेवाओं का विस्तार लगातार हो रहा है। ऐसे में इन डिजिटल सेवाओं को चौबीसों घंटे सुचारू रूप से चलाने के लिए मजबूत और सुरक्षित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। इसी जरूरत को पूरा करने में डेटा सेंटर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

दरअसल, डेटा सेंटर डिजिटल दुनिया के ऐसे अदृश्य स्तंभ हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर करोड़ों लोगों की ऑनलाइन गतिविधियों को संचालित करने में मदद करते हैं। बैंक खाते का बैलेंस चेक करना हो, ऑनलाइन भुगतान करना हो, सरकारी सेवा का लाभ लेना हो या किसी क्लाउड एप्लिकेशन का इस्तेमाल करना हो, इन सभी प्रक्रियाओं के पीछे डेटा सेंटर की तकनीकी क्षमता काम करती है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ बढ़ी डेटा सेंटर की जरूरत

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। डिजिटलीकरण ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मकता और सेवाओं के तरीके को प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा स्टोरेज और हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की मांग भी तेजी से बढ़ी है।

ऐसे में डेटा सेंटर इस डिजिटल विस्तार का आधार बनते जा रहे हैं। यहां सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग उपकरणों को सुरक्षित वातावरण में रखा जाता है। ये उपकरण बड़ी मात्रा में डिजिटल जानकारी को स्टोर करने, प्रोसेस करने और जरूरत के अनुसार उपलब्ध कराने का काम करते हैं।

इसके अलावा, आधुनिक डेटा सेंटर में बिजली, कूलिंग, नेटवर्किंग, सुरक्षा और प्रबंधन प्रणालियां एक साथ काम करती हैं। इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल सेवाओं को सुरक्षित, विश्वसनीय और निर्बाध बनाए रखना है।

डेटा सेंटर के अंदर कैसे काम करती है तकनीक?

डेटा सेंटर के संचालन के लिए सबसे पहले विश्वसनीय बिजली आपूर्ति जरूरी है। कंप्यूटर और सर्वर लगातार काम करते हैं, इसलिए बिजली की थोड़ी देर की बाधा भी महत्वपूर्ण डिजिटल सेवाओं को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अनइंटरप्टिबल पावर सप्लाई (UPS), बैकअप जनरेटर और विद्युत वितरण प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है।

वहीं, सर्वर लगातार काम करते हैं तो उनमें गर्मी भी पैदा होती है। इसलिए डेटा सेंटर में आधुनिक कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं। HVAC सिस्टम तापमान और हवा के प्रवाह को नियंत्रित करता है। इसके साथ ही एयरफ्लो मैनेजमेंट और लिक्विड कूलिंग जैसी तकनीकें ऊर्जा दक्षता और उपकरणों की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद करती हैं।

इसके बाद आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेटा प्रोसेसिंग का मुख्य कार्य करता है। सर्वर डिजिटल एप्लिकेशन को चलाते और सूचनाओं को प्रोसेस करते हैं। वहीं HDD और SSD आधारित स्टोरेज सिस्टम बड़ी मात्रा में डेटा को सुरक्षित रखते हैं।

नेटवर्किंग उपकरण, जैसे राउटर और हाई-स्पीड स्विच, डेटा सेंटर के अंदर और बाहर सूचनाओं के आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। फाइबर-ऑप्टिक कनेक्शन हाई-स्पीड कम्युनिकेशन उपलब्ध कराते हैं।

एक क्लिक से रिस्पॉन्स तक क्या होता है?

जब कोई व्यक्ति मोबाइल या कंप्यूटर से किसी ऐप को खोलता है, बैंक बैलेंस देखता है या कोई दस्तावेज एक्सेस करता है, तो उसके पीछे कई तकनीकी प्रक्रियाएं तेजी से पूरी होती हैं।

सबसे पहले यूजर की रिक्वेस्ट नेटवर्क के माध्यम से डेटा सेंटर तक पहुंचती है। इसके बाद सिक्योरिटी सिस्टम रिक्वेस्ट की जांच करता है। फिर लोड बैलेंसर उस रिक्वेस्ट को उपलब्ध सर्वर तक भेजता है, ताकि किसी एक सर्वर पर अत्यधिक दबाव न पड़े।

इसके बाद एप्लिकेशन सर्वर रिक्वेस्ट को प्रोसेस करता है। आवश्यकता पड़ने पर वह API के माध्यम से अन्य एप्लिकेशन या सर्विस से जानकारी प्राप्त करता है। फिर डेटाबेस सर्वर से आवश्यक डेटा लिया जाता है और उसे एप्लिकेशन सर्वर के जरिए यूजर के डिवाइस तक वापस भेज दिया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में कई मामलों में केवल कुछ सेकंड लगते हैं। यही कारण है कि डेटा सेंटर आधुनिक डिजिटल सेवाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।

सरल शब्दों में कहें तो नेटवर्क डेटा सेंटर के भीतर कॉरिडोर की तरह है, सिक्योरिटी लेयर गार्ड की तरह काम करती है, लोड बैलेंसर ट्रैफिक पुलिस की भूमिका निभाता है, एप्लिकेशन सर्वर शेफ की तरह रिक्वेस्ट तैयार करता है और डेटाबेस सर्वर डिजिटल स्टोरेज की भूमिका निभाता है।

भारत में तेजी से बढ़ रहा डेटा सेंटर इकोसिस्टम

भारत में डेटा सेंटर का विकास ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ हुआ है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) ने देश में कई अत्याधुनिक राष्ट्रीय डेटा सेंटर स्थापित किए हैं। दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में प्रमुख एनआईसी सुविधाएं मौजूद हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों की राजधानियों में 37 छोटे डेटा सेंटर भी स्थापित किए गए हैं।

इन केंद्रों के माध्यम से सरकारी संस्थानों को विभिन्न स्तरों पर डिजिटल सेवाओं के लिए आवश्यक तकनीकी सहायता मिलती है। इनका चौबीसों घंटे संचालन, सिस्टम मैनेजमेंट और ऑन-साइट तकनीकी कर्मचारियों की व्यवस्था डिजिटल सेवाओं की निरंतरता को मजबूत करती है।

भारत में डेटा सेंटर की स्थापित विद्युत क्षमता भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2020 में यह क्षमता लगभग 375 मेगावाट थी, जबकि अगस्त 2026 तक यह बढ़कर करीब 1.57 गीगावाट हो गई। वर्ष 2030 तक इसके लगभग 8 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है।

इसके साथ ही भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र में करीब 70 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश हो रहा है और लगभग 90 अरब अमेरिकी डॉलर के अतिरिक्त प्रोजेक्ट्स की घोषणा की गई है। इससे इस क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती रुचि और भविष्य की संभावनाओं का पता चलता है।

बुनियादी ढांचे का दर्जा मिलने से बढ़ा निवेश

भारत सरकार ने डेटा सेंटर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं। केंद्रीय बजट 2022-23 में डेटा सेंटर को बुनियादी ढांचे की सामंजस्यपूर्ण सूची में शामिल किया गया। इससे डेटा सेंटर को बुनियादी ढांचे का दर्जा मिला और उनके लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण की संभावनाएं बेहतर हुईं।

सरल शब्दों में, इंफ्रास्ट्रक्चर स्टेटस मिलने से डेटा सेंटर को राष्ट्रीय राजमार्ग, हवाई अड्डे और बिजली ग्रिड जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी परियोजनाओं के समान वित्तीय सुविधा का लाभ मिल सकता है। परिणामस्वरूप बड़े स्तर पर निवेश और क्षमता विस्तार को प्रोत्साहन मिलता है।

वहीं, केंद्रीय बजट 2026-27 में पात्र विदेशी क्लाउड सेवा प्रदाताओं के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे का प्रावधान किया गया है। यह सुविधा भारत में स्थित डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करने वाले पात्र वैश्विक परिचालनों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सेमीकंडक्टर और AI मिशन से मिलेगा अतिरिक्त बल

डेटा सेंटर का विकास केवल सर्वर और स्टोरेज तक सीमित नहीं है। इसके लिए सर्वर, चिप्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और AI आधारित कंप्यूटिंग क्षमता का मजबूत इकोसिस्टम भी जरूरी है।

इसी दिशा में सरकार ने सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के दूसरे चरण यानी सेमीकॉन 2.0 को मंजूरी दी है। इसके तहत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश का प्रावधान किया गया है।

इसी तरह, इंडियाAI मिशन को 10,371.92 करोड़ रुपये के कुल बजट परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई है। AI के बढ़ते उपयोग से उच्च क्षमता वाले कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर की मांग बढ़ने की संभावना है।

इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम का आवंटन बढ़ाया गया है और IT हार्डवेयर के लिए PLI स्कीम 2.0 के जरिए सर्वर सहित जरूरी उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

ऊर्जा और जल दक्षता पर भी जोर

डेटा सेंटर लगातार बड़ी मात्रा में बिजली का उपयोग करते हैं। इसलिए इनके विस्तार के साथ ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ ऊर्जा का महत्व भी बढ़ रहा है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार, 2031-32 तक डेटा सेंटर क्षेत्र की बिजली मांग 17 गीगावाट तक पहुंच सकती है।

इस चुनौती को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस रूल्स, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी पहलें स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में मदद कर रही हैं।

साथ ही, डेटा सेंटर में पानी के इस्तेमाल को कम करने के लिए नई कूलिंग तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है। डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबैटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसी तकनीकें संसाधनों की दक्षता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग भी भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों में शामिल हो रही है।

BIS मानकों से बढ़ेगी दक्षता

डेटा सेंटर की ऊर्जा और संसाधन दक्षता को बेहतर बनाने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भी विभिन्न मानक विकसित किए हैं। इनमें Power Usage Effectiveness (PUE), Carbon Usage Effectiveness (CUE), Cooling Efficiency Ratio (CER) और Water Usage Effectiveness (WUE) जैसे मानक महत्वपूर्ण हैं।

PUE और WUE यह समझने में मदद करते हैं कि डेटा सेंटर बिजली और पानी का इस्तेमाल कितनी दक्षता से कर रहा है। वहीं CUE कार्बन उत्सर्जन से संबंधित दक्षता को दर्शाता है। CER कूलिंग सिस्टम की कार्यक्षमता को मापने में मदद करता है।

2047 के विकसित भारत के लिए महत्वपूर्ण आधार

आने वाले वर्षों में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और तेज होने की संभावना है। ऐसे में डेटा सेंटर केवल डिजिटल सेवाओं को चलाने वाली जगह नहीं रहेंगे, बल्कि डेटा संप्रभुता, डिजिटल विश्वास, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के महत्वपूर्ण आधार बनेंगे।

हालांकि, इसके साथ जिम्मेदार डेटा प्रबंधन, मजबूत साइबर सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता और जल संरक्षण भी जरूरी होगा। इसलिए भारत को डेटा सेंटर के विस्तार के साथ-साथ तकनीक, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में घरेलू क्षमताओं को भी मजबूत करना होगा।

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