परिसीमन मुद्दे पर डीएमके का क्षेत्रीय दलों से संपर्क, उद्धव ठाकरे से कनिमोझी की मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल

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Digital UP News Desk

परिसीमन और लोकसभा सीटों की संख्या में संभावित बदलाव से जुड़े राजनीतिक मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों के बीच संवाद तेज होता दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में डीएमके संसदीय दल की नेता कनिमोझी ने महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात की। मुंबई के बांद्रा स्थित ‘मातोश्री’ आवास पर हुई इस बैठक को क्षेत्रीय दलों के बीच समन्वय की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

उद्धव ठाकरे ने कनिमोझी का स्वागत किया और सम्मान के तौर पर उन्हें सुनहरी शॉल भेंट की। करीब एक घंटे चली इस बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अनिल देसाई और मिलिंद नार्वेकर भी मौजूद रहे। बैठक के दौरान परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों, विपक्षी राजनीति और आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों की भूमिका जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की खबर है।

परिसीमन का मुद्दा क्यों है महत्वपूर्ण?

दरअसल, भारत में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया को परिसीमन कहा जाता है। इसका उद्देश्य जनसंख्या में बदलाव के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना होता है। हालांकि, दक्षिणी राज्यों की ओर से लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य के परिसीमन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर नुकसान हो सकता है।

यही वजह है कि परिसीमन का मुद्दा केवल चुनावी सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे से भी जोड़ा जाता है। ऐसे में तमिलनाडु सहित कई दक्षिणी राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां इस विषय पर लगातार अपनी राजनीतिक चिंताएं सामने रखती रही हैं।

कनिमोझी और उद्धव ठाकरे की मुलाकात को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। बैठक के दौरान संभावित परिसीमन के प्रभाव और इससे प्रभावित होने वाले राज्यों तथा क्षेत्रीय दलों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर बातचीत होने की बात सामने आई है।

इंडिया ब्लॉक की रणनीति पर भी चर्चा

सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, बैठक में विपक्षी राजनीति की मौजूदा स्थिति और इंडिया ब्लॉक की भविष्य की रणनीति पर भी चर्चा हुई। खास तौर पर संसद में परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर विपक्षी दलों के बीच सहयोग और समन्वय बढ़ाने पर विचार किया गया।

इसके अलावा, बीजेपी के प्रति कांग्रेस के मौजूदा राजनीतिक रुख और विपक्षी गठबंधन में क्षेत्रीय दलों की भूमिका पर भी चर्चा होने की खबर है। हालांकि, इन बैठकों के आधार पर किसी नए राजनीतिक गठबंधन के गठन को लेकर अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

फिर भी, जिस तरह डीएमके नेतृत्व क्षेत्रीय दलों के प्रमुख नेताओं के साथ संवाद बढ़ा रहा है, उससे राजनीतिक हलकों में नई संभावनाओं को लेकर चर्चा जरूर तेज हुई है।

उद्धव ठाकरे के बाद शरद पवार और सुप्रिया सुले से मुलाकात

उद्धव ठाकरे से मुलाकात के बाद कनिमोझी दिल्ली पहुंचीं। यहां उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के प्रमुख शरद पवार और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले से अलग-अलग मुलाकात की। इन बैठकों ने डीएमके के संपर्क अभियान को और अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया है।

शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय चेहरा रहे हैं। वहीं सुप्रिया सुले भी संसद में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। ऐसे में इन नेताओं के साथ बातचीत को परिसीमन और संघीय राजनीति से जुड़े मुद्दों पर संभावित समन्वय के संदर्भ में देखा जा रहा है।

डीएमके का यह प्रयास ऐसे समय में सामने आया है, जब विपक्षी राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कई क्षेत्रीय पार्टियां अपने राज्यों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता से उठाना चाहती हैं।

कांग्रेस के साथ रिश्तों के बीच बढ़ा महत्व

कनिमोझी की मुलाकातों का एक महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच मौजूद राजनीतिक मतभेद भी हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस विपक्षी राजनीति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन विभिन्न मुद्दों पर दोनों दलों के बीच मतभेद की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर भी क्षेत्रीय पार्टियां कई बार अपने-अपने राज्यों के राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देती हैं। इसलिए डीएमके की ओर से अलग-अलग क्षेत्रीय नेताओं के साथ बातचीत को केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित करके देखना जल्दबाजी होगी।

हालांकि, परिसीमन ऐसा विषय है जिस पर दक्षिणी राज्यों और अन्य प्रभावित राज्यों की पार्टियों के बीच साझा चिंता दिखाई देती है। इसलिए इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक संवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

चेन्नई की परिसीमन-विरोधी बैठक से डीएमके की दूरी

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू चेन्नई में आयोजित परिसीमन-विरोधी बैठक है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व में बुलाई गई इस बैठक से डीएमके के दूर रहने की बात सामने आई थी, जबकि कांग्रेस ने इसमें हिस्सा लिया था।

इस घटनाक्रम ने विपक्षी दलों के बीच परिसीमन के मुद्दे पर रणनीतिक मतभेदों को लेकर चर्चा को जन्म दिया। ऐसे में कनिमोझी का विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं से मिलना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि डीएमके इस मुद्दे पर अपने स्तर पर व्यापक राजनीतिक संवाद स्थापित करना चाहती है।

हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इन मुलाकातों का भविष्य में कोई औपचारिक राजनीतिक मोर्चा बनेगा या नहीं। फिलहाल इसे नेताओं के बीच विचार-विमर्श और संभावित समन्वय की कोशिश के रूप में ही देखा जाना उचित है।

अखिलेश यादव और भगवंत मान से भी संपर्क की संभावना

कनिमोझी का संपर्क अभियान महाराष्ट्र और दिल्ली तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। जानकारी के मुताबिक, वह पंजाब के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान तथा समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मुलाकात कर सकती हैं।

यदि इन नेताओं के साथ भी बातचीत होती है, तो इससे परिसीमन और राज्यों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों के बीच साझा रणनीति की संभावनाओं का आकलन किया जा सकता है।

आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों ही अपने-अपने राज्यों में महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत हैं। इसलिए इन दलों के साथ संवाद राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति के समीकरणों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

क्या बन सकता है नया क्षेत्रीय मंच?

कनिमोझी की लगातार हो रही मुलाकातों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या डीएमके क्षेत्रीय दलों को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, अभी तक किसी तीसरे राष्ट्रीय राजनीतिक गठबंधन के गठन की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

वास्तव में, क्षेत्रीय दलों के बीच साझा मंच की राह आसान नहीं होती। अलग-अलग राज्यों में इन दलों के राजनीतिक हित, चुनावी समीकरण और स्थानीय प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं। इसके अलावा, कांग्रेस और बीजेपी के साथ उनके संबंध भी राज्यवार बदलते रहते हैं।

फिर भी, परिसीमन जैसा संवैधानिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विषय क्षेत्रीय दलों के लिए साझा संवाद का आधार बन सकता है। यदि विभिन्न पार्टियां इस मुद्दे पर एक समान चिंता और रणनीति विकसित करती हैं, तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में इसका असर दिखाई दे सकता है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल कनिमोझी की बैठकों को क्षेत्रीय दलों के बीच संवाद बढ़ाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। उद्धव ठाकरे, शरद पवार और सुप्रिया सुले के बाद यदि अखिलेश यादव और भगवंत मान के साथ भी बातचीत होती है, तो इस संपर्क अभियान का दायरा और स्पष्ट हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या ये दल परिसीमन के मुद्दे पर किसी साझा राजनीतिक रणनीति तक पहुंचते हैं। साथ ही, यह भी देखना होगा कि कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के साथ उनके रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।

इसलिए अभी किसी नए गठबंधन की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय राजनीति में आपसी संवाद बढ़ाने का अवसर दे रहा है। आने वाले दिनों में होने वाली बैठकों और नेताओं के बयानों से इस राजनीतिक पहल की दिशा और अधिक स्पष्ट हो सकती है।

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