आजम खान समेत 5 पर हज समिति की जमीन बिक्री में FIR, 2.08 करोड़ के नुकसान का आरोप
Digital UP News Desk
लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य हज समिति की बेशकीमती जमीन की बिक्री में कथित अनियमितताओं को लेकर विजिलेंस ने बड़ी कार्रवाई की है। उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) के लखनऊ सेक्टर ने तत्कालीन हज समिति अध्यक्ष एवं समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान समेत पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मामले में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
विजिलेंस की जांच के अनुसार, लखनऊ के ऐशबाग क्षेत्र स्थित कायमखेड़ा में राज्य हज समिति की जमीन की बिक्री के दौरान निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया के कारण राज्य हज समिति को करीब 2.08 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ।
मामले में आजम खान के अलावा हज समिति के तत्कालीन सचिव लईक अहमद, तत्कालीन सचिव डॉ. एमएए खान तथा निजी फर्म आमिश डेवलपर्स के प्रोपराइटर मोहम्मद अयूब और मुस्तकीम अहमद को आरोपी बनाया गया है। विजिलेंस ने मामले की विवेचना इंस्पेक्टर संजय कुमार सिंह को सौंपी है।
ऐशबाग के कायमखेड़ा की जमीन से जुड़ा है मामला
विजिलेंस में दर्ज मुकदमे के मुताबिक, मामला लखनऊ के ऐशबाग क्षेत्र के कायमखेड़ा स्थित खसरा संख्या-117 की जमीन से संबंधित है। इस स्थान पर राज्य हज समिति की करीब 60 हजार वर्गफीट जमीन बताई गई है। यह जमीन क्षेत्र की महत्वपूर्ण संपत्तियों में शामिल थी।
आरोप है कि जमीन की बिक्री के दौरान सरकारी नियमों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का उचित तरीके से पालन नहीं किया गया। इसके अलावा, निजी फर्म को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से जमीन के निस्तारण की प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं की गईं।
विजिलेंस का आरोप है कि संबंधित पदाधिकारियों और निजी पक्ष के बीच मिलीभगत के चलते समिति के हितों की अनदेखी हुई। परिणामस्वरूप जमीन के वास्तविक मूल्य और बिक्री प्रक्रिया से प्राप्त राजस्व में अंतर पैदा हुआ और समिति को लगभग 2.08 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति हुई।
पांच लोगों के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर
इस मामले में विजिलेंस के लखनऊ सेक्टर में तैनात इंस्पेक्टर ध्रुव चंद्र मौर्य की तहरीर पर एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें तत्कालीन हज समिति अध्यक्ष आजम खान को नामजद किया गया है।
इसके साथ ही तत्कालीन सचिव लईक अहमद और तत्कालीन सचिव डॉ. एमएए खान को भी आरोपी बनाया गया है। निजी पक्ष से आमिश डेवलपर्स के प्रोपराइटर मोहम्मद अयूब और मुस्तकीम अहमद के नाम एफआईआर में शामिल हैं।
विजिलेंस की ओर से लगाए गए आरोपों की अब विस्तृत विवेचना की जाएगी। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि जमीन की बिक्री के लिए किस स्तर पर निर्णय लिए गए, किन अधिकारियों की भूमिका रही और निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया।
हालांकि, एफआईआर में आरोप दर्ज होना किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करता। आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच के अंतिम निष्कर्ष के आधार पर ही होगी।
3 मई 2024 को शासन ने दिए थे जांच के आदेश
हज समिति की जमीन की बिक्री को लेकर शिकायत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश शासन ने 3 मई 2024 को विजिलेंस जांच के आदेश जारी किए थे। इसके बाद विजिलेंस ने मामले से संबंधित दस्तावेजों की जांच शुरू की।
जांच के दौरान जमीन की रजिस्ट्री, टेंडर से जुड़े दस्तावेज, हज समिति के प्रस्ताव, राजस्व अभिलेख और बिक्री प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल की गई। अधिकारियों ने यह पता लगाने का प्रयास किया कि जमीन के निस्तारण के लिए कौन-कौन से नियम लागू थे और संबंधित प्रक्रिया में उनका पालन किस तरह किया गया।
विजिलेंस के मुताबिक जांच में अनियमितताओं के आरोप सही पाए गए और करीब 2.08 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति सामने आई। इसके बाद अब एफआईआर दर्ज करके मामले को औपचारिक आपराधिक जांच के चरण में ले जाया गया है।
अब आगे क्या होगी कार्रवाई?
एफआईआर दर्ज होने के बाद विवेचक मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और आरोपों की दोबारा विस्तृत जांच करेंगे। जमीन की बिक्री के समय मौजूद अधिकारियों और संबंधित पक्षों से पूछताछ भी की जा सकती है।
इसके अलावा, जमीन की उस समय की बाजार कीमत, सरकारी मूल्यांकन, बिक्री मूल्य और प्राप्त रकम के बीच अंतर का भी परीक्षण किया जा सकता है। यदि जांच के दौरान अतिरिक्त वित्तीय अनियमितता या अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका सामने आती है तो कानून के तहत आगे की कार्रवाई संभव है।
साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच में यह स्पष्ट हो कि कथित राजस्व नुकसान की वास्तविक गणना किस आधार पर की गई। इसके लिए जमीन के मूल्यांकन, रजिस्ट्री दस्तावेज और संबंधित सरकारी रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जा सकता है।
2.08 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कैसे होनी चाहिए?
हज समिति को हुए कथित 2.08 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान की भरपाई को लेकर मेरा मानना है कि सबसे पहले निष्पक्ष जांच के जरिए नुकसान की अंतिम और प्रमाणित राशि तय होनी चाहिए। इसके बाद यदि सक्षम न्यायिक या प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी स्थापित होती है, तो कानून के अनुसार नुकसान की वसूली की जानी चाहिए।
पहला कदम यह होना चाहिए कि सरकारी संपत्ति के मूल्य का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए। इससे यह स्पष्ट होगा कि जमीन का वास्तविक मूल्य कितना था और बिक्री में कितना वित्तीय अंतर हुआ।
दूसरे चरण में, यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी अधिकारी या निजी पक्ष की मिलीभगत से समिति को आर्थिक नुकसान हुआ, तो संबंधित कानूनों के तहत रिकवरी और क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। सरकारी या सार्वजनिक संस्था की संपत्ति से जुड़े मामलों में केवल आपराधिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जानी चाहिए; आर्थिक नुकसान की भरपाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा, भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए सरकारी और अर्धसरकारी संस्थाओं की जमीन की बिक्री में पारदर्शी ई-टेंडरिंग, स्वतंत्र मूल्यांकन और उच्चस्तरीय अनुमति जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाना चाहिए।
सरकारी संपत्ति की सुरक्षा पर उठे सवाल
यह मामला केवल एक जमीन की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं की संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े व्यापक सवाल भी सामने लाता है। ऐसी संपत्तियां किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी संपत्ति नहीं होतीं। उनका इस्तेमाल संबंधित संस्था और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
इसलिए, जमीन की बिक्री या हस्तांतरण से पहले बाजार मूल्य का आकलन, पारदर्शी निविदा प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, सभी दस्तावेजों को डिजिटल रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने से भविष्य में किसी भी निर्णय की जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल विजिलेंस ने एफआईआर दर्ज कर जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है। अब जांच में सामने आने वाले तथ्यों से यह स्पष्ट होगा कि जमीन बिक्री में किस स्तर पर अनियमितता हुई, किन लोगों की क्या भूमिका थी और राज्य हज समिति को हुए कथित 2.08 करोड़ रुपये के नुकसान की जिम्मेदारी किस पर तय होती है।

