आचार्य बालकृष्ण पासपोर्ट धोखाधड़ी मामले में बरी, 15 साल पुरानी कानूनी लड़ाई का हुआ अंत

WhatsApp Image 2026-09-08 at 1.07.39 PM

Digital UP News Desk

देहरादून: पतंजलि योगपीठ के मैनेजिंग डायरेक्टर और योग गुरु बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को 15 साल पुराने पासपोर्ट धोखाधड़ी मामले में बड़ी राहत मिली है। देहरादून की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने उन्हें मामले में लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह मामला भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़ा था।

कोर्ट के इस फैसले के साथ ही वर्ष 2011 से चली आ रही लंबी कानूनी प्रक्रिया का अंत हो गया। मामले में सीबीआई ने आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जाली दस्तावेज तैयार करने और उनका इस्तेमाल करने के साथ-साथ पासपोर्ट एक्ट से संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की थी। हालांकि, सुनवाई के बाद अदालत ने बालकृष्ण को आरोपों से मुक्त कर दिया।

15 साल पुराना मामला आखिर कैसे शुरू हुआ?

आचार्य बालकृष्ण से जुड़ा यह मामला अप्रैल 2011 में मिली एक शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत की प्रारंभिक जांच करने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने जुलाई 2011 में औपचारिक मामला दर्ज किया।

जांच एजेंसी के अनुसार, पासपोर्ट हासिल करने की प्रक्रिया के दौरान बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय में कुछ शैक्षणिक प्रमाणपत्र जमा किए गए थे। सीबीआई ने इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया था। जांच के दौरान इन प्रमाणपत्रों को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत कॉलेज से जारी किए जाने की बात सामने आई।

बताया गया कि संबंधित कॉलेज संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध होने का दावा करता था। इसके बाद सीबीआई ने विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों की जांच की। जांच एजेंसी ने दावा किया कि रिकॉर्ड की पड़ताल के दौरान दस्तावेजों की सत्यता को लेकर सवाल सामने आए।

हालांकि, अब स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने मामले में बालकृष्ण को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

सीबीआई ने 2012 में दाखिल की थी चार्जशीट

मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद सीबीआई ने वर्ष 2012 में अदालत के समक्ष चार्जशीट दाखिल की। इसमें बालकृष्ण के खिलाफ विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

मामला दर्ज होने के शुरुआती दौर में ही यह कानूनी विवाद उत्तराखंड हाई कोर्ट तक पहुंच गया था। जुलाई 2011 में हाई कोर्ट ने बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके साथ ही उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा कराने का निर्देश दिया गया था।

इस तरह मामला जांच और अदालती कार्यवाही के बीच आगे बढ़ता रहा। वहीं, बालकृष्ण के पासपोर्ट को भी लंबे समय तक कोर्ट के पास जमा रहना पड़ा।

2013 में तय हुए आरोप

कानूनी प्रक्रिया के अगले चरण में अक्टूबर 2013 में अदालत ने बालकृष्ण के खिलाफ आरोप तय किए। बाद में इन आरोपों में आवश्यक बदलाव भी किए गए। इसके बाद मामले में नियमित सुनवाई शुरू हुई और विभिन्न पक्षों की ओर से अदालत के सामने दलीलें और दस्तावेज प्रस्तुत किए गए।

मामले की सुनवाई कई वर्षों तक चलती रही। इस दौरान पासपोर्ट भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना रहा। हालांकि, वर्ष 2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बालकृष्ण को पासपोर्ट वापस लेने और उसे रिन्यू कराने की अनुमति दे दी।

इसके बावजूद मूल आपराधिक मामले की सुनवाई जारी रही और आखिरकार अब स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए बालकृष्ण को बरी कर दिया।

फैसले के बाद बालकृष्ण ने क्या कहा?

अदालत के फैसले के बाद आचार्य बालकृष्ण ने सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने फैसले को न्याय व्यवस्था में अपने विश्वास की जीत बताया।

अपने फेसबुक पोस्ट में बालकृष्ण ने कहा कि पिछले 15 वर्षों से उन्हें झूठे मामले में फंसाकर अपमान, बदनामी और मानसिक प्रताड़ना के जरिए तोड़ने की कोशिश की गई। उन्होंने आगे कहा कि अंततः भगवान की कृपा, गुरु और बड़ों के आशीर्वाद तथा लोगों की प्रार्थनाओं और शुभकामनाओं से अदालत के माध्यम से सच की जीत हुई है।

उन्होंने अपने समर्थकों और शुभचिंतकों के प्रति आभार भी जताया। बालकृष्ण ने कहा कि इस पूरे दौर में मिले प्यार, दया, प्रार्थनाओं और आशीर्वाद के लिए वह सभी के प्रति हृदय से आभारी हैं।

कानूनी प्रक्रिया में लगा लंबा समय

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि शिकायत से लेकर अंतिम फैसले तक करीब 15 वर्षों का समय लगा। वर्ष 2011 में शिकायत सामने आने के बाद सीबीआई जांच शुरू हुई। इसके बाद एफआईआर, दस्तावेजों की जांच, चार्जशीट और आरोप तय करने की प्रक्रिया पूरी हुई।

इसके बाद ट्रायल कई वर्षों तक चला। इस दौरान अलग-अलग कानूनी पहलुओं पर अदालतों में सुनवाई होती रही। हाई कोर्ट के आदेशों ने भी मामले की प्रक्रिया को प्रभावित किया। इसी क्रम में पासपोर्ट को लेकर भी अदालत के निर्देश जारी हुए।

वर्ष 2018 में पासपोर्ट को रिन्यू कराने की अनुमति मिलने के बावजूद आपराधिक मामले की सुनवाई जारी रही। अब स्पेशल सीबीआई कोर्ट के फैसले के बाद यह लंबी कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो गई है।

दस्तावेजों की प्रामाणिकता बनी थी मामले की मुख्य कड़ी

पूरे मामले में शैक्षणिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता एक प्रमुख मुद्दा रही। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि पासपोर्ट के लिए प्रस्तुत किए गए कुछ शैक्षणिक प्रमाणपत्र संदिग्ध थे। जांच एजेंसी ने संबंधित संस्थान और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड की पड़ताल की थी।

यही दस्तावेज बाद में जांच और अदालत की कार्यवाही में महत्वपूर्ण आधार बने। हालांकि, अंतिम न्यायिक निर्णय में आचार्य बालकृष्ण को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी मामले में आरोप लगाए जाने और अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने के बीच महत्वपूर्ण कानूनी अंतर होता है। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लिया जाता है।

पतंजलि योगपीठ से जुड़े हैं बालकृष्ण

आचार्य बालकृष्ण पतंजलि योगपीठ के प्रमुख पदाधिकारियों में शामिल हैं। वह लंबे समय से बाबा रामदेव के साथ पतंजलि से जुड़े विभिन्न कार्यों में सक्रिय रहे हैं। संगठन के प्रबंधन और कारोबार से संबंधित गतिविधियों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

इसलिए उनके खिलाफ चल रहा यह पुराना मामला लंबे समय से सार्वजनिक और कानूनी चर्चा का विषय रहा। अब अदालत के फैसले के बाद उनके लिए यह मामला समाप्त हो गया है।

फैसले का क्या है महत्व?

स्पेशल सीबीआई कोर्ट का फैसला आचार्य बालकृष्ण के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा सकता है। करीब डेढ़ दशक तक चले इस मामले में उन्हें आरोपों का सामना करना पड़ा। अब अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

हालांकि, किसी भी न्यायिक मामले में अदालत के फैसले की वास्तविक कानूनी स्थिति और उसके विस्तृत आदेश को समझने के लिए आदेश की पूरी प्रति महत्वपूर्ण होती है। वर्तमान मामले में भी फैसले के विस्तृत कानूनी आधार को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, आचार्य बालकृष्ण पासपोर्ट धोखाधड़ी मामला 2011 से शुरू होकर 2026 में अदालत के फैसले के साथ समाप्त हुआ। इस दौरान जांच, चार्जशीट, आरोप तय होने और लंबे ट्रायल से गुजरने के बाद अब उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है। बालकृष्ण ने फैसले को अपने न्यायिक विश्वास की जीत बताया और समर्थकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

You may have missed