बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा को HC से जमानत अर्जी खारिज, सर तन से जुदा नारे की तुलना जी श्रीराम से नहीं की जा सकती है
Digital UP News Desk
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 में हुई हिंसा के मामले में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (IMC) के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी। जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे को धार्मिक आस्था व्यक्त करने वाले नारों से अलग बताया। अदालत ने कहा कि ऐसे नारों की तुलना ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘अल्लाहु अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती।
अदालत ने इन धार्मिक नारों को ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाला बताया। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश किए गए तर्क से सहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून के शासन तथा भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा सकता है।
बरेली हिंसा मामले में जमानत से इनकार
मामला सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। पुलिस के मुताबिक, घटना से पहले एक रैली के आयोजन को लेकर प्रशासन से अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद भी लोगों को एकत्र होने के लिए आह्वान किया गया।
पुलिस शिकायत के अनुसार, मौलाना तौकीर रजा खान ने 26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज में लोगों के एकत्र होने का आह्वान किया था। पुलिस का आरोप है कि निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम स्थल की ओर पहुंचे।
इसके बाद भीड़ को श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने से रोकने की कोशिश की गई। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान स्थिति बिगड़ी और झड़प की घटना हुई। पुलिसकर्मियों के घायल होने तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने के आरोप भी मामले में लगाए गए हैं।
कोर्ट ने अनुमति और निषेधाज्ञा के मुद्दे पर क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान इस बात को महत्वपूर्ण माना कि स्थानीय प्रशासन से कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। अदालत के सामने मौलाना तौकीर रजा की ओर से यह दलील दी गई कि प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने और निषेधाज्ञा लागू होने के बाद सभा का आह्वान वापस ले लिया गया था।
हालांकि, अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद परिस्थितियों पर गौर करते हुए कहा कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़े। इस दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हुई और हिंसा की घटना सामने आई।
अदालत ने मामले को जमानत के स्तर पर देखते हुए आरोपी की भूमिका और अब तक की न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखा। कोर्ट ने इस चरण पर जमानत देने से इनकार कर दिया।
‘सर तन से जुदा’ नारे पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई के दौरान ‘सर तन से जुदा’ नारे को लेकर हाई कोर्ट की टिप्पणी खास तौर पर चर्चा में रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस नारे की तुलना ऐसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती जिनका उद्देश्य ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है।
कोर्ट ने जिन नारों का उल्लेख किया, उनमें ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘अल्लाहु अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ और ‘हर-हर महादेव’ शामिल हैं। अदालत के अनुसार, इन नारों का धार्मिक संदर्भ अलग है, जबकि ‘सर तन से जुदा’ को कानून-व्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।
अदालत ने सरकार की इस दलील को भी स्वीकार किया कि इस तरह का नारा कानून के शासन तथा देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती माना जा सकता है।
हिंसा के बाद मौलाना के आचरण पर भी टिप्पणी
हाई कोर्ट ने हिंसा के बाद मौलाना तौकीर रजा के आचरण का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हिंसा की घटना के बाद उन्होंने कथित तौर पर भीड़ को संबोधित किया और बड़ी संख्या में लोगों के उनके आह्वान पर पहुंचने के लिए उनका धन्यवाद किया।
कोर्ट ने इस पहलू को भी जमानत याचिका पर विचार करते समय ध्यान में रखा। अदालत की टिप्पणी के मुताबिक, केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि बाद में सभा का आह्वान वापस ले लिया गया था, बल्कि घटनाक्रम के दौरान और उसके बाद के आचरण को भी समग्र परिस्थितियों के साथ देखा जाना चाहिए।
हालांकि, इन सभी आरोपों का अंतिम निर्धारण मुकदमे की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा। जमानत याचिका पर अदालत की टिप्पणी को मामले के अंतिम दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।
चार्जशीट दाखिल, लेकिन आरोप अभी तय नहीं
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में 21 दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसके बावजूद मौलाना तौकीर रजा के खिलाफ अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं।
जमानत के स्तर पर अदालत ने मामले की परिस्थितियों, आरोपों की प्रकृति और आरोपी के कथित आचरण को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। इसका मतलब यह है कि फिलहाल उन्हें इस मामले में जेल से बाहर आने की अनुमति नहीं मिली है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि किसी आरोपी की जमानत याचिका खारिज होना अपने आप में अंतिम रूप से दोषी ठहराया जाना नहीं है। मुकदमे के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष को अपने-अपने साक्ष्य और दलीलें रखने का अवसर मिलेगा तथा अदालत अंतिम फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर करेगी।
‘आई लव मोहम्मद’ अभियान से जुड़ा था विवाद
बरेली में सितंबर 2025 में सामने आया विवाद ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान से जुड़ी गतिविधियों के बीच सामने आया था। पुलिस के अनुसार, इसी क्रम में एक रैली और लोगों के एकत्र होने को लेकर प्रशासनिक अनुमति का मुद्दा उठा था।
प्रशासन की ओर से अनुमति नहीं दिए जाने के बाद भीड़ के एकत्र होने और आगे बढ़ने को लेकर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी। पुलिस का आरोप है कि स्थिति बाद में हिंसा में बदल गई।
इस घटना के बाद पुलिस ने कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया और मामले की जांच आगे बढ़ाई। मौलाना तौकीर रजा को 13 अक्टूबर 2025 से जेल में बताए जाने के बाद अब उनकी जमानत याचिका पर हाई कोर्ट का फैसला सामने आया है।
आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट द्वारा जमानत अर्जी खारिज किए जाने के बाद अब मामले की अगली कानूनी प्रक्रिया पर निगाह रहेगी। चूंकि चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है, इसलिए आगे आरोप तय होने और उसके बाद मुकदमे की सुनवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
मामले में अदालत के सामने पुलिस और अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्ष्य के साथ-साथ बचाव पक्ष की दलीलें भी महत्वपूर्ण रहेंगी। इसके बाद ही यह तय होगा कि आरोप किस सीमा तक साबित होते हैं।
फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश ने बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा की जमानत की उम्मीदों को झटका दिया है। अदालत की ओर से ‘सर तन से जुदा’ नारे और धार्मिक नारों के बीच किया गया अंतर भी इस फैसले का प्रमुख हिस्सा रहा है।
अंतिम फैसला अभी होना बाकी है
बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने मामले में रैली की अनुमति, निषेधाज्ञा के बावजूद लोगों के एकत्र होने, हिंसा के बाद के घटनाक्रम और आरोपी के कथित आचरण जैसे पहलुओं पर विचार किया।
इसके अलावा, अदालत ने ‘सर तन से जुदा’ नारे को धार्मिक आस्था व्यक्त करने वाले नारों से अलग बताया और इसे कानून के शासन तथा देश की संप्रभुता एवं अखंडता के संदर्भ में गंभीर माना। हालांकि, मामले में अंतिम फैसला अभी होना बाकी है और आरोपों की न्यायिक जांच आगे जारी रहेगी।

