मुजफ्फरनगर में नदीम को सुनाई गई फांसी, जज रवि दिवाकर की टिप्पणी चर्चा में – एक बार जरूर पढ़ें पूरी खबर
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मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में शाहपुर के चर्चित शहजादी हत्याकांड में अदालत ने दोषी पति नदीम को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मामले की सुनवाई करते हुए नदीम को हत्या का दोषी माना। अदालत ने उसे फांसी की सजा के साथ जुर्माने से भी दंडित किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने मामले को गंभीरतम श्रेणी का अपराध माना।
इस फैसले के साथ ही न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की वह टिप्पणी भी चर्चा में आ गई, जिसमें उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता, अपने सिद्धांतों और कथित दबावों को लेकर स्पष्ट बात कही है। उन्होंने फैसले में कहा कि वह डर के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय अपने पद से त्यागपत्र देना बेहतर समझेंगे।
दहेज हत्या का आरोप नहीं, हत्या में दोषसिद्धि
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि अदालत ने नदीम को दहेज हत्या के आरोप में दोषी नहीं ठहराया। रिपोर्ट के अनुसार, मृतका के मृत्यु पूर्व बयान में अतिरिक्त दहेज की मांग का उल्लेख नहीं था। इसलिए दहेज हत्या से संबंधित आरोप साबित नहीं हुए। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मृत्यु पूर्व बयान के आधार पर यह माना कि नदीम ने हत्या की नीयत से अपनी पत्नी पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगाई थी। इसी आधार पर उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी माना गया।
अदालत ने इस मामले में मृत्यु पूर्व बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। खास बात यह रही कि मामले के कुछ गवाहों के बयान बदलने के बावजूद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया और मृतका के बयान को दोषसिद्धि के आधार में शामिल किया। इसके बाद अदालत ने दोषी को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
फैसले में न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में न्यायिक पद की जिम्मेदारी और स्वतंत्रता को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जब तक वह जज की कुर्सी पर हैं, तब तक अपने सिद्धांतों के अनुसार काम करेंगे। यदि परिस्थितियां उन्हें अपने सिद्धांतों से समझौता करने के लिए मजबूर करती हैं, तो वह सेवा में बने रहने के बजाय त्यागपत्र देना उचित समझेंगे।
फैसले में उनकी यह टिप्पणी भी सामने आई कि वह डरपोक जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे। उनका कहना था कि न्यायाधीश को किसी बाहरी दबाव के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि न्यायिक अधिकारी बाहुबलियों, अपराधियों या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में काम करने लगे, तो इससे न्यायपालिका के प्रति आम लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
कथित धमकी का भी फैसले में जिक्र
न्यायाधीश ने अपने आदेश में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक कथित माफिया या गैंगस्टर की ओर से संदेश भेजे जाने का भी उल्लेख किया। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें कथित तौर पर यह संदेश दिया गया कि अभी उनके न्यायालय से केवल कुछ पत्रावलियां हटाई गई हैं। यदि उन्होंने संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई या टिप्पणी जारी रखी तो उनका न्यायालय बदलवाया जा सकता है अथवा उनका जिले से बाहर तबादला कराया जा सकता है।
हालांकि, इस तरह के कथित संदेश और दबाव के संबंध में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों में किसी व्यक्ति के खिलाफ अलग से दोष सिद्ध होने की जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे न्यायाधीश द्वारा फैसले में दर्ज किया गया दावा या उल्लेख मानकर ही देखा जाना चाहिए।
23वां मृत्युदंड बना चर्चा का विषय
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के कार्यकाल में सुनाए गए मृत्युदंड के फैसलों की संख्या भी चर्चा में है। रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फरनगर फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 में उन्होंने करीब 155 दिनों की अवधि में 10 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है।
इस कारण नदीम को सुनाई गई सजा को उनके कार्यकाल के दौरान दिया गया 23वां मृत्युदंड बताया जा रहा है। इसके साथ ही न्यायाधीश की न्यायिक कार्यशैली और उनके फैसलों में दर्ज टिप्पणियों पर भी व्यापक चर्चा हो रही है।
न्यायिक जिम्मेदारी और निष्पक्षता का सवाल
दरअसल, किसी भी अदालत का फैसला केवल सजा तक सीमित नहीं होता। इसके साथ न्यायिक प्रक्रिया, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून की व्याख्या भी महत्वपूर्ण होती है। इस मामले में भी अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अपना निर्णय सुनाया है।
वहीं, न्यायाधीश की टिप्पणी ने न्यायिक स्वतंत्रता के मुद्दे को भी सामने ला दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जज की कुर्सी पर रहते हुए निर्णय लेने की जिम्मेदारी न्यायाधीश की होती है और इस जिम्मेदारी को किसी बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
इस मामले में आगे कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषी को मिली मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय के समक्ष न्यायिक पुष्टि की प्रक्रिया से भी गुजरती है। इसलिए अंतिम कानूनी स्थिति को आगे की न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में ही देखा जाएगा।
कुल मिलाकर, मुजफ्फरनगर का यह मामला एक ओर शहजादी हत्याकांड में अदालत के सख्त फैसले के कारण चर्चा में है, वहीं दूसरी ओर न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की न्यायिक स्वतंत्रता और कथित दबाव को लेकर की गई टिप्पणी ने भी इसे महत्वपूर्ण बना दिया है।

