कैराना में इकरा हसन की नई सियासी चाल, 2024 में विरोधी रहे श्रीपाल राणा को सपा में कराया शामिल
Digital UP News Desk
शामली: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण कैराना लोकसभा सीट पर भी सियासी गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। इसी क्रम में कैराना की सांसद इकरा हसन ने एक अहम राजनीतिक कदम उठाते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले श्रीपाल राणा को समाजवादी पार्टी में शामिल करा लिया है।
इकरा हसन के इस कदम को पश्चिमी यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दरअसल, जिस नेता ने पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के तौर पर इकरा हसन के सामने चुनौती पेश की थी, अब वही उनके साथ सपा के राजनीतिक मंच पर नजर आएंगे।
ऐसे में इसे महज दल बदल की घटना के बजाय कैराना क्षेत्र में सियासी समीकरणों को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
2024 में श्रीपाल राणा को मिले थे 76 हजार से ज्यादा वोट
2024 के लोकसभा चुनाव में कैराना सीट पर मुकाबला काफी चर्चित रहा था। समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार इकरा हसन ने इस चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 5,28,013 वोट हासिल किए थे। भारतीय जनता पार्टी के प्रदीप कुमार 4,58,897 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे।
वहीं, बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी श्रीपाल राणा को 76,200 वोट मिले थे और वह तीसरे स्थान पर रहे थे। हालांकि, वह चुनाव जीत नहीं सके, लेकिन उन्हें मिले वोटों को कैराना क्षेत्र में उनके राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।
अब श्रीपाल राणा के सपा में आने से राजनीतिक जानकार इसे इकरा हसन के लिए एक रणनीतिक उपलब्धि के तौर पर देख रहे हैं। उनके मुताबिक, स्थानीय स्तर पर किसी प्रभावशाली नेता को अपने साथ जोड़ना संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ भविष्य के चुनावी समीकरणों पर भी असर डाल सकता है।
कैराना लोकसभा सीट का राजनीतिक समीकरण
कैराना लोकसभा क्षेत्र केवल शामली जिले तक सीमित नहीं है। इस संसदीय क्षेत्र में शामली जिले की तीन विधानसभा सीटें—कैराना, थानाभवन और शामली—शामिल हैं। इसके अलावा सहारनपुर जिले की नकुड़ और गंगोह विधानसभा सीटें भी कैराना लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में नकुड़ और गंगोह दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी। नकुड़ से मुकेश चौधरी और गंगोह से कीरत सिंह विधायक चुने गए थे।
दूसरी ओर, शामली जिले की तीनों विधानसभा सीटों का समीकरण अलग रहा। कैराना से समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन विधायक हैं, जो इकरा हसन के भाई हैं। थानाभवन से राष्ट्रीय लोक दल के अशरफ अली और शामली से रालोद के प्रसन्न चौधरी विधायक हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। इसलिए कैराना लोकसभा क्षेत्र की राजनीति में सपा और रालोद के बीच तालमेल भी एक अहम पहलू माना जाता है।
विरोधी से सहयोगी तक का सफर
राजनीति में चुनावी मुकाबले के बाद राजनीतिक समीकरण बदलना कोई नई बात नहीं है। कैराना में श्रीपाल राणा का सपा में शामिल होना भी इसी बदलते राजनीतिक समीकरण का उदाहरण है।
2024 में श्रीपाल राणा ने बसपा के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए इकरा हसन के खिलाफ मुकाबला किया था। अब उनके सपा में शामिल होने से इकरा हसन के राजनीतिक खेमे को क्षेत्र में अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, किसी नेता के पार्टी में शामिल होने का वास्तविक चुनावी असर आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा। फिर भी, 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए क्षेत्रीय नेताओं और संभावित प्रभावशाली चेहरों को अपने साथ जोड़ना सभी दलों की रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
इकरा हसन के परिवार का कैराना से पुराना राजनीतिक रिश्ता
इकरा हसन का कैराना की राजनीति से रिश्ता नया नहीं है। उनके परिवार की कई पीढ़ियां इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। यही वजह है कि कैराना को उनके परिवार की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
इकरा हसन के दादा चौधरी अख्तर हसन 1984 में कांग्रेस के टिकट पर कैराना से सांसद चुने गए थे। इसके बाद उनके पिता मुनव्वर हसन ने भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। मुनव्वर हसन 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसद बने थे।
इकरा हसन की मां तबस्सुम हसन भी कैराना से सांसद रह चुकी हैं। उन्होंने 2009 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2018 में हुए लोकसभा उपचुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव जीतकर दोबारा संसद में प्रवेश किया।
इस तरह इकरा हसन के परिवार की राजनीतिक जड़ें कैराना में काफी गहरी रही हैं।
कैराना में कई दलों का रहा है प्रभाव
कैराना लोकसभा सीट का चुनावी इतिहास भी काफी विविध रहा है। वर्ष 1962 में इस सीट के अस्तित्व में आने के बाद से यहां अलग-अलग समय पर कई राजनीतिक दलों के उम्मीदवार जीतते रहे हैं।
1962 में निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह कैराना के पहले सांसद बने। इसके बाद 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के गय्यूर अली, 1971 में कांग्रेस के शफक्कत जंग और 1980 में जनता पार्टी (एस) के टिकट पर गायत्री देवी ने जीत दर्ज की।
इसके बाद 1984 में चौधरी अख्तर हसन कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। 1989 और 1991 में जनता दल के हरपाल पंवार ने जीत हासिल की। 1996 में समाजवादी पार्टी के मुनव्वर हसन सांसद बने, जबकि 1998 में भाजपा के वीरेंद्र वर्मा ने सीट पर कब्जा किया।
आगे चलकर राष्ट्रीय लोक दल, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी समेत कई दलों ने यहां अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई।
2029 की तैयारी में अभी से जुटे नेता
कैराना में श्रीपाल राणा का सपा में शामिल होना ऐसे समय हुआ है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। विधानसभा चुनाव के बाद 2029 में लोकसभा चुनाव होना है। इसलिए राजनीतिक दल और उनके नेता अभी से अपने संगठन, जनाधार और स्थानीय समीकरणों को मजबूत करने में जुटे हैं।
इकरा हसन के लिए कैराना सीट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के मजबूत उम्मीदवार को हराकर जीत हासिल की थी। अब उनके सामने अपनी राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने और आने वाले चुनावों के लिए संगठन को मजबूत करने की चुनौती होगी।
ऐसे में श्रीपाल राणा को सपा में शामिल कराना उनके लिए एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। इसके जरिए पार्टी स्थानीय स्तर पर नए समीकरण बनाने की कोशिश कर सकती है।
फिलहाल, इस राजनीतिक बदलाव का असर कितना व्यापक होगा, यह आने वाले विधानसभा चुनावों में सामने आएगा। लेकिन इतना जरूर है कि कैराना की राजनीति में 2024 के चुनावी प्रतिद्वंद्वी रहे श्रीपाल राणा का सपा के साथ आना पश्चिमी यूपी की सियासत में चर्चा का विषय बन गया है। साथ ही, इससे यह संकेत भी मिलता है कि 2027 और 2029 के चुनावी रण के लिए राजनीतिक दल अभी से अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं।

