भारत ने यूएनसीसीडी सीओपी17 में चरागाहों के सामुदायिक नेतृत्व वाले पुनर्स्थापन पर दिया जोर
नई दिल्लीः भारत ने मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण निवारण कन्वेंशन (यूएनसीसीडी) के 17वें पक्षकारों के सम्मेलन (सीओपी17) में चरागाहों और घास के मैदानों के सामुदायिक नेतृत्व वाले पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि चरागाह केवल पशुओं के लिए चारे का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे पशुपालक समुदायों की आजीविका, जैव-विविधता संरक्षण, जल चक्र और कार्बन संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सीओपी17 में आयोजित मंत्री-स्तरीय संवाद का विषय “चरागाहों का पुनर्स्थापन और पशुपालक समुदायों का कल्याण” था। इस दौरान केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारत के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि चरागाहों का प्रभावी पुनर्स्थापन तभी संभव है, जब स्थानीय पशुपालकों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि इन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक माना जाए।
पशुपालकों की भागीदारी को बताया जरूरी
भूपेंद्र यादव ने अपने संबोधन में कहा कि सफल पुनर्स्थापन की शुरुआत पशुपालकों को महज लाभार्थी मानने के बजाय उन्हें संरक्षक की भूमिका देने से होती है। उनके मुताबिक, स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़कर ऐसी व्यवस्था तैयार की जा सकती है, जो पर्यावरण की दृष्टि से प्रभावी, आर्थिक रूप से व्यावहारिक और सामाजिक रूप से समावेशी हो।
भारत का यह दृष्टिकोण विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में चरागाह अलग-अलग भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों में मौजूद हैं। हिमालय के ऊंचाई वाले चरागाहों से लेकर मध्य भारत के सवाना, राजस्थान के शुष्क थार क्षेत्र, गुजरात के कच्छ और दक्षिण भारत के शोला वन क्षेत्रों तक चरागाह स्थानीय पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इसके अलावा, इन क्षेत्रों पर बड़ी संख्या में पशुपालक परिवार और पशुधन निर्भर हैं। इसलिए चरागाहों का संरक्षण सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय आजीविका से जुड़ा हुआ है।
वैज्ञानिक योजना से मिलेगा पुनर्स्थापन को आधार
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत चरागाहों और भूमि क्षरण से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए विज्ञान एवं तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहा है। उपग्रह आधारित मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण संबंधी एटलस घास के मैदानों की पहचान, मैपिंग और पुनर्स्थापन की योजना तैयार करने में वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराते हैं।
इस प्रकार, आधुनिक तकनीक के माध्यम से यह समझना आसान हो रहा है कि किन क्षेत्रों में भूमि क्षरण अधिक है, कहां चरागाहों की स्थिति कमजोर हो रही है और किन इलाकों में पुनर्स्थापन के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम किया जाना चाहिए।
वहीं, दूसरी ओर स्थानीय समुदायों के अधिकारों की मान्यता भी टिकाऊ प्रबंधन का अहम हिस्सा है। चराई के अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मान्यता देने से स्थानीय लोगों की भागीदारी मजबूत होती है। इससे प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल और उनके जिम्मेदार उपयोग के लिए समुदायों में स्वामित्व की भावना भी विकसित होती है।
राजस्थान के ‘ओरान’ का दिया उदाहरण
भारत की पारंपरिक सामुदायिक संरक्षण प्रणालियों का उदाहरण देते हुए भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के ‘ओरान’ का उल्लेख किया। ओरान ऐसे पवित्र उपवन हैं, जिन्हें स्थानीय समुदाय सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व के कारण लंबे समय से संरक्षित करते आए हैं।
भारत में इस तरह के लगभग 25,000 सामुदायिक रूप से संरक्षित पवित्र उपवन होने का उल्लेख किया गया, जो करीब 0.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं। ये क्षेत्र सामुदायिक संरक्षण की परंपरा और स्थानीय पर्यावरणीय ज्ञान का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
इन पवित्र उपवनों का महत्व केवल सांस्कृतिक नहीं है। ये पशुपालक समुदायों के लिए भूमि और संसाधनों की सुरक्षा में भी योगदान देते हैं। साथ ही, कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण वन्यजीवों और प्राकृतिक वासों का संरक्षण भी इनसे जुड़ा हुआ है। इनमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे संकटग्रस्त पक्षी के प्राकृतिक आवास भी शामिल हैं।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि कई पवित्र उपवनों को कानूनी प्रावधानों के तहत संरक्षण प्राप्त है। इससे सामुदायिक संरक्षण और औपचारिक पर्यावरणीय व्यवस्था के बीच बेहतर समन्वय की संभावनाएं बनती हैं।
घास के मैदानों में पुनर्स्थापन के प्रयास
भारत खुले जंगलों और घास के मैदानों वाले पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने के लिए भी विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रहा है। इस दिशा में चीता पुनर्वास कार्यक्रम और गुजरात के बन्नी क्षेत्र जैसे महत्वपूर्ण घास के मैदानों के विस्तार एवं संरक्षण की योजनाओं का भी उल्लेख किया गया।भारत के लिए घास के मैदान केवल जैव-विविधता के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे जलवायु और जल सुरक्षा से भी जुड़े हैं। गहरी जड़ों वाली घास मिट्टी में कार्बन के संचयन में मदद करती है। साथ ही, इसकी जड़ें वर्षा के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने की क्षमता बढ़ा सकती हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण में सहायता मिलती है।
भारत में करीब 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र स्थायी चरागाहों और पशुओं के चरने वाली भूमि के रूप में महत्वपूर्ण है। ऐसे में इन क्षेत्रों का संरक्षण ग्रामीण आजीविका के साथ-साथ जल और जलवायु संबंधी लक्ष्यों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
लैंडस्केप मैनेजमेंट पर भारत का जोर
भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत चरागाहों के पुनर्स्थापन को किसी एक गतिविधि तक सीमित नहीं मानता। इसके लिए लैंडस्केप मैनेजमेंट, जलसंभर विकास, सतत चराई, चारा विकास और आजीविका सहायता को एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
इस मॉडल में समुदाय की भागीदारी को केंद्रीय स्थान दिया गया है। अर्थात, योजनाएं केवल सरकारी स्तर पर तैयार करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों, समुदायों की जरूरतों और पारंपरिक ज्ञान को ध्यान में रखकर लागू की जाएं।
दरअसल, चरागाहों का अत्यधिक उपयोग, भूमि क्षरण और बदलती जलवायु जैसी चुनौतियां कई देशों के सामने हैं। इसलिए भारत ने विकासशील देशों के बीच अनुभव और तकनीक साझा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
वित्त और तकनीक तक आसान पहुंच की मांग
सीओपी17 में भारत ने भूमि क्षरण को रोकने और भूमि की गुणवत्ता में सुधार के लक्ष्य यानी ‘लैंड डिग्रेडेशन न्यूट्रैलिटी’ की दिशा में आगे बढ़ रहे विकासशील देशों के लिए वित्त पोषण, तकनीक और ज्ञान तक बेहतर पहुंच की आवश्यकता बताई।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए विशिष्ट और आसानी से उपलब्ध फंडिंग का स्वागत करेगा। साथ ही, भारत ‘साउथ-साउथ सहयोग’ के माध्यम से अपने अनुभवों और समाधानों को दूसरे विकासशील देशों के साथ साझा करने के लिए तैयार है।

