सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में स्थान, भारत की विरासत को मिली नई वैश्विक पहचान

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Digital UP News Desk

वाराणसी/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को एक और महत्वपूर्ण वैश्विक पहचान मिली है। दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इसके साथ ही भारत में यूनेस्को की विश्व धरोहर संपत्तियों की संख्या बढ़कर 45 हो गई है।

सारनाथ बौद्ध धर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। मान्यता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने यहीं अपना पहला उपदेश दिया था। इसी कारण यह बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। विश्व धरोहर सूची में शामिल होने से सारनाथ के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई मजबूती मिली है।

भारत की विरासत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि

विरासत केवल प्राचीन इमारतों, स्मारकों या पुरातात्विक अवशेषों का नाम नहीं है। इसके माध्यम से किसी देश की सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं और ज्ञान की यात्रा को समझा जाता है। इसलिए सारनाथ का यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होना भारत के लिए केवल एक और उपलब्धि नहीं, बल्कि सभ्यतागत विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इस निर्णय के बाद भारत के पास अब 37 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 1 मिश्रित सहित कुल 45 यूनेस्को विश्व धरोहर संपत्तियां हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस संख्या के आधार पर भारत विश्व स्तर पर छठे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।

विश्व धरोहर का विचार राष्ट्रीय सीमाओं से आगे जाता है। किसी स्थल का महत्व भले ही किसी एक देश में हो, लेकिन उसका असाधारण सार्वभौमिक मूल्य पूरी मानवता से जुड़ा माना जाता है। इसलिए ऐसे स्थलों का संरक्षण वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।

सारनाथ का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

वाराणसी के निकट स्थित सारनाथ को बौद्ध परंपरा में ऋषिपतन, इशिपतन और मृगदाव जैसे नामों से भी जाना जाता है। यही वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपने पहले पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इस घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है।

बुद्ध के पहले उपदेश ने बौद्ध संघ की शुरुआत और उनकी शिक्षाओं के प्रसार का आधार तैयार किया। इसके बाद सदियों तक सारनाथ बौद्ध धर्म के अध्ययन, साधना और तीर्थयात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।

सारनाथ के पुरातात्विक परिसर में कई महत्वपूर्ण स्मारक मौजूद हैं। इनमें धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और अशोक स्तंभ प्रमुख हैं। इसके अलावा चौखंडी स्तूप और अन्य पुरातात्विक अवशेष भी इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान का हिस्सा हैं।

इन स्मारकों का निर्माण और विकास अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों में हुआ। मौर्य काल से लेकर बाद की सदियों तक यहां धार्मिक और स्थापत्य गतिविधियां जारी रहीं। इस प्रकार सारनाथ लगभग सोलह शताब्दियों के ऐतिहासिक विकास की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।

विश्व धरोहर सूची तक पहुंचने की लंबी प्रक्रिया

सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया कई वर्षों में पूरी हुई। इसे वर्ष 1998 में भारत की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया गया था। इसके बाद नामांकन को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत दस्तावेज तैयार किए गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी समीक्षा हुई।

जनवरी 2025 में इसके नामांकन पर विश्व धरोहर समिति की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके बाद तकनीकी बैठकों, विशेषज्ञों की समीक्षा और मूल्यांकन मिशन सहित लगभग 18 महीने की प्रक्रिया चली।

यूनेस्को के सलाहकार निकाय ICOMOS ने भी प्रस्तावित सांस्कृतिक संपत्ति का मूल्यांकन किया। अंततः बुसान में विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में सारनाथ को सूची में शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

सारनाथ को विश्व धरोहर का दर्जा मुख्य रूप से मानदंड (iii) और (vi) के आधार पर मिला। मानदंड (iii) इसके लंबे समय से चले आ रहे आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व को रेखांकित करता है, जबकि मानदंड (vi) इसे भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं से सीधे जुड़े स्थल के रूप में मान्यता देता है।

वैश्विक बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में सारनाथ

सारनाथ केवल भारत का महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि दुनिया भर के बौद्ध समुदाय के लिए आस्था और तीर्थ का प्रमुख केंद्र है। जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, वियतनाम, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया और मंगोलिया सहित कई देशों से श्रद्धालु यहां आते हैं।

विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत होने की उम्मीद है। साथ ही, यह भारत और बौद्ध बहुल देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थलों में से तीन अब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। इनमें नेपाल का लुंबिनी, बिहार का महाबोधि मंदिर परिसर और अब उत्तर प्रदेश का सारनाथ शामिल है।

संरक्षण और पर्यटन पर बढ़ेगा ध्यान

विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के साथ सारनाथ के संरक्षण की जिम्मेदारी भी और महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार की प्राथमिकता स्थल की प्रामाणिकता और अखंडता को बनाए रखना, पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित करना और अनियोजित विकास को नियंत्रित करना है।

इसके लिए बफर जोन के भीतर विकास गतिविधियों को व्यवस्थित करने और पर्यटन को टिकाऊ तरीके से बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी लाभ मिलने की संभावना है।

भारत की विश्व धरोहर यात्रा लगातार मजबूत

भारत की पहली यूनेस्को विश्व धरोहर प्रविष्टियां वर्ष 1983 में हुई थीं। उस समय आगरा का किला, अजंता की गुफाएं, एलोरा की गुफाएं और ताजमहल विश्व धरोहर सूची में शामिल हुए थे।

इसके बाद देश के अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों को यह वैश्विक मान्यता मिली। इनमें कोणार्क का सूर्य मंदिर, खजुराहो, हम्पी, सांची के बौद्ध स्मारक, महाबलीपुरम, नालंदा महाविहार, धोलावीरा, रामप्पा मंदिर, शांतिनिकेतन और मोइदम्स जैसे स्थल शामिल हैं।

वर्ष 2025 में मराठा सैन्य परिदृश्य को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। अब सारनाथ की नई प्रविष्टि के साथ भारत की संख्या 45 तक पहुंच गई है। इसके अलावा भारत की अस्थायी सूची में भी 69 संपत्तियां शामिल हैं, जो भविष्य के संभावित नामांकनों के लिए महत्वपूर्ण आधार है।

विरासत संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास

भारत में विरासत संरक्षण केवल यूनेस्को नामांकन तक सीमित नहीं है। सरकार पुरातात्विक स्थलों, स्मारकों, पांडुलिपियों और पुरावशेषों के संरक्षण के लिए कई योजनाएं चला रही है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विश्व धरोहर से जुड़े मामलों में प्रमुख नोडल एजेंसी है। यह केंद्रीय संरक्षण के तहत आने वाले हजारों स्मारकों के संरक्षण और रखरखाव का काम करता है। इसके साथ ही आगंतुक सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, मार्ग और परिसर के विकास पर भी काम किया जाता है।

इसी क्रम में ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज 2.0’ कार्यक्रम के माध्यम से निजी क्षेत्र, सार्वजनिक उपक्रमों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं को विरासत स्थलों पर आगंतुक सुविधाओं के विकास में भागीदारी का अवसर दिया गया है।

इसके अलावा ज्ञान भारतम मिशन के माध्यम से भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को संरक्षित और डिजिटल बनाने पर जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण भी देश की पांडुलिपि संपदा के दस्तावेजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

अतीत से भविष्य की ओर

सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह उपलब्धि बताती है कि भारत की प्राचीन सभ्यता और उसके ज्ञान, दर्शन तथा स्थापत्य की वैश्विक प्रासंगिकता आज भी कायम है।

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