कर्नाटक में RSS की कानूनी स्थिति पर घमासान, कांग्रेस ने उठाए रजिस्ट्रेशन और राष्ट्रभक्ति से जुड़े सवाल
Digital UP News Desk
कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कानूनी स्थिति और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी विवाद के बीच कांग्रेस नेताओं ने RSS के रजिस्ट्रेशन, उसकी वित्तीय पारदर्शिता और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उसके रुख पर सवाल उठाए हैं। वहीं, बीजेपी की ओर से RSS के बचाव में संगठन की ऐतिहासिक भूमिका और जनसमर्थन का हवाला दिया गया है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत RSS के कानूनी रजिस्ट्रेशन को लेकर उठे सवालों से हुई। कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद ने RSS की तुलना कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों से करते हुए उसकी भारत में कानूनी स्थिति पर सवाल खड़े किए। हालांकि, उनके बयान को लेकर राजनीतिक बहस और तीखी हो गई है, क्योंकि इसमें उन्होंने RSS के साथ जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान का भी उल्लेख किया।
वंदे मातरम विवाद के बीच RSS पर कांग्रेस का हमला
कर्नाटक में ‘वंदे मातरम’ को लेकर चल रहा विवाद अब RSS और कांग्रेस के बीच व्यापक राजनीतिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने केरल के वाइस-चांसलर मोहनन कुन्नुम्मल के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने RSS की एक सभा से जुड़े संदर्भ में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को लेकर टिप्पणी की थी।
हरिप्रसाद ने कहा कि कुन्नुम्मल की टिप्पणी RSS के संदर्भ में थी और उन्होंने संगठन पर राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि RSS के सदस्य न तो ‘वंदे मातरम’ गाते हैं, न राष्ट्रगान और न ही तिरंगा फहराते हैं। इन आरोपों के जरिए कांग्रेस नेता ने RSS की राष्ट्रवादी पहचान पर सवाल खड़ा करने की कोशिश की है।
हालांकि, RSS और बीजेपी की ओर से कांग्रेस नेताओं के ऐसे आरोपों पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है। इसलिए यह विवाद केवल एक गीत या कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब संगठन की विचारधारा, कानूनी स्थिति और राष्ट्रवाद की परिभाषा तक पहुंच गया है।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ FIR का भी जिक्र
यह राजनीतिक बयानबाजी ऐसे समय में सामने आई है जब ‘वंदे मातरम’ से जुड़े एक मामले में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की खबर सामने आई है।
इसी घटनाक्रम के बीच कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान जैसे विषयों को राजनीतिक बहस में इस्तेमाल किया जा रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि देशभक्ति को किसी राजनीतिक दल या संगठन की ओर से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
दूसरी ओर, बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों की ओर से कांग्रेस पर राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रगीत के प्रति कथित असम्मान को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में दोनों पक्षों की बयानबाजी ने विवाद को और राजनीतिक बना दिया है।
प्रियांक खरगे ने RSS के रजिस्ट्रेशन पर उठाए सवाल
इस विवाद से पहले कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे और बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष के बीच RSS की कानूनी स्थिति को लेकर बहस सामने आई थी।
बीएल संतोष ने हिंदू जागरण वेदिके के ‘अखंड भारत संकल्प दिवस’ कार्यक्रम में RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर कहा था कि संगठन को कानूनी रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने RSS की स्थापना वर्ष 1925 का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन लंबे समय से देश में काम कर रहा है और उसकी पहचान उसके साथ जुड़े लोगों के विश्वास तथा सामाजिक गतिविधियों से होती है।
इसके जवाब में प्रियांक खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि यदि RSS किसी औपचारिक रजिस्ट्रेशन के बिना काम करता है तो उसकी संपत्तियों और वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन किस कानूनी ढांचे के तहत होता है।
खरगे ने यह भी सवाल किया कि संगठन की संपत्तियां किसके नाम पर हैं, बैंक खाते किस नाम से संचालित होते हैं और ‘गुरुदक्षिणा’ के रूप में मिलने वाले धन का प्रबंधन किस व्यवस्था के तहत किया जाता है। इसके अलावा उन्होंने संगठन के ऑडिटेड खातों और टैक्स फाइलिंग को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की।
उनका तर्क था कि किसी संगठन का ऐतिहासिक योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे कानूनी और वित्तीय पारदर्शिता की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती। उनके मुताबिक, किसी संगठन का प्रभाव जितना बड़ा होता है, सार्वजनिक जवाबदेही की अपेक्षा भी उतनी ही बढ़ती है।
बीजेपी और RSS की भूमिका पर भी कांग्रेस का पलटवार
प्रियांक खरगे ने बीजेपी, RSS और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की ओर से कांग्रेस की राष्ट्रवादी पहचान पर उठाए जाने वाले सवालों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को किसी राजनीतिक संगठन से देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।
खरगे ने RSS और उससे जुड़े संगठनों पर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की राष्ट्रवादी पहचान किसी संगठन की ओर से दिए गए प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं है।
इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी पर राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रगान और तिरंगे जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता के मुताबिक, इन मुद्दों को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करने के बजाय इनके सम्मान और राष्ट्रीय भावना को व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
बीके हरिप्रसाद के बयान से बढ़ा विवाद
RSS को लेकर बीके हरिप्रसाद का बयान इस पूरे राजनीतिक विवाद में नया मोड़ माना जा रहा है। उन्होंने संगठन की तुलना जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान से करते हुए कहा कि इन संगठनों के बीच कानूनी रजिस्ट्रेशन के संदर्भ में समानता है।
हालांकि, इस तरह की तुलना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है और इसे लेकर विवाद होना स्वाभाविक है। RSS भारत में लंबे समय से सक्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता रहा है, जबकि कांग्रेस के नेता उसकी विचारधारा और गतिविधियों को लेकर अलग राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हैं।
इसलिए, मौजूदा विवाद में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क सामने रख रहे हैं। कांग्रेस जहां पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा उठा रही है, वहीं बीजेपी और RSS समर्थक संगठन के ऐतिहासिक योगदान तथा सामाजिक गतिविधियों को उसकी पहचान का आधार बता रहे हैं।
राष्ट्रवाद की राजनीति फिर केंद्र में
कर्नाटक का यह विवाद एक बार फिर यह दिखाता है कि भारत की राजनीति में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों का मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है। ‘वंदे मातरम’, राष्ट्रगान और तिरंगे जैसे विषय सीधे भावनात्मक और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े हैं। इसलिए इनके राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर भी लगातार बहस होती रही है।
फिलहाल कर्नाटक में कांग्रेस और बीजेपी के बीच यह टकराव RSS की कानूनी स्थिति से आगे बढ़कर राष्ट्रवाद की राजनीतिक व्याख्या तक पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में दोनों दल इस मुद्दे को सार्वजनिक मंचों और राजनीतिक अभियानों में और जोर से उठा सकते हैं।
हालांकि, इस बहस में आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ तथ्यात्मक और कानूनी पहलुओं को भी अलग-अलग देखना जरूरी है। RSS की संगठनात्मक और कानूनी स्थिति, वित्तीय प्रबंधन तथा राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े आरोपों पर आधिकारिक दस्तावेज और संबंधित संस्थाओं के रिकॉर्ड ही अंतिम तस्वीर स्पष्ट कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, ‘वंदे मातरम’ विवाद ने कर्नाटक की राजनीति में RSS को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस के नेता संगठन की पारदर्शिता और राष्ट्रवादी दावों पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि बीजेपी और RSS समर्थक उसके लंबे सामाजिक इतिहास और जनसमर्थन को आधार बना रहे हैं। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले समय में राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बहस का विषय बना रह सकता है।

