तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोले उपराष्ट्रपति, ज्ञान के निर्माता बनें युवा

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Digital UP News Desk

तमिलनाडु: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने सोमवार को तिरुवरूर स्थित तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में शिरकत की। इस अवसर पर उन्होंने स्नातक छात्रों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धि के लिए बधाई दी और कहा कि दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्राप्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति, ज्ञान की खोज और विद्यार्थियों के समर्पण, दृढ़ता तथा निरंतर सीखने की यात्रा का उत्सव भी है।

उपराष्ट्रपति ने छात्रों के साथ-साथ उनके माता-पिता और शिक्षकों को भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की सफलता के पीछे उनके परिवार और शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। माता-पिता और शिक्षक अपने बच्चों तथा विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्तमान की कई सुख-सुविधाओं का त्याग करते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को अपनी उपलब्धियों के साथ उनके योगदान को भी हमेशा याद रखना चाहिए।

शिक्षा केवल डिग्री और अंकों तक सीमित नहीं

दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज के बदलते दौर में शिक्षा का मूल्यांकन केवल परीक्षाओं और अंकों के आधार पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि वास्तविक शिक्षा वह है, जो विद्यार्थियों में स्वतंत्र रूप से सोचने, प्रभावी ढंग से संवाद करने, मिलकर काम करने और जीवनभर सीखते रहने की क्षमता विकसित करे।

उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे डिग्री हासिल करने के बाद सीखने की प्रक्रिया को समाप्त न समझें। इसके बजाय, उन्हें अपने ज्ञान और कौशल को लगातार विकसित करते रहना चाहिए। वर्तमान समय में तकनीक, रोजगार और सामाजिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए सीखने, नवाचार करने और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण है।

उपराष्ट्रपति ने बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और मूल्य आधारित शिक्षा पर जोर देने के लिए तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय की सराहना भी की।

तिरुवरूर की सांस्कृतिक विरासत का किया उल्लेख

अपने संबोधन में सीपी राधाकृष्णन ने तिरुवरूर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान त्यागराज के प्रसिद्ध मंदिर वाला यह पवित्र नगर सदियों से आध्यात्मिकता, विद्वत्ता और कलात्मक उत्कृष्टता का केंद्र रहा है।

उन्होंने कहा कि तिरुवरूर की धरती ने संतों, विद्वानों और कर्नाटक संगीत की महान परंपरा को समृद्ध किया है। उनके अनुसार, किसी समाज की वास्तविक महानता तब सामने आती है, जब उसकी संस्कृति, ज्ञान और मूल्य एक साथ विकसित होते हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी शिक्षा को देश की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत से जोड़ने का आह्वान किया। साथ ही, उन्होंने कहा कि आधुनिक ज्ञान और परंपरागत मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

उपराष्ट्रपति ने पिछले करीब 12 वर्षों में देश में उच्च शिक्षा के विस्तार का उल्लेख करते हुए महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को सकारात्मक बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न दीक्षांत समारोहों में उन्हें अक्सर पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में छात्राओं को डिग्री और पदक प्राप्त करते हुए देखने का अवसर मिलता है।

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के इस दीक्षांत समारोह के आंकड़े भी इसी बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। समारोह में कुल 1,103 स्नातकों को डिग्रियां प्रदान की गईं, जिनमें 616 महिलाएं शामिल हैं। वहीं, शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए दिए गए 50 स्वर्ण पदकों में से 37 स्वर्ण पदक छात्राओं ने हासिल किए

यह आंकड़ा उच्च शिक्षा में छात्राओं की बढ़ती उपलब्धियों को दर्शाता है। उपराष्ट्रपति ने इसे स्वागत योग्य परिवर्तन बताते हुए शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की मजबूत होती भागीदारी की सराहना की।

सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था में सुधार जरूरी

उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों को रोकने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने संसद द्वारा हाल ही में पारित सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा कि परीक्षाओं की निष्पक्षता और ईमानदारी बनाए रखना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि गलत तरीके अपनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि ईमानदारी से मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के हितों की रक्षा की जा सके। उनके अनुसार, सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब उसमें पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो।

उपराष्ट्रपति ने अपने झारखंड के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस दौरान झारखंड सरकार की ओर से इसी प्रकार का एक विधेयक पारित किया गया था और तत्कालीन राज्यपाल के रूप में उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर उसे कानून का रूप दिया था।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि समाज में ईमानदार और मेहनती लोगों के हितों की रक्षा के लिए अनुचित कार्य करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।

युवाओं को दिया नवाचार और नेतृत्व का संदेश

दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति ने स्नातकों को भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे ज्ञान के उपभोक्ता बनने के बजाय ज्ञान के निर्माता बनें, नकल करने वालों के बजाय नवप्रवर्तक बनें और केवल अनुयायी बनने के बजाय नेता बनने का प्रयास करें।

उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं में देश को नई दिशा देने की क्षमता है। इसलिए विद्यार्थियों को अपनी शिक्षा और कौशल का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी करना चाहिए।

उन्होंने युवाओं से रचनात्मक सोच विकसित करने और नई समस्याओं के नए समाधान तलाशने का आह्वान किया। उनके मुताबिक आने वाला समय उन्हीं लोगों का होगा, जो परिस्थितियों के अनुरूप खुद को बदलने के साथ-साथ नए विचारों को जन्म देने में सक्षम होंगे।

विकसित भारत के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।

उन्होंने विद्यार्थियों से ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवा अपने ज्ञान, कौशल और नेतृत्व क्षमता का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण के लिए करें। शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत करियर बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने स्नातकों को यह संदेश दिया कि उनकी डिग्री एक मंजिल नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारियों की शुरुआत है। उन्हें अपने पेशेवर जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी को महत्व देना चाहिए।

नशीली दवाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अपील

उपराष्ट्रपति ने युवाओं से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण विषय पर भी बात की। उन्होंने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से मादक पदार्थों के तस्करों और नशीले पदार्थों के खतरे को फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि नशीली दवाओं का दुरुपयोग केवल किसी एक व्यक्ति के जीवन को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर परिवार और पूरे समाज पर पड़ सकता है। इसलिए युवाओं को इस खतरे से बचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने छात्रों से अपनी अपील दोहराते हुए कहा कि वे नशीली दवाओं को ना कहें और अपने दोस्तों को भी इससे दूर रहने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने युवाओं से स्वस्थ जीवनशैली और सकारात्मक गतिविधियों को अपनाने का आग्रह किया।

‘अपने लिए जीना पाप नहीं, केवल अपने लिए जीना पाप है’

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देते हुए कहा कि “अपने लिए जीना पाप नहीं है, केवल अपने लिए जीना पाप है।” इस संदेश के माध्यम से उन्होंने युवाओं को व्यक्तिगत सफलता के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने सपनों और लक्ष्यों को हासिल करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उसकी सफलता का लाभ समाज और देश तक भी पहुंचना चाहिए। ज्ञान, कौशल और प्रतिभा का उपयोग यदि व्यापक जनहित में किया जाए तो उसका प्रभाव और अधिक सार्थक हो जाता है।

1,103 छात्रों को मिली डिग्री, 50 को स्वर्ण पदक

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में कुल 1,103 स्नातकों को डिग्रियां प्रदान की गईं। इनमें शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए 50 स्वर्ण पदक विजेता भी शामिल रहे।

विशेष रूप से छात्राओं ने शानदार प्रदर्शन किया। 1,103 स्नातकों में 616 महिलाएं थीं, जबकि 50 स्वर्ण पदकों में से 37 छात्राओं ने हासिल किए। यह उपलब्धि उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और शैक्षणिक प्रदर्शन को दर्शाती है।

दीक्षांत समारोह के दौरान स्नातकों और उनके परिवारों में उत्साह का माहौल रहा। डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह उनके शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

स्नातकों को सफलता की शुभकामनाएं

अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने सभी स्नातकों को सफलता, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में पूर्णता की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने छात्रों से समाज में सार्थक बदलाव लाने और अपने ज्ञान का उपयोग सकारात्मक उद्देश्यों के लिए करने का आह्वान किया।

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय का 11वां दीक्षांत समारोह केवल डिग्री वितरण तक सीमित नहीं रहा। इसमें युवाओं के लिए जीवनभर सीखने, नवाचार, स्वतंत्र सोच, नेतृत्व, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण का व्यापक संदेश दिया गया। उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से स्पष्ट कहा कि शिक्षा की असली सफलता केवल डिग्री हासिल करने में नहीं, बल्कि उस ज्ञान को समाज और देश के हित में उपयोग करने में है।