नागपंचमी पर क्यों गायब हो गए सपेरे? कभी गांव-गांव दिखते थे, अब तलाशना भी मुश्किल
रिपोर्ट – विकास चौहान
कानपुर नागपंचमी विशेष: कभी ऐसा समय था जब नागपंचमी का त्योहार आते ही गांव, कस्बों और शहरों की गलियों में एक अलग ही रौनक दिखाई देती थी। हाथ में बीन, कंधे पर टोकरी और साथ में सांप लिए सपेरे लोगों के बीच पहुंचते थे। बच्चे उत्सुकता से उनके आसपास जमा हो जाते थे और परिवार के बड़े भी सांपों को देखने के लिए कुछ देर रुकते थे। सपेरों की बीन की धुन और टोकरी से निकलते नाग का दृश्य नागपंचमी के लोक उत्सव का एक जाना-पहचाना हिस्सा हुआ करता था।
लेकिन समय के साथ यह तस्वीर तेजी से बदल गई है। 1990 के दशक की यादों को देखें तो कई इलाकों में सपेरे अक्सर दिखाई दे जाते थे। आज वही परंपरा बहुत कम नजर आती है। नागपंचमी के मौके पर भी सपेरों को तलाशना आसान नहीं रह गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह परंपरा कहां चली गई, जिसके साथ कभी बच्चों की जिज्ञासा और त्योहार की रौनक जुड़ी हुआ करती थी?
कभी गांव-गांव पहुंचते थे सपेरे
एक दौर में सपेरों का जीवन सांपों से जुड़े पारंपरिक प्रदर्शन और लोक मनोरंजन से जुड़ा हुआ था। नागपंचमी जैसे अवसर उनके लिए खास होते थे। इस दिन वे अलग-अलग बस्तियों में जाते, लोगों को सांप दिखाते और अपनी कला के माध्यम से आमदनी करते थे।
बच्चों के लिए यह किसी रोमांच से कम नहीं होता था। जैसे ही किसी गली में बीन की आवाज सुनाई देती, बच्चे दौड़कर वहां पहुंच जाते थे। घरों की महिलाएं और बुजुर्ग भी दरवाजे या छत से यह दृश्य देखते थे। कई जगह लोग सपेरों को दान-दक्षिणा या अनाज देकर उनकी मदद करते थे।
इस तरह सपेरे केवल मनोरंजन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि कुछ समुदायों के लिए यह पारंपरिक आजीविका का माध्यम भी था।
बदलते समय ने बदली सपेरों की दुनिया
हालांकि, पिछले कुछ दशकों में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। सबसे बड़ा बदलाव वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानूनों और जागरूकता के बढ़ने के कारण आया। भारत में वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है और समय के साथ इसमें कई संशोधन हुए हैं। अधिनियम के तहत विभिन्न वन्यजीवों और सांपों की प्रजातियों को संरक्षण दिया गया है।
इसका परिणाम यह हुआ कि सांपों को पकड़कर सार्वजनिक प्रदर्शन या पारंपरिक तरीके से लोगों के सामने दिखाने वाली पुरानी व्यवस्था धीरे-धीरे कम होती गई। आज सांपों को पकड़ना, रखना या उनका प्रदर्शन करना कानूनी और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से गंभीर विषय है। इसलिए नागपंचमी के नाम पर भी वास्तविक सांपों के साथ प्रदर्शन को परंपरा के रूप में बढ़ावा देना उचित नहीं है।
यही कारण है कि आज नागपंचमी के मेलों और आयोजनों में पहले की तरह सपेरों की मौजूदगी दिखाई नहीं देती।
क्या आधुनिकता ने बच्चों का बचपन बदल दिया?
सपेरों की घटती मौजूदगी के साथ एक दूसरा सवाल भी सामने आता है—क्या आधुनिक दौर ने बच्चों के अनुभवों को बदल दिया है?
1990 के दशक और उससे पहले बच्चों का मनोरंजन मुख्य रूप से घर और आसपास के वातावरण से जुड़ा होता था। गलियों में होने वाले छोटे-छोटे आयोजन, मेले, मदारी, सपेरे, कठपुतली के खेल और स्थानीय कलाकार बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र होते थे।
आज बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और वीडियो प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। अब किसी दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए बच्चे के बाहर निकलने की जरूरत भी नहीं पड़ती। मोबाइल स्क्रीन पर कुछ सेकंड में दुनिया के किसी भी हिस्से की जानकारी और वीडियो सामने आ जाते हैं।
निश्चित रूप से आधुनिक तकनीक ने बच्चों के ज्ञान और अवसरों को बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय लोक संस्कृति और पारंपरिक मनोरंजन से उनका सीधा संपर्क भी कम हुआ है।
सपेरों के सामने रोजी-रोटी का संकट
सपेरों की पारंपरिक आजीविका खत्म होने का एक बड़ा प्रभाव उनके समुदायों पर पड़ा। जिन परिवारों की पीढ़ियां सांपों से जुड़े पारंपरिक प्रदर्शन पर निर्भर थीं, उनके सामने वैकल्पिक रोजगार की चुनौती खड़ी हुई।
जब पुराना काम कानूनी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण संभव नहीं रहा, तो कई परिवारों को दूसरे कामों की ओर जाना पड़ा। कुछ ने मजदूरी, छोटे कारोबार या अन्य पारंपरिक कार्यों को अपनाया, जबकि कुछ समुदायों के सामने रोजगार का संकट भी बना रहा।
यहीं सरकार और समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वन्यजीव संरक्षण जरूरी है, लेकिन उन समुदायों के पुनर्वास और वैकल्पिक आजीविका के अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जिनकी पारंपरिक जीविका बदलते कानून और सामाजिक परिस्थितियों के कारण प्रभावित हुई है।
क्या सरकार ने सपेरा समुदाय की अनदेखी की?
यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या सपेरा समुदाय को पर्याप्त वैकल्पिक अवसर मिल पाए हैं। इसका जवाब हर क्षेत्र और समुदाय के लिए अलग हो सकता है। इसलिए बिना स्थानीय आंकड़ों और सरकारी योजनाओं की जानकारी के यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरे देश में सरकार ने इस समुदाय की अनदेखी की है।
फिर भी, यह जरूर कहा जा सकता है कि पारंपरिक आजीविका में बदलाव के दौर में कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार, सामाजिक सुरक्षा और वैकल्पिक रोजगार की योजनाएं ऐसे समुदायों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।
साथ ही, यदि पारंपरिक कला और लोक संस्कृति को संरक्षित किया जाए तो सपेरा समुदाय से जुड़े लोग बिना वास्तविक वन्यजीवों का इस्तेमाल किए अपनी सांस्कृतिक कला को नए रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। उदाहरण के लिए लोक संगीत, बीन वादन, कठपुतली, कहानी-कथन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को पर्यटन तथा स्थानीय मेलों से जोड़ा जा सकता है।
बीन की धुन आज भी बचाई जा सकती है
सपेरों की पहचान केवल सांप दिखाने तक सीमित नहीं थी। उनकी बीन की धुन, पहनावा, लोककथाएं और प्रदर्शन की शैली भी लोक संस्कृति का हिस्सा रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सांपों को प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल किए बिना इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जाए। स्थानीय प्रशासन, सांस्कृतिक संस्थाएं और समाज मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, जहां पारंपरिक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें।
इससे एक ओर वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक कलाकारों को अपनी कला के माध्यम से सम्मान और रोजगार का अवसर मिल सकता है।
नागपंचमी पर बदल गया उत्सव का स्वरूप
नागपंचमी आज भी श्रद्धा और आस्था का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन लोग नाग देवता की पूजा करते हैं और भगवान शिव का स्मरण करते हैं। लेकिन त्योहार मनाने का तरीका समय के साथ बदल गया है।
जहां पहले कई क्षेत्रों में वास्तविक सांपों को देखने के लिए लोग सपेरों के आसपास जुटते थे, वहीं अब मंदिरों, धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से पर्व मनाया जाता है।
यह बदलाव केवल एक परंपरा के खत्म होने की कहानी नहीं है। बल्कि यह बताता है कि समाज, कानून, पर्यावरण जागरूकता और तकनीक मिलकर किस तरह हमारी पुरानी जीवनशैली को बदल रहे हैं।
सांपों की जगह अब संरक्षण का संदेश
आज नागपंचमी को वन्यजीव संरक्षण से जोड़कर एक सकारात्मक संदेश भी दिया जा सकता है। नाग देवता की पूजा करते समय वास्तविक सांपों को पकड़कर या उनके साथ प्रदर्शन करने के बजाय उनके संरक्षण का संकल्प लिया जा सकता है।
सांप पर्यावरणीय तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए उन्हें नुकसान पहुंचाने के बजाय सुरक्षित तरीके से उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना अधिक उचित है।
विशेष रूप से बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि सांपों को देखने की उत्सुकता स्वाभाविक है, लेकिन किसी जंगली जीव को पकड़ना या उसके साथ छेड़छाड़ करना सुरक्षित नहीं है। वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण में रहने देना ही बेहतर है।
क्या सपेरों की विरासत फिर लौट सकती है?
सपेरों की पुरानी शैली शायद उसी रूप में वापस न आए, लेकिन उनकी सांस्कृतिक विरासत को नए रूप में जरूर बचाया जा सकता है। यदि बीन वादन, लोक संगीत, पारंपरिक कथाओं और सांस्कृतिक प्रदर्शन को प्रोत्साहन मिले तो आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत से परिचित हो सकती हैं।
इसके लिए सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ स्थानीय समाज और सांस्कृतिक संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। सपेरा समुदाय के कलाकारों को प्रशिक्षण, मंच और वैकल्पिक रोजगार से जोड़ना एक ऐसा रास्ता हो सकता है, जिससे संस्कृति भी बचे और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
नागपंचमी की यादों में आज भी जिंदा हैं सपेरे
सपेरों का कम दिखाई देना केवल एक पारंपरिक पेशे के खत्म होने की कहानी नहीं है। यह बदलते भारत की तस्वीर भी है। कभी गलियों में बीन की धुन सुनकर बाहर निकलने वाले बच्चे आज मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया देख रहे हैं। वहीं वन्यजीव संरक्षण के प्रति बढ़ती जागरूकता ने वास्तविक सांपों के सार्वजनिक प्रदर्शन की पुरानी परंपरा को लगभग समाप्त कर दिया है।
फिर भी, सपेरों से जुड़ी लोक संस्कृति और उनके समुदाय की पारंपरिक कला को संरक्षित किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सांपों को प्रदर्शन का हिस्सा बनाए बिना कलाकारों को वैकल्पिक मंच और रोजगार उपलब्ध कराया जाए।
नागपंचमी के अवसर पर इसलिए पुरानी यादों को ताजा करने के साथ एक नया संकल्प भी लिया जा सकता है—आस्था भी रहे, संस्कृति भी बचे और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। यही बदलते समय में इस परंपरा को सम्मानजनक और सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता हो सकता है।

