कानपुर के पारस हॉस्पिटल में इलाज पर सवाल, परिजनों ने डॉक्टरों पर लगाए गंभीर आरोप
रिपोर्ट- विवेक कृष्ण दीक्षित
कानपुर: शहर के पारस हॉस्पिटल में मरीजों के इलाज और ऑपरेशन के बाद उनकी देखभाल को लेकर परिजनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। दो अलग-अलग मामलों में मरीजों के परिवारों ने आरोप लगाया है कि ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने समय पर मरीजों की जांच नहीं की और नियमित निगरानी को लेकर भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा। इन शिकायतों के सामने आने के बाद अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों की पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
परिजनों का आरोप है कि एक मामले में आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच दिन के अप्रूवल के बावजूद मरीज को ऑपरेशन के कुछ ही दिन बाद डिस्चार्ज करने की बात कही गई। वहीं, दूसरे मामले में परिवार का दावा है कि ऑपरेशन के बाद 24 घंटे से अधिक समय तक डॉक्टर मरीज को देखने नहीं पहुंचे। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और अस्पताल प्रबंधन की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शिव भजन गुप्ता के मामले में परिजनों ने उठाए सवाल
पहला मामला शिव भजन गुप्ता से जुड़ा है। परिजनों के अनुसार, उन्हें 13 अगस्त को पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। इसके अगले दिन यानी 14 अगस्त को उनके कूल्हे का ऑपरेशन किया गया।
परिजनों का कहना है कि मरीज को आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच दिन के अप्रूवल पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद से डॉक्टर ने मरीज की नियमित जांच नहीं की। जब उन्होंने डॉक्टर के बारे में अस्पताल में जानकारी लेने की कोशिश की तो उन्हें बताया गया कि 15 अगस्त और रविवार होने के कारण डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं।
परिजनों के मुताबिक, इस स्थिति ने उनकी चिंता बढ़ा दी। उनका कहना है कि ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति की नियमित निगरानी जरूरी होती है और ऐसे में डॉक्टर के समय पर उपलब्ध नहीं होने से उन्हें परेशानी हुई।
परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि पांच दिन के अप्रूवल के बावजूद अस्पताल प्रबंधन की ओर से ऑपरेशन के तीन दिन बाद ही मरीज को डिस्चार्ज कर घर ले जाने की बात कही जा रही थी। इसी को लेकर परिजनों ने सवाल उठाया कि जब मरीज को पांच दिन के लिए अप्रूवल मिला है तो उससे पहले डिस्चार्ज करने की जरूरत क्यों बताई जा रही है।
दूसरे मरीज के परिजनों ने भी लगाया डॉक्टर के समय पर न पहुंचने का आरोप
दूसरा मामला चंदन निगम का है। परिजनों के अनुसार, मरीज के घुटने का ऑपरेशन 15 अगस्त को किया गया। परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन पैकेज की पूरी राशि अस्पताल में पहले ही जमा करा दी गई थी।
परिजनों के मुताबिक, वे 14 अगस्त की सुबह करीब आठ बजे मरीज को अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उनका कहना है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें लगभग दो घंटे तक लॉबी में इंतजार करना पड़ा। इसके बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया।
परिवार का दावा है कि दोपहर करीब तीन बजे तक उन्हें ऑपरेशन की स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। बाद में उन्हें पता चला कि ऑपरेशन हो चुका है और मरीज को कमरे में शिफ्ट कर दिया गया है।
इसके बाद भी परिजनों की चिंता कम नहीं हुई। उनका आरोप है कि ऑपरेशन के 24 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बावजूद डॉक्टर मरीज को देखने या उसकी स्थिति की जांच करने के लिए नहीं पहुंचे। परिवार ने अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऑपरेशन के बाद मरीज की निगरानी और चिकित्सकीय जांच को लेकर उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
पोस्ट-ऑपरेटिव केयर को लेकर उठे सवाल
ऑपरेशन के बाद मरीज की देखभाल को चिकित्सा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ऐसे में दोनों मामलों में परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों ने अस्पताल की पोस्ट-ऑपरेटिव व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिजनों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति पर नजर रखना, जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय जांच करना और परिवार को मरीज की स्थिति की जानकारी देना बेहद जरूरी है। ऐसे में यदि डॉक्टर समय पर मरीज को देखने नहीं पहुंचते हैं, तो परिवार के मन में स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा होती है।
हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी अस्पताल या डॉक्टर की कार्यप्रणाली पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित पक्षों का पक्ष और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही निकाला जा सकता है। फिलहाल सामने आई जानकारी मरीजों के परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित है।
आयुष्मान मरीज को लेकर भी परिजनों ने मांगा जवाब
पहले मामले में सबसे बड़ा सवाल आयुष्मान भारत योजना के तहत मिले अप्रूवल को लेकर उठाया गया है। परिजनों के अनुसार, मरीज को पांच दिन के अप्रूवल पर भर्ती किया गया था, लेकिन ऑपरेशन के तीन दिन बाद ही डिस्चार्ज की बात कही गई।
परिजनों का कहना है कि यदि मरीज की चिकित्सकीय स्थिति डिस्चार्ज के लिए उपयुक्त है तो उन्हें इसकी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। वहीं, यदि मरीज को अस्पताल में आगे निगरानी की जरूरत है तो उसके संबंध में भी परिवार को चिकित्सकीय आधार पर जानकारी मिलनी चाहिए।
ऐसे में परिवार की मांग है कि अस्पताल प्रबंधन यह स्पष्ट करे कि डिस्चार्ज की सलाह किस चिकित्सकीय आधार पर दी गई और आयुष्मान योजना के अप्रूवल की अवधि का मरीज की अस्पताल में रहने की अवधि से क्या संबंध है।
अस्पताल प्रबंधन के जवाब का इंतजार
इन दोनों मामलों के सामने आने के बाद अब अस्पताल प्रबंधन के आधिकारिक पक्ष का इंतजार है। परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर अस्पताल प्रशासन यदि अपनी स्थिति स्पष्ट करता है तो पूरे मामले की तस्वीर और साफ हो सकती है।
इसके अलावा, यदि संबंधित स्वास्थ्य विभाग को औपचारिक शिकायत मिलती है तो वह उपलब्ध रिकॉर्ड, मरीजों की मेडिकल फाइल, ऑपरेशन से संबंधित दस्तावेज और अस्पताल की प्रक्रिया की जांच कर सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि मरीजों की देखभाल में किसी स्तर पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
मरीजों की सुरक्षा और पारदर्शिता सबसे जरूरी
स्वास्थ्य सेवाओं में मरीज और उनके परिवार का अस्पताल पर भरोसा बेहद महत्वपूर्ण होता है। खासकर ऑपरेशन जैसी प्रक्रिया के बाद परिवार चाहता है कि मरीज की स्थिति की जानकारी उन्हें समय-समय पर मिलती रहे और जरूरत पड़ने पर चिकित्सक उपलब्ध रहें।
इस मामले में भी परिजनों ने मुख्य रूप से यही सवाल उठाए हैं कि ऑपरेशन के बाद मरीजों की नियमित निगरानी किस तरह की गई और उन्हें चिकित्सकीय स्थिति के बारे में कितनी जानकारी दी गई।
फिलहाल, पारस हॉस्पिटल प्रबंधन की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए पूरे मामले में अस्पताल का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। साथ ही, यदि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में जांच करता है तो उसके निष्कर्षों से यह पता चल सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और अस्पताल की व्यवस्था में किसी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।

