नागपंचमी पर ही खुलता है एक दिन नागचंद्रेश्वर मंदिर, जानिए इसकी अनोखी मान्यता और इतिहास – तुरंत करें सिर्फ एक क्लिक
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उज्जैन: हिंदू धर्म में नाग पूजा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। नागों को भगवान शिव के प्रिय और उनके आभूषण के रूप में भी माना जाता है। यही कारण है कि देशभर में नाग देवता और भगवान शिव से जुड़े कई प्राचीन मंदिर श्रद्धा और आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन्हीं में से एक है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर, जो विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके कपाट वर्ष में केवल एक दिन नागपंचमी के अवसर पर ही आम श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन यहां भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर में नागराज तक्षक का भी वास माना जाता है।
महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर विराजमान हैं नागचंद्रेश्वर
उज्जैन को भगवान महाकाल की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। इसी मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित है।
भगवान शिव के इस स्वरूप को नागचंद्रेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, आम श्रद्धालुओं को वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी के दिन ही यहां दर्शन का अवसर मिलता है। इस विशेष परंपरा के कारण नागपंचमी के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं।
इसके अलावा, मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने की प्रक्रिया भी अपनी अलग धार्मिक परंपरा रखती है। मान्यता के अनुसार, नागपंचमी के अवसर पर एक दिन पहले रात करीब 12 बजे मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद अगले दिन नागपंचमी की रात 12 बजे विशेष पूजा-अर्चना और आरती के बाद मंदिर के कपाट फिर बंद कर दिए जाते हैं।
नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा है बेहद अनोखी
नागचंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित प्राचीन प्रतिमा इसकी सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक है। मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती को सर्प की शय्या पर विराजमान दर्शाया गया है। उनके साथ भगवान गणेश की प्रतिमा भी दिखाई देती है। शिवजी के गले और भुजाओं में नागों का अलंकरण इस प्रतिमा को विशिष्ट धार्मिक स्वरूप प्रदान करता है।
कहा जाता है कि यह प्रतिमा करीब 11वीं शताब्दी की है और इसे नेपाल से उज्जैन लाए जाने की मान्यता है। प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती को फन फैलाए नाग के ऊपर विराजमान दिखाया गया है। यही स्वरूप इस मंदिर को श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बनाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु को सामान्यतः सर्प शय्या पर विराजमान दिखाया जाता है, जबकि यहां भगवान शिव को नाग की शय्या पर विराजमान स्वरूप में पूजा जाता है। इसी वजह से नागचंद्रेश्वर मंदिर की प्रतिमा को अत्यंत विशिष्ट माना जाता है।
नागराज तक्षक से जुड़ी है प्राचीन मान्यता
नागचंद्रेश्वर मंदिर से जुड़ी कथा नागराज तक्षक से भी संबंधित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया।
मान्यता है कि वरदान प्राप्त करने के बाद नागराज तक्षक भगवान शिव के सान्निध्य में रहने लगे। हालांकि, उन्होंने भगवान शिव से एकांत में रहने की इच्छा व्यक्त की थी। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें महाकाल वन में रहने का स्थान प्रदान किया।
इसी धार्मिक मान्यता के कारण कहा जाता है कि नागराज तक्षक वर्षभर भगवान शिव के सान्निध्य में रहते हैं और नागपंचमी के दिन ही श्रद्धालुओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता है। इस परंपरा को लेकर भक्तों में विशेष श्रद्धा है।
नागपंचमी पर उमड़ते हैं श्रद्धालु
नागपंचमी का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान शिव, नाग देवता और अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। उज्जैन में नागपंचमी के अवसर पर नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर का पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। इसके साथ ही, कई भक्त कुंडली में बताए गए सर्प दोष से मुक्ति की धार्मिक मान्यता के कारण भी यहां पूजा-अर्चना करते हैं। हालांकि, ऐसी मान्यताएं धार्मिक आस्था का विषय हैं।
नागपंचमी के दिन मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा और व्यवस्था के लिए प्रशासन तथा मंदिर प्रबंधन की ओर से भी विशेष इंतजाम किए जाते हैं।
साल में एक दिन दर्शन की परंपरा
नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा इसके कपाट साल में केवल एक दिन खुलने की है। आम दिनों में श्रद्धालु मंदिर के गर्भगृह में स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाते। इसलिए नागपंचमी का दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।
नागपंचमी के अवसर पर मंदिर के कपाट खुलने के बाद श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करते हैं। इसके बाद निर्धारित धार्मिक परंपरा के अनुसार रात में आरती और पूजा के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इस प्रकार सालभर में केवल एक अवसर पर दर्शन की यह परंपरा मंदिर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है मंदिर
नागचंद्रेश्वर मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि उज्जैन की प्राचीन संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। भगवान शिव, नाग पूजा और नागपंचमी से जुड़ी मान्यताओं को यह मंदिर एक साथ जोड़ता है।
विशेष रूप से नागपंचमी के दिन यहां होने वाली पूजा-अर्चना और दर्शन की परंपरा देशभर के श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ नागचंद्रेश्वर महादेव की धार्मिक मान्यताओं को जानना उज्जैन की आध्यात्मिक यात्रा को और भी विशेष बनाता है।
इस मंदिर से जुड़ी कथाएं पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती रही हैं। हालांकि, इन कथाओं और मान्यताओं को धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखा जाता है। मंदिर की ऐतिहासिकता, स्थापत्य और प्रतिमा की विशिष्टता इसे भारतीय धार्मिक विरासत में एक अलग स्थान प्रदान करती है।
नागपंचमी पर क्यों खुलता है मंदिर?
नागचंद्रेश्वर मंदिर के वर्ष में केवल एक बार खुलने की परंपरा के पीछे नागराज तक्षक से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। मान्यता है कि नागराज तक्षक भगवान शिव की आराधना के बाद उनके सान्निध्य में रहने लगे थे और उन्होंने एकांत की इच्छा जताई थी। इसलिए मंदिर के कपाट आम दिनों में बंद रहते हैं तथा नागपंचमी के अवसर पर श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं।
यही वजह है कि नागपंचमी के दिन उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है। भगवान शिव के इस अनोखे स्वरूप के दर्शन करने के लिए भक्त दूर-दूर से उज्जैन पहुंचते हैं और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
निष्कर्ष: नागचंद्रेश्वर मंदिर भगवान शिव, नाग पूजा और प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जुड़ा एक विशिष्ट धार्मिक स्थल है। साल में केवल एक दिन इसके कपाट खुलने की परंपरा इसे अन्य मंदिरों से अलग पहचान देती है। नागपंचमी के अवसर पर यहां होने वाले दर्शन और पूजन के कारण उज्जैन की धार्मिक परंपरा में इस मंदिर का विशेष महत्व बना हुआ है।

