खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामलों में यूपी सबसे आगे, FSSAI के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
Digital UP News Desk
लखनऊ। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उनमें मिलावट को लेकर उत्तर प्रदेश से सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। केंद्र सरकार की ओर से राज्यसभा में साझा किए गए FSSAI के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में देशभर में खाद्य सुरक्षा से जुड़े 1,70,535 नमूनों की जांच की गई, जिनमें 34,388 नमूने मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। इनमें उत्तर प्रदेश में जांचे गए 30,380 नमूनों में से 16,500 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए। संख्या के लिहाज से यह देश के राज्यों में सबसे अधिक है।
इन आंकड़ों ने दूध, दूध से बने उत्पादों, मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ‘नॉन-कन्फॉर्मिंग’ या गैर-अनुरूप नमूना मिलना हर मामले में खतरनाक मिलावट साबित होने के बराबर नहीं है। खाद्य सुरक्षा जांच में मानक से कम गुणवत्ता, लेबलिंग में गड़बड़ी, गलत दावे और अन्य नियामकीय कमियां भी शामिल हो सकती हैं। इसलिए आंकड़ों को सही संदर्भ में समझना जरूरी है।
यूपी में सबसे अधिक गैर-अनुरूप नमूने
FSSAI से संबंधित केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश में कुल 30,380 खाद्य नमूनों का विश्लेषण किया गया। इनमें 16,500 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए। यह संख्या देश में सबसे अधिक रही। इसके मुकाबले मध्य प्रदेश में 13,920 नमूनों की जांच हुई और 1,635 नमूने गैर-अनुरूप मिले। राजस्थान में 13,840 नमूनों की जांच में 3,788 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए, जबकि तमिलनाडु में 18,071 नमूनों में से 2,240 नमूने मानकों के अनुरूप नहीं थे।
वित्त वर्ष 2023-24 में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति उल्लेखनीय रही थी। उस वर्ष प्रदेश में 27,750 नमूनों की जांच की गई और 16,183 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए। यानी एक साल में जांच की संख्या बढ़कर 30,380 हुई और गैर-अनुरूप नमूनों की संख्या भी बढ़कर 16,500 हो गई।
हालांकि, केवल कुल संख्या के आधार पर किसी राज्य को ‘सबसे अधिक मिलावट वाला’ कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। किसी राज्य में जितने अधिक नमूनों की जांच होगी, वहां गैर-अनुरूप नमूनों की कुल संख्या भी अधिक हो सकती है। इसलिए प्रतिशत, नमूने की श्रेणी और उल्लंघन के प्रकार को भी साथ में देखना जरूरी है।
दूध और दूध से बने उत्पादों पर विशेष नजर
खाद्य सुरक्षा के लिहाज से दूध और दूध से बने उत्पाद बेहद महत्वपूर्ण श्रेणी हैं। देश में दूध की खपत बड़े पैमाने पर होती है और इसी वजह से इसकी गुणवत्ता की नियमित जांच भी जरूरी है। केंद्र सरकार के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में देशभर में दूध और दूध से बने उत्पादों के 33,405 नमूनों का विश्लेषण किया गया, जिनमें 12,780 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए। इसके अलावा डिफॉल्ट करने वाले खाद्य कारोबारियों के खिलाफ 12,057 मामले शुरू किए गए।
FSSAI ने दूध में मिलावट की पहचान के लिए कई वैज्ञानिक जांच विधियां निर्धारित की हैं। इनमें दूध में स्टार्च, यूरिया, सुक्रोज, अमोनियम लवण, विदेशी वसा, डिटर्जेंट, फॉर्मल्डिहाइड, हाइड्रोजन पेरोक्साइड और अन्य पदार्थों की मौजूदगी की जांच शामिल है।
इससे स्पष्ट है कि दूध की गुणवत्ता जांच केवल देखने या स्वाद के आधार पर नहीं की जा सकती। कई मामलों में प्रयोगशाला जांच ही यह निर्धारित करती है कि उत्पाद निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।
मध्य प्रदेश में हर 56वां नमूना अधोमानक?
मध्य प्रदेश से जुड़े आंकड़े भी इस चर्चा को महत्वपूर्ण बनाते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्य में 13,920 खाद्य नमूनों की जांच हुई और 1,635 नमूने गैर-अनुरूप पाए गए। इस आधार पर लगभग हर 8.5वां जांचा गया नमूना गैर-अनुरूप श्रेणी में आया। इसलिए ‘हर 56वां नमूना अधोमानक’ वाला आंकड़ा FSSAI के इसी व्यापक 2024-25 खाद्य सुरक्षा डेटा से मेल नहीं खाता।
संभव है कि ‘हर 56वां’ किसी अलग खाद्य श्रेणी, अलग अवधि या अलग प्रकार की जांच के आंकड़ों से संबंधित हो। इसलिए इसे पूरे खाद्य क्षेत्र पर लागू करने से पहले संबंधित मूल रिपोर्ट देखना आवश्यक है। समाचार रिपोर्टिंग में ऐसे आंकड़ों का संदर्भ स्पष्ट करना पाठकों के लिए बेहद जरूरी है।
क्यों बढ़ती है मिलावट की चुनौती?
खाद्य पदार्थों में मिलावट या गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन कई कारणों से हो सकता है। बढ़ती मांग, कीमतों में अंतर, लंबे समय तक उत्पाद को सुरक्षित रखने की कोशिश, गलत लेबलिंग और अधिक मुनाफे की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।
दूध और मिठाइयों जैसे उत्पादों में उपभोक्ताओं की मांग त्योहारों और विशेष अवसरों पर तेजी से बढ़ती है। ऐसे समय में खाद्य सुरक्षा विभागों के सामने बड़े पैमाने पर सैंपलिंग और जांच की चुनौती भी बढ़ जाती है।
यही वजह है कि केवल कार्रवाई के बाद समस्या का समाधान करने के बजाय नियमित निगरानी और जागरूकता पर जोर देना आवश्यक है। FSSAI और राज्य खाद्य सुरक्षा विभाग समय-समय पर विशेष अभियान चलाते हैं और संदिग्ध खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर प्रयोगशालाओं में उनकी जांच कराते हैं।
FSSAI और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर साझा है। FSSAI वैज्ञानिक मानक तय करने और समन्वय की भूमिका निभाता है, जबकि राज्य खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों की क्षेत्रीय स्तर पर प्रवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
केंद्र सरकार के अनुसार देशभर में खाद्य नमूनों की जांच के लिए 246 NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएं प्राथमिक विश्लेषण के लिए अधिसूचित हैं। इसके अलावा अपीलीय नमूनों की जांच के लिए 24 रेफरल फूड लैबोरेटरी भी हैं। दूरदराज के इलाकों तक जांच की सुविधा पहुंचाने के लिए 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 305 मोबाइल ‘Food Safety on Wheels’ प्रयोगशालाएं तैनात हैं।
ये मोबाइल प्रयोगशालाएं आम मिलावट की प्राथमिक जांच करने के साथ खाद्य सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने का भी काम करती हैं।
उपभोक्ताओं की भी बड़ी भूमिका
खाद्य पदार्थ खरीदते समय उपभोक्ताओं को भी सावधानी बरतनी चाहिए। पैक्ड खाद्य सामग्री खरीदते समय निर्माण और समाप्ति तिथि, पैकेज की सील, FSSAI लाइसेंस या पंजीकरण संबंधी जानकारी और लेबल जरूर देखना चाहिए। वहीं दूध, मिठाई, पनीर और अन्य खुले खाद्य पदार्थ खरीदते समय साफ-सफाई और प्रतिष्ठित विक्रेता को प्राथमिकता देना बेहतर है।
यदि किसी खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता पर संदेह हो तो उसे खाने के बजाय संबंधित खाद्य सुरक्षा विभाग में शिकायत की जा सकती है। संदिग्ध उत्पाद का बिल, पैकेट और अन्य उपलब्ध जानकारी शिकायत के दौरान उपयोगी साबित हो सकती है।
आंकड़े चेतावनी हैं,
उत्तर प्रदेश में 2024-25 के दौरान 16,500 गैर-अनुरूप खाद्य नमूनों का सामने आना निश्चित रूप से खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है। साथ ही, यह आंकड़ा इस बात की ओर भी इशारा करता है कि प्रदेश में बड़े पैमाने पर सैंपलिंग और जांच हो रही है।
इसलिए तस्वीर को केवल ‘यूपी में सबसे ज्यादा मिलावट’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह है कि नमूनों में किस प्रकार की कमी पाई गई, कितने नमूने असुरक्षित थे, कितने अधोमानक थे और कितने मामलों में लेबलिंग या अन्य नियमों का उल्लंघन हुआ—इन सभी पहलुओं को अलग-अलग समझा जाए।
आखिरकार, उपभोक्ताओं को सुरक्षित और मानक के अनुरूप खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। वहीं, कारोबारियों के लिए भी नियमों का पालन करना और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देना जरूरी है। नियमित जांच, प्रभावी कार्रवाई, बेहतर प्रयोगशाला व्यवस्था और उपभोक्ता जागरूकता के जरिए खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

