राम मंदिर चढ़ावा विवाद: चंपत राय के समर्थन में संत, फिर जिम्मेदारी देने की उठी मांग
Digital UP News Desk
अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और चोरी के मामले को लेकर अयोध्या में सियासी और धार्मिक हलचल लगातार बनी हुई है। इस बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय के समर्थन में अयोध्या के संतों का एक बड़ा वर्ग सामने आया है। संतों ने उन्हें निर्दोष बताते हुए ट्रस्ट में दोबारा जिम्मेदारी देने की मांग उठाई है।
हालांकि, इस पूरे मामले की जांच अभी भी महत्वपूर्ण चरण में है। इसलिए चंपत राय को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही निकाला जा सकता है। दूसरी ओर, संतों और विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े पदाधिकारियों की ओर से चंपत राय के समर्थन ने राम मंदिर ट्रस्ट के भविष्य के नेतृत्व को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, 24 जुलाई को अयोध्या की मणिरामदास छावनी में संतों की एक बैठक हुई, जिसमें बड़ी संख्या में संतों के साथ VHP और RSS से जुड़े पदाधिकारी भी मौजूद रहे। बैठक में चंपत राय के समर्थन में आवाज उठाई गई और अयोध्या की प्रतिष्ठा बनाए रखने पर जोर दिया गया।
चंपत राय के समर्थन में संतों की बैठक
राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बीच अयोध्या के संतों की बैठक को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में करीब 250 संत, महंत और धार्मिक संस्थानों से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा VHP और RSS से जुड़े पदाधिकारी भी बैठक में मौजूद रहे।
बैठक में यह बात सामने रखी गई कि मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने अपने स्तर पर व्यवस्थाओं को संभालने की कोशिश की थी और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होने का इंतजार किया जाना चाहिए।
कुछ संतों ने चंपत राय के समर्थन में स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें चढ़ावा चोरी की घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। साथ ही, उनके दोबारा ट्रस्ट में आने की मांग भी सामने आई।
हालांकि, यह संत समाज की ओर से व्यक्त किया गया समर्थन है। इसे जांच एजेंसी की औपचारिक क्लीनचिट के बराबर नहीं माना जा सकता।
चंपत राय का इस्तीफा हो चुका है स्वीकार
राम मंदिर चढ़ावा विवाद सामने आने के बाद चंपत राय और ट्रस्ट के तत्कालीन सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पदों से इस्तीफा दिया था। बाद में ट्रस्ट ने दोनों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए।
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, 6 जुलाई 2026 को इस्तीफा स्वीकार किए जाने के बाद चंपत राय और अनिल मिश्रा ट्रस्ट के आधिकारिक सदस्य नहीं रहे।
इसलिए मौजूदा स्थिति में चंपत राय को राम मंदिर ट्रस्ट का महासचिव कहना सही नहीं होगा। हालांकि, संत समाज के एक हिस्से की ओर से उन्हें दोबारा जिम्मेदारी देने की मांग ने इस संभावना को लेकर चर्चा जरूर शुरू कर दी है कि जांच के बाद ट्रस्ट नेतृत्व को लेकर क्या फैसला हो सकता है।
चढ़ावा चोरी मामले की जांच अभी अहम
राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के मामले में पुलिस और SIT की जांच चल रही है। इस प्रकरण में कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है और गिरफ्तारियां भी हुई हैं।
जांच के दौरान मंदिर में दान और चढ़ावा प्रबंधन की व्यवस्था, कर्मचारियों की भूमिका, सुरक्षा व्यवस्था तथा संबंधित प्रक्रियाओं की भी पड़ताल की गई है।
इसी कारण यह मामला केवल चोरी की घटना तक सीमित नहीं रह गया है। अब मंदिर की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत पर भी चर्चा हो रही है।
RSS ने भी मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी से समाज और राम भक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं। संगठन ने जांच के बाद दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।
VHP की भूमिका को लेकर भी चर्चा
चंपत राय लंबे समय से विश्व हिंदू परिषद से जुड़े रहे हैं और राम मंदिर आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए चढ़ावा विवाद सामने आने के बाद VHP पर भी सवाल उठे।
हालांकि, VHP के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने जून में कहा था कि चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे ट्रस्ट पदाधिकारियों को जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने जांच को आगे बढ़ाने की बात कही थी।
बाद के घटनाक्रम में अयोध्या के संतों की ओर से चंपत राय का समर्थन सामने आया। इससे यह स्पष्ट है कि इस मामले में धार्मिक और संगठनात्मक स्तर पर अलग-अलग मत भी मौजूद हैं।
इसलिए “क्लीनचिट” शब्द का इस्तेमाल करते समय सावधानी जरूरी है। संतों द्वारा निर्दोष बताए जाने और जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट में निर्दोष पाए जाने के बीच अंतर है।
चंपत राय ने भी रखी थी अपनी बात
चंपत राय ने जुलाई की शुरुआत में चढ़ावा विवाद पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि वह SIT की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद सभी आरोपों का जवाब देंगे। उन्होंने मामले की जांच पूरी होने तक अयोध्या में रहने की बात भी कही थी।
उनका रुख यह रहा कि जांच पूरी होने के बाद ही मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। इससे पहले उन्होंने पुलिस पूछताछ के दौरान कथित हेराफेरी में अपनी भूमिका से इनकार किया था और कहा था कि मामले की जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई की गई।
इस बीच, उनके समर्थक संतों का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना उचित नहीं है।
क्या फिर मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चंपत राय को भविष्य में राम मंदिर ट्रस्ट में दोबारा कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है?
इसका फैसला फिलहाल स्पष्ट नहीं है। ट्रस्ट में नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नए बदलाव की चर्चा पहले से चल रही है। चंपत राय के इस्तीफे के बाद नए महासचिव की नियुक्ति को लेकर भी अलग-अलग नाम सामने आए थे।
वहीं, संत समाज का एक वर्ग उनके पुनर्वास के पक्ष में है। 24 जुलाई की बैठक में भी उनके समर्थन और ट्रस्ट में दोबारा शामिल करने की मांग सामने आई।
हालांकि, किसी व्यक्ति की दोबारा नियुक्ति का अंतिम फैसला ट्रस्ट की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होगा। इसके अलावा जांच के निष्कर्ष का भी इस फैसले पर असर पड़ सकता है।
मंदिर प्रशासन में पारदर्शिता पर जोर
चढ़ावा विवाद के बाद राम मंदिर ट्रस्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने की है। मंदिर में देश और विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और बड़ी मात्रा में दान भी प्राप्त होता है।
ऐसे में दान की गिनती, संग्रह, सुरक्षा, बैंकिंग और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
VHP अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी मंदिर प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO जैसी व्यवस्था की जरूरत का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि मंदिर के प्रशासनिक कामकाज को अधिक व्यवस्थित किया जाना चाहिए।
इससे संकेत मिलता है कि विवाद के बाद ट्रस्ट के कामकाज में संरचनात्मक बदलाव की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है।
संतों की सक्रियता से बढ़ी हलचल
अयोध्या के संतों का चंपत राय के समर्थन में सामने आना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राम मंदिर का धार्मिक और सामाजिक महत्व व्यापक है। मंदिर से जुड़े किसी भी विवाद का असर केवल ट्रस्ट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देशभर के राम भक्तों और धार्मिक संगठनों में इसकी चर्चा होती है।
इसी वजह से संत समाज की बैठक को भी मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। बैठक में अयोध्या की प्रतिष्ठा बनाए रखने और विवाद को लेकर अनावश्यक राजनीतिक बयानबाजी से बचने की अपील भी की गई।
हालांकि, दूसरी ओर कुछ संत और राजनीतिक दल जांच की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा चुके हैं। इसलिए आने वाले समय में जांच रिपोर्ट और ट्रस्ट के फैसले पर सभी की नजर रहेगी।
अब SIT की अंतिम रिपोर्ट पर नजर
फिलहाल राम मंदिर चढ़ावा विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जांच रिपोर्ट की है। जांच से यह स्पष्ट होना है कि कथित चोरी कैसे हुई, इसमें किन लोगों की भूमिका थी और मंदिर की व्यवस्थाओं में कहां-कहां खामियां रहीं।
इसके अलावा, यह भी तय होना है कि ट्रस्ट के पदाधिकारियों की कोई प्रशासनिक या प्रबंधन संबंधी जिम्मेदारी बनती है या नहीं।
ऐसे में चंपत राय के समर्थन में संतों की आवाज भले ही तेज हो गई हो, लेकिन अंतिम स्थिति जांच और ट्रस्ट के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
कुल मिलाकर, राम मंदिर चढ़ावा विवाद ने अयोध्या में धार्मिक, प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जांच जारी है, दूसरी ओर संत समाज का एक वर्ग चंपत राय के समर्थन में खड़ा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के निष्कर्ष क्या सामने आते हैं और राम मंदिर ट्रस्ट अपने भविष्य के नेतृत्व तथा प्रशासनिक व्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है।

