सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में कथित खरीद अनियमितताओं का मामला विधान परिषद पहुंचा, उच्चस्तरीय जांच की मांग
रिपोर्ट- रोहित सिंह चौहान
इटावाः उत्तर प्रदेश के इटावा जिले स्थित उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी) एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। इस बार मामला विश्वविद्यालय में फर्नीचर और फायर सेफ्टी उपकरणों की खरीद में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। इन खरीद प्रक्रियाओं में करोड़ों रुपये के वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल उठाए गए हैं। यह मुद्दा अब उत्तर प्रदेश विधान परिषद तक पहुंच चुका है, जहां समाजवादी पार्टी (सपा) के विधान परिषद सदस्य मुकुल यादव ने नियम-110 के तहत सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
विधान परिषद में उठा मामला
विधान परिषद के सत्र के दौरान सपा एमएलसी मुकुल यादव ने कहा कि सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में विभिन्न मदों में हुई खरीद प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। उनके अनुसार, फर्नीचर और फायर सेफ्टी उपकरणों की खरीद में पारदर्शिता को लेकर संदेह व्यक्त किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की कि यदि खरीद प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों या संबंधित पक्षों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक धन का उपयोग पूरी पारदर्शिता और निर्धारित नियमों के अनुरूप होना चाहिए। यदि कहीं वित्तीय अनियमितता की आशंका है तो उसकी जांच कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
खरीद प्रक्रिया पर उठ रहे हैं सवाल
जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय में फर्नीचर और फायर सेफ्टी से जुड़े उपकरणों की खरीद पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। इसी खरीद प्रक्रिया को लेकर कथित तौर पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, अभी तक इन आरोपों की किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है।
इसी कारण विपक्ष इस मामले में पारदर्शिता की मांग कर रहा है, जबकि सरकार की ओर से संभावित जांच और आवश्यक कार्रवाई की अपेक्षा जताई जा रही है।
प्रबंधन पहले भी रहा है चर्चा में
यह पहला अवसर नहीं है जब सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी का प्रशासन चर्चा में आया हो। इससे पहले भी विश्वविद्यालय के कुछ प्रशासनिक निर्णयों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठ चुके हैं।
विशेष रूप से विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह के दौरान समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं जसवंतनगर विधायक शिवपाल सिंह यादव तथा मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव को आमंत्रित नहीं किए जाने का मुद्दा काफी चर्चा में रहा था। उस समय समाजवादी पार्टी के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी व्यक्त की थी और इसे परंपराओं के विपरीत बताया था।
अब खरीद प्रक्रिया से जुड़े कथित आरोपों के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज
विधान परिषद में मामला उठने के बाद इस विषय ने राजनीतिक महत्व भी प्राप्त कर लिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि सार्वजनिक संस्थानों में होने वाले वित्तीय खर्च की निष्पक्ष जांच नहीं होगी तो पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होगी।
दूसरी ओर, प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। इसलिए विभिन्न पक्षों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है।
सरकार के जवाब का इंतजार
फिलहाल सरकार की ओर से इस मामले में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि सरकार जांच के आदेश देती है तो उसके बाद तथ्यों के आधार पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। वहीं, यदि जांच होती है तो उससे यह भी तय होगा कि खरीद प्रक्रिया में सभी नियमों का पालन किया गया था या नहीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इससे न केवल संस्थानों की विश्वसनीयता मजबूत होती है, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग पर भी लोगों का विश्वास कायम रहता है।
जांच के बाद ही स्पष्ट होगी स्थिति
वर्तमान में सामने आए आरोप राजनीतिक स्तर पर उठाए गए हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि होना अभी शेष है। इसलिए पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष किसी सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट या सरकार की आधिकारिक कार्रवाई के बाद ही सामने आएगा।
फिलहाल इतना तय है कि विधान परिषद में मामला उठने के बाद सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी एक बार फिर सुर्खियों में है और अब सभी की नजरें संभावित जांच और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

