सावन के पहले सोमवार पर पड़ी नाग पंचमी: जानिए पूजा का महत्व, पढ़िए पौराणिक कथा और परंपरा

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Digital UP News Desk

सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस वर्ष सावन के पहले सोमवार के साथ नाग पंचमी का शुभ संयोग बनने से श्रद्धालुओं का उत्साह और भी बढ़ गया है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति, प्रकृति और सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन नाग देवता की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है तथा परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और मंगल की कामना की जाती है।

मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही भगवान शिव और नाग देवता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों में यह पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

यह है नाग पंचमी का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में नागों को केवल एक जीव नहीं, बल्कि प्रकृति और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग इस बात का संदेश देते हैं कि प्रकृति के प्रत्येक जीव का सम्मान करना चाहिए। इसलिए नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवता की पूजा कर उनसे परिवार की रक्षा और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है।

कई स्थानों पर श्रद्धालु मंदिरों में जाकर नाग देवता का अभिषेक करते हैं। वहीं घरों में दूध, लाई, भीगे हुए चने तथा अन्य पारंपरिक प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में घर के कोनों में दूध, लाई और भीगे चने रखकर नाग देवता का आवाहन करने की भी परंपरा है।

सावन के पहले सोमवार का विशेष संयोग

इस वर्ष नाग पंचमी का पर्व सावन के पहले सोमवार के साथ पड़ने से इसका महत्व और अधिक बढ़ गया है। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन माना जाता है, जबकि नाग भगवान शिव के आभूषण के रूप में पूजनीय हैं। ऐसे में श्रद्धालु पहले भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और इसके बाद नाग देवता की पूजा कर परिवार के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस शुभ संयोग में की गई पूजा, दान और भगवान शिव का स्मरण विशेष फलदायी माना जाता है।

गांवों में आज भी जीवित हैं पारंपरिक रस्में

नाग पंचमी केवल धार्मिक आस्था का पर्व ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तर भारत के अनेक गांवों में आज भी इस दिन भाई-बहन मिलकर तालाबों और पोखरों के पास पारंपरिक ‘गुड़िया पीटने’ की रस्म निभाते हैं।

इसके अलावा घरों में अनरसे, घेवर, मालपुए और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। कई स्थानों पर कुश्ती के अखाड़े सजते हैं, जहां पहलवान अपने दांव-पेंच का प्रदर्शन करते हैं। इस प्रकार यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक मेल-मिलाप और लोक परंपराओं को भी सशक्त बनाता है।

भविष्य पुराण में वर्णित नाग पंचमी की कथा

भविष्य पुराण के अनुसार समुद्र मंथन के समय नागों ने अपनी माता की आज्ञा का पालन नहीं किया था। इसके परिणामस्वरूप उन्हें श्राप मिला कि राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ में वे भस्म हो जाएंगे। इस श्राप से भयभीत होकर सभी नाग ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे और उनसे रक्षा का उपाय पूछा।

तब ब्रह्माजी ने बताया कि महात्मा जरत्कारू के पुत्र आस्तिक मुनि उचित समय पर नागों की रक्षा करेंगे। कहा जाता है कि यह उपाय पंचमी तिथि को बताया गया था। बाद में जब राजा जनमेजय का सर्प यज्ञ हुआ, तब आस्तिक मुनि ने अपने ज्ञान और तप के प्रभाव से नागों को विनाश से बचाया।

धार्मिक मान्यता है कि उस दिन श्रावण शुक्ल पंचमी थी। इसके बाद आस्तिक मुनि ने कहा कि जो भी व्यक्ति पंचमी तिथि पर श्रद्धापूर्वक नाग देवता की पूजा करेगा, उसे भगवान की कृपा प्राप्त होगी। तभी से नाग पंचमी मनाने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।

जानिए किसान और नागिन की कथा

नाग पंचमी से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय कथा भी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि एक किसान अपने दो बेटों और एक बेटी के साथ रहता था। एक दिन खेत की जुताई करते समय अनजाने में हल से नागिन के अंडे नष्ट हो गए।

जब नागिन वापस लौटी और उसने अपने अंडों को नष्ट देखा तो वह अत्यंत दुखी हुई। क्रोध में उसने किसान के दोनों पुत्रों को डस लिया। अगले दिन वह किसान की बेटी के पास भी पहुंची। हालांकि किसान की बेटी ने भय के बजाय विनम्रता और श्रद्धा का मार्ग अपनाया। उसने नागिन के सामने दूध का पात्र रखा और अपनी अनजानी भूल के लिए क्षमा मांगी।

लड़की के पश्चाताप और करुणा को देखकर नागिन का हृदय पिघल गया। उसने किसान के दोनों पुत्रों को पुनः जीवनदान दे दिया। धार्मिक मान्यता है कि यह घटना भी श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन हुई थी। इसलिए इस तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह कथा मनुष्य और प्रकृति के बीच प्रेम, सह-अस्तित्व और क्षमा की भावना का संदेश देती है।

पूजा के समय रखें इन बातों का ध्यान

नाग पंचमी के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान कर भगवान शिव और नाग देवता का स्मरण करते हैं। इसके बाद विधि-विधान से पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित नाग पंचमी की कथा का श्रवण या पाठ करते हैं।

धार्मिक दृष्टि से इस पर्व का मूल संदेश प्रकृति, जीव-जंतुओं और पर्यावरण के प्रति सम्मान का भाव रखना है। इसलिए श्रद्धालुओं से अपेक्षा की जाती है कि वे सभी जीवों के प्रति संवेदनशील रहें और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लें।

पढ़िए नाग पंचमी का संदेश

नाग पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने, सभी प्राणियों का सम्मान करने और क्षमा, करुणा तथा सह-अस्तित्व की भावना अपनाने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

सावन के पहले सोमवार और नाग पंचमी के इस शुभ अवसर पर श्रद्धालु भगवान शिव तथा नाग देवता की आराधना कर अपने परिवार के सुख, शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं।

नाग पंचमी पर्व की सभी श्रद्धालुओं को हार्दिक शुभकामनाएं।
हर-हर महादेव। नाग देवता की जय।