एनबीए ने चावल अनुसंधान और जैव विविधता संरक्षण के लिए 8.22 करोड़ रुपये जारी, यूपी को मिला सबसे बड़ा हिस्सा

12

Digital UP News Desk

नई दिल्ली: भारत में जैव विविधता संरक्षण, कृषि अनुसंधान और पारंपरिक फसल संसाधनों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority-NBA) ने चावल अनुसंधान संस्थानों तथा देश के 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों को 8.22 करोड़ रुपये जारी किए हैं।

यह राशि देश में चावल के लिए अब तक के सबसे बड़े एकल एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (Access and Benefit Sharing-ABS) वितरणों में से एक मानी जा रही है।

यह धनराशि एक अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनी मेसर्स पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन से प्राप्त हुई है, जिसने भारतीय चावल (Oryza sativa) की पारंपरिक किस्मों का उपयोग कर संकर (हाइब्रिड) किस्मों का विकास और व्यावसायिक उत्पादन किया। इस पहल का उद्देश्य देश के जैविक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त आर्थिक लाभों का निष्पक्ष और समान वितरण सुनिश्चित करना है।

जैविक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार यह वितरण केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन संस्थानों और राज्यों के योगदान का सम्मान भी है जिन्होंने वर्षों से चावल की देशी किस्मों के संरक्षण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय कृषि की मजबूती केवल आधुनिक तकनीकों पर नहीं, बल्कि पारंपरिक बीजों और जैविक विविधता के संरक्षण पर भी निर्भर करती है। ऐसे में यह पहल अनुसंधान संस्थानों और राज्यों को संरक्षण कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायता प्रदान करेगी।

अनुसंधान संस्थानों को मिले 2.47 करोड़ रुपये

जारी की गई कुल राशि में से 2.47 करोड़ रुपये उन अनुसंधान संस्थानों को दिए गए हैं जिन्होंने चावल की किस्मों का संरक्षण किया और उन्हें अनुसंधान एवं व्यावसायिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया।

इन संस्थानों में सबसे बड़ा हिस्सा आईसीएआर–भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (ICAR-Indian Institute of Rice Research), हैदराबाद को मिला है। संस्थान को लगभग 2.43 करोड़ रुपये प्रदान किए गए हैं।

इसके अतिरिक्त गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उत्तराखंड को उसके द्वारा संरक्षित विशेष चावल की किस्म के योगदान के लिए 3.26 लाख रुपये जारी किए गए हैं।

यह राशि बीज संरक्षण, जर्मप्लाज्म संग्रह, वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रशिक्षण और नई किस्मों के विकास में उपयोग की जाएगी।

33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिला लाभ

एनबीए ने 5.75 करोड़ रुपये की राशि देश के 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों तथा केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों को भी जारी की है।

धनराशि का वितरण कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल में दर्ज धान उत्पादक क्षेत्र के आधार पर किया गया है।

इस वितरण में उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा हिस्सा मिला है।

शीर्ष 10 राज्यों को मिला आवंटन

  • उत्तर प्रदेश – ₹73,26,225
  • पश्चिम बंगाल – ₹64,94,795
  • तेलंगाना – ₹50,59,674
  • ओडिशा – ₹48,09,040
  • छत्तीसगढ़ – ₹45,90,940
  • पंजाब – ₹37,14,926
  • बिहार – ₹36,93,237
  • मध्य प्रदेश – ₹36,16,118
  • असम – ₹27,78,664
  • आंध्र प्रदेश – ₹25,88,278

इसके अलावा कम धान उत्पादन वाले राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों, जैसे सिक्किम तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, को भी उनके हिस्से के अनुसार राशि आवंटित की गई है।

संरक्षण और किसानों के हित में होगा उपयोग

एनबीए के अनुसार यह धनराशि केवल संस्थागत विकास तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका उपयोग कई महत्वपूर्ण संरक्षण गतिविधियों में किया जाएगा।

राज्य जैव विविधता बोर्ड इस राशि का उपयोग—

  • देशी धान और अन्य फसलों की पारंपरिक किस्मों के संरक्षण,
  • जैव विविधता संवर्धन,
  • पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन,
  • पारंपरिक कृषि ज्ञान के दस्तावेजीकरण,
  • स्थानीय किसानों और पारंपरिक ज्ञान धारकों को सहयोग,
  • सामुदायिक संरक्षण कार्यक्रमों

जैसी गतिविधियों में करेंगे।

दूसरी ओर अनुसंधान संस्थान जर्मप्लाज्म संरक्षण, बीज बैंक, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत बनाएंगे।

एबीएस व्यवस्था क्यों है महत्वपूर्ण?

Access and Benefit Sharing (ABS) व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि कोई संस्था या कंपनी भारत के जैविक संसाधनों या पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक उपयोग करती है, तो उससे प्राप्त आर्थिक लाभ का उचित हिस्सा उन संस्थानों, समुदायों और राज्यों को भी मिले जिन्होंने इन संसाधनों का संरक्षण किया है।

यह व्यवस्था जैविक विविधता अधिनियम, 2002 तथा नागोया प्रोटोकॉल के सिद्धांतों पर आधारित है।

विशेषज्ञों के अनुसार इससे जैव विविधता संरक्षण को आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी बढ़ती है।

162 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचा कुल एबीएस वितरण

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने बताया कि केवल कृषि और बीज क्षेत्र से अब तक लगभग 83 करोड़ रुपये एबीएस भुगतान के रूप में प्राप्त हुए हैं।

वहीं, सभी क्षेत्रों को मिलाकर अब तक कुल 162 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ-साझाकरण वितरण किया जा चुका है।

यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत जैविक संसाधनों के संरक्षण और उनके न्यायसंगत उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर प्रभावी मॉडल विकसित कर रहा है।

वैश्विक लक्ष्यों को भी मिलेगा समर्थन

यह पहल कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework) के लक्ष्य-13 के अनुरूप है, जिसमें आनुवंशिक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान से प्राप्त लाभों के निष्पक्ष और समान वितरण पर बल दिया गया है।

इसके अलावा यह पहल संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को भी समर्थन देती है, जिनमें—

  • SDG-2 : शून्य भूख (Zero Hunger)
  • SDG-12 : जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन
  • SDG-15 : भूमि पर जीवन
  • SDG-17 : लक्ष्यों के लिए साझेदारी

विशेष रूप से शामिल हैं।

एनबीए की भूमिका

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्थापना जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन की गई थी।

यह एक वैधानिक संस्था है, जो भारत के जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच को विनियमित करती है तथा यह सुनिश्चित करती है कि इन संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से प्राप्त लाभों का निष्पक्ष वितरण हो।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा जारी 8.22 करोड़ रुपये केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि भारत की जैव विविधता, कृषि अनुसंधान और किसानों के योगदान को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इससे अनुसंधान संस्थानों को वैज्ञानिक कार्यों में गति मिलेगी, जबकि राज्यों को जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध होंगे। आने वाले वर्षों में यह पहल कृषि नवाचार, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलित विकास का मजबूत आधार बन सकती है।

You may have missed