जानिए कैसे शुरू हुई थी कांवड़ यात्रा और यह भी जानिए कौन थे पहले कांवड़िया – पढ़िए कैसे शुरू हुई शिव भक्तों की यह परंपरा
Digital UP News Desk
सावन का पावन महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में देशभर से लाखों शिवभक्त केसरिया वस्त्र धारण कर कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। श्रद्धालु पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए शिवालयों तक पहुंचते हैं और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। आस्था, भक्ति और सेवा की यह परंपरा हर साल सावन में देखने को मिलती है।
पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप काफी व्यापक हुआ है। अब केवल ग्रामीण क्षेत्रों के लोग ही नहीं, बल्कि शहरों के युवा, नौकरीपेशा लोग और शिक्षित वर्ग भी इस धार्मिक यात्रा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर कांवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और सबसे पहले कांवड़ उठाने वाले कौन थे। इसे लेकर धार्मिक ग्रंथों और विद्वानों के बीच अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं।
भगवान परशुराम को माना जाता है पहला कांवड़िया
कई धार्मिक विद्वानों के अनुसार भगवान परशुराम को सबसे पहला कांवड़िया माना जाता है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के पास स्थित प्रसिद्ध पुरा महादेव मंदिर में गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया था।
कहा जाता है कि परशुराम गढ़मुक्तेश्वर (वर्तमान ब्रजघाट) से गंगाजल लेकर आए थे और उन्होंने कांवड़ के माध्यम से जल पहुंचाकर भगवान शिव को अर्पित किया। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आज भी सावन महीने में लाखों श्रद्धालु ब्रजघाट से गंगाजल भरकर पुरा महादेव मंदिर में जल चढ़ाते हैं।
इस मान्यता के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पुरा महादेव मंदिर कांवड़ यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
श्रवण कुमार से जुड़ी है कांवड़ यात्रा की एक मान्यता
वहीं, कुछ विद्वानों का मत है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। रामायण काल से जुड़ी इस कथा के अनुसार श्रवण कुमार अपने माता-पिता की सेवा और उनकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रसिद्ध थे।
मान्यता है कि जब उनके माता-पिता ने हरिद्वार जाकर गंगा स्नान करने की इच्छा जताई, तब श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई। वह उन्हें हरिद्वार लेकर गए और गंगा स्नान कराया। इसके बाद वे गंगाजल भी अपने साथ लेकर आए।
इसी घटना को कुछ लोग कांवड़ यात्रा की शुरुआत से जोड़ते हैं। इस मान्यता में कांवड़ यात्रा को माता-पिता की सेवा, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
भगवान राम से भी जुड़ी है कांवड़ यात्रा की मान्यता
कांवड़ यात्रा को लेकर एक अन्य धार्मिक मान्यता भगवान श्रीराम से जुड़ी हुई है। कुछ कथाओं के अनुसार भगवान राम ने भी कांवड़ के माध्यम से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था।
मान्यता है कि भगवान राम ने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। हालांकि, इस कथा को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं मौजूद हैं।
रावण और समुद्र मंथन की कथा से भी जुड़ा इतिहास
कांवड़ यात्रा की एक प्रमुख मान्यता समुद्र मंथन की कथा से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया तो उसमें से हलाहल विष निकला। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया।
विष के प्रभाव के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। मान्यता है कि भगवान शिव को विष के प्रभाव से राहत दिलाने के लिए उनके परम भक्त रावण ने तपस्या की और कांवड़ में जल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया।
कुछ धार्मिक मान्यताओं में इसे कांवड़ परंपरा की शुरुआत से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह कथा भी धार्मिक आस्था पर आधारित है और इसके अलग-अलग रूप मिलते हैं।
देवताओं द्वारा जलाभिषेक की मान्यता
कुछ धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन के बाद हलाहल विष के प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल अर्पित किया था।
ऐसा माना जाता है कि सावन महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा इसी भावना से जुड़ी हुई है। भक्त गंगा और अन्य पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव को समर्पित करते हैं।
सावन में क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा?
सावन मास को भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है। इसलिए इस महीने में शिवभक्त विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु नियमों का पालन करते हुए पैदल चलते हैं और शिवालयों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं।
इसके अलावा, कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सेवा का भी उदाहरण बन चुकी है। रास्तों में कई स्थानों पर सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय लोग कांवड़ियों के लिए भोजन, पानी और विश्राम की व्यवस्था करते हैं।
आस्था और परंपरा का प्रतीक है कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा का इतिहास कई धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। चाहे भगवान परशुराम, श्रवण कुमार, भगवान राम या रावण से जुड़ी मान्यताएं हों, सभी कथाओं में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना दिखाई देती है।
इस प्रकार कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और भक्ति का प्रतीक है। सावन के महीने में जब लाखों शिवभक्त कांवड़ लेकर निकलते हैं तो यह परंपरा देश की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक आस्था को भी दर्शाती है।

