सोशल मीडिया एल्गोरिथम और नैरेटिव की राजनीति: कैसे हैशटैग तय कर रहे हैं मुद्दों का असर

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रिपोर्टः अमित सिंह यादव

नई दिल्लीः आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह जनमत निर्माण और सामाजिक मुद्दों को दिशा देने वाली एक बड़ी ताकत बन चुका है। वरिष्ठ पत्रकार मधुरेन्द्र कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए इसी बदलती डिजिटल राजनीति और एल्गोरिथम की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वर्तमान समय में कई बड़े मुद्दों की दिशा केवल सरकार या पारंपरिक मीडिया से तय नहीं होती, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिथम भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई मुद्दा जन सरोकार से जुड़ा होता है, जैसे परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक या युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल, तो सोशल मीडिया की ताकत उस मुद्दे को तेजी से व्यापक स्तर तक पहुंचा सकती है। ऐसे मामलों में कई बार सरकारों को भी जनता की मांगों पर गंभीरता से विचार करना पड़ता है।

टीवी मीडिया और सोशल मीडिया के काम करने का तरीका अलग

मधुरेन्द्र कुमार के अनुसार टीवी मीडिया और सोशल मीडिया दोनों का काम करने का तरीका अलग-अलग है। टीवी चैनल मुख्य रूप से टीआरपी के आधार पर कंटेंट की प्राथमिकता तय करते हैं। किसी खबर को दर्शकों की ओर से जितना अधिक देखा जाता है, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि उस विषय पर आगे भी कार्यक्रम बनाए जाएं।

वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साप्ताहिक रिपोर्ट का इंतजार नहीं करना पड़ता। यहां किसी भी मुद्दे का प्रभाव तुरंत दिखाई देने लगता है। किसी हैशटैग की लोकप्रियता, वीडियो के व्यूज, कमेंट, शेयर और यूजर की प्रतिक्रिया से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन-सा कंटेंट तेजी से फैल रहा है।

इसके परिणामस्वरूप कंटेंट क्रिएटर भी उसी दिशा में अपनी सामग्री तैयार करने लगते हैं, जहां उन्हें अधिक लोगों तक पहुंच मिलने की संभावना दिखाई देती है। यही कारण है कि कई बार कोई मुद्दा कुछ ही समय में बड़े डिजिटल अभियान का रूप ले लेता है।

क्या है सोशल मीडिया एल्गोरिथम?

सोशल मीडिया एल्गोरिथम एक ऐसी कंप्यूटर प्रणाली है, जो यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी पोस्ट, वीडियो, रील या समाचार सबसे पहले दिखाई जाए।

यह प्रणाली कई संकेतों के आधार पर काम करती है। उदाहरण के तौर पर:

  • यूजर ने किस पोस्ट को लाइक किया।
  • किन वीडियो को ज्यादा समय तक देखा।
  • किन पोस्ट पर कमेंट या शेयर किया।
  • कौन-से विषयों को सर्च किया।
  • किन अकाउंट को फॉलो किया।

इन सभी गतिविधियों के आधार पर प्लेटफॉर्म यह अनुमान लगाता है कि यूजर की रुचि किस तरह के कंटेंट में है। इसके बाद उसी प्रकार की सामग्री को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है।

हालांकि, इसी व्यवस्था को लेकर कई बार सवाल भी उठते रहे हैं कि क्या एल्गोरिथम केवल यूजर की पसंद के आधार पर काम करता है या फिर किसी विशेष मुद्दे की पहुंच को बढ़ाने और कम करने में भी इसकी भूमिका होती है।

META और X जैसे प्लेटफॉर्म की भूमिका पर चर्चा

डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका के बीच यह बहस भी तेज हुई है कि सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे का प्रसार किस हद तक स्वाभाविक है और किस हद तक प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था से प्रभावित होता है।

मधुरेन्द्र कुमार का तर्क है कि META और X जैसे बड़े प्लेटफॉर्म यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि कौन-सा कंटेंट ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा। किसी हैशटैग के तेजी से वायरल होने के पीछे केवल यूजर की भागीदारी नहीं होती, बल्कि प्लेटफॉर्म की वितरण प्रणाली भी महत्वपूर्ण होती है।

यदि किसी विषय पर बड़ी संख्या में लोग सामग्री बनाना शुरू कर देते हैं, तो एल्गोरिथम भी उस कंटेंट को अधिक लोगों तक पहुंचाने लगता है। इस तरह धीरे-धीरे एक डिजिटल नैरेटिव तैयार हो सकता है।

सोशल मीडिया ने कई आंदोलनों को दी नई ताकत

दुनिया भर में कई आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका देखने को मिली है। अरब स्प्रिंग से लेकर भारत के कई जन आंदोलनों तक सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का काम किया है।

भारत में अन्ना आंदोलन के दौरान फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को आंदोलन से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बने थे। उस समय बड़ी संख्या में लोग ऑनलाइन माध्यम से आंदोलन की गतिविधियों से जुड़े और अपनी प्रतिक्रिया साझा करते रहे।

इसी तरह हाल के वर्षों में छात्र आंदोलनों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सोशल मीडिया ने लोगों तक जानकारी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

पेपर लीक जैसे मुद्दों पर बढ़ा डिजिटल प्रभाव

पेपर लीक जैसे विषय युवाओं के भविष्य से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे मुद्दों पर छात्रों, अभिभावकों और आम लोगों की भावनाएं तेजी से सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं।

मधुरेन्द्र कुमार के अनुसार, जब कोई मुद्दा रोजी-रोटी, करियर और भविष्य से जुड़ा होता है तो लोगों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। ऐसे समय में विचारधारा से ऊपर उठकर बड़ी संख्या में लोग उस मुद्दे से जुड़ने लगते हैं।

यही वजह है कि कई बार सोशल मीडिया अभियान सरकारों और संस्थानों पर जवाब देने का दबाव बनाते हैं।

एकतरफा छवि वाले इंफ्लूएंसर्स पर उठे सवाल

सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर अलग-अलग विचार रखने वाले कई इंफ्लूएंसर्स सक्रिय हैं। हालांकि, किसी भी मुद्दे पर प्रभाव बनाए रखने के लिए विश्वसनीयता सबसे महत्वपूर्ण होती है।

मधुरेन्द्र कुमार का कहना है कि जो सोशल मीडिया चेहरे लगातार किसी एक पक्ष के समर्थन में दिखाई देते हैं, उनकी बातों को लोग उसी नजरिए से देखने लगते हैं। ऐसे में किसी संवेदनशील मुद्दे पर उनकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि केवल प्रचार के माध्यम से लंबे समय तक जनमत को प्रभावित करना आसान नहीं होता। जनता उन आवाजों को ज्यादा महत्व देती है, जिन्हें वह निष्पक्ष और भरोसेमंद मानती है।

डिजिटल दौर में नैरेटिव की नई चुनौती

आज के समय में सरकार, मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कंटेंट क्रिएटर सभी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सूचना के इस तेज दौर में भरोसा कैसे बनाए रखा जाए।

सोशल मीडिया ने आम लोगों को अपनी बात रखने का बड़ा मंच दिया है। वहीं दूसरी ओर गलत सूचना, पक्षपात और डिजिटल प्रभाव को लेकर भी लगातार चर्चा होती रहती है।

इसलिए जरूरी है कि यूजर किसी भी जानकारी को स्वीकार करने से पहले उसकी सत्यता जांचें और अलग-अलग स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें।

अंततः सोशल मीडिया एल्गोरिथम आज के दौर में केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज में विचारों के प्रसार और मुद्दों की पहुंच को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका और भी बढ़ने की संभावना है, ऐसे में पारदर्शिता और जिम्मेदार उपयोग बेहद आवश्यक होगा।