बांदा रोडवेज में 20 हजार लीटर डीजल चोरी का लगा आरोप, जांच अधिकारी ने जिम्मेदारी से हटने की जताई इच्छा

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रिपोर्ट – पंकज त्रिपाठी 

बांदा: चित्रकूट धाम रीजन के बांदा रोडवेज डिपो में करीब 20 हजार लीटर डीजल से जुड़े मामले ने निगम की कार्यप्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 8 जुलाई 2026 को डीजल टैंकर से जुड़ी कथित अनियमितता सामने आने के बाद मामले की जांच शुरू की गई थी। इसके बाद डीजल सेक्शन के तीन कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया, जबकि डीजल सेक्शन की निगरानी से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी पर कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

मामले में अब जांच प्रक्रिया को लेकर भी नया मोड़ सामने आया है। जांच की जिम्मेदारी संभाल रहे सहायक अभियंता वित्त ने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर जांच से खुद को अलग करने की इच्छा जताई है। उन्होंने प्रारंभिक जांच में दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ की बात कही है। साथ ही, उनका कहना है कि रिकॉर्ड में अनियमितता लंबे समय से चली आ रही हो सकती है, ऐसे में कई वर्षों के दस्तावेजों की जांच करना उनके लिए संभव नहीं है।

20 हजार लीटर डीजल से भरे टैंकर को लेकर उठा मामला

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 8 जुलाई 2026 को करीब 20 हजार लीटर डीजल से भरा एक टैंकर बांदा डिपो पहुंचा था। प्रारंभिक तौर पर यह बताया गया कि डिपो के टैंक में पहले से पर्याप्त मात्रा में डीजल मौजूद था। इसी वजह से टैंकर को वापस भेजे जाने की बात सामने आई।

हालांकि, बाद में इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे और मामले की जांच शुरू की गई। जांच के दौरान डीजल सेक्शन से जुड़े तीन कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई।

इसके बाद यह सवाल भी उठने लगा कि यदि डीजल से जुड़े मामले में कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जा रही है, तो पूरे सेक्शन की निगरानी और जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा क्यों नहीं की गई।

तीन कर्मचारियों के निलंबन के बाद उठे सवाल

मामले में डीजल सेक्शन के तीन कर्मचारियों को निलंबित किया गया है। हालांकि, आरोप है कि डीजल सेक्शन के प्रभारी वरिष्ठ केंद्र प्रभारी के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।

यही वजह है कि जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद अब यह भी जांच का विषय बन गया है कि डीजल की खरीद, भंडारण, वितरण और रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया में किस स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है।

यदि जांच में दस्तावेजों में लंबे समय से अनियमितता की पुष्टि होती है, तो पूरे रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा आवश्यक हो सकती है।

जांच अधिकारी ने उच्च अधिकारियों को लिखा पत्र

मामले की जांच की जिम्मेदारी सहायक अभियंता वित्त को दी गई थी। हालांकि, उन्होंने उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर जांच से अपने हाथ खींचने की इच्छा जताई है।

जांच अधिकारी के अनुसार, प्रारंभिक जांच में दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ के संकेत मिले हैं। उनका दावा है कि यह समस्या केवल हाल की घटना तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि कई वर्षों से रिकॉर्ड में अनियमितता की संभावना है।

ऐसे में पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड की जांच करना एक बड़ी प्रक्रिया होगी। जांच अधिकारी ने इसी आधार पर अपनी कठिनाई उच्च अधिकारियों के सामने रखी है।

दस्तावेजों में छेड़छाड़ का दावा

जांच अधिकारी की प्रारंभिक रिपोर्ट से जुड़े दावों के अनुसार, डीजल से संबंधित दस्तावेजों में कथित तौर पर छेड़छाड़ की गई है। दस्तावेजों में किसी भी प्रकार की अनियमितता सामने आने पर यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि रिकॉर्ड तैयार करने, जांचने और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किस अधिकारी या कर्मचारी की थी।

जांच अधिकारी ने कथित तौर पर यह भी कहा है कि स्टेशन मास्टरों की ओर से समय-समय पर दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई। इसी वजह से लंबे समय तक रिकॉर्ड में होने वाली संभावित अनियमितताओं का पता नहीं चल सका। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि विस्तृत और स्वतंत्र जांच के बाद ही हो सकेगी।

वर्षों पुराने रिकॉर्ड की जांच बनी चुनौती

जांच अधिकारी के अनुसार, यदि कई वर्षों से रिकॉर्ड में गड़बड़ी की आशंका है, तो पूरे दस्तावेजों की जांच करना बेहद लंबी प्रक्रिया होगी।

ऐसे में केवल 8 जुलाई 2026 की घटना की जांच से पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकती। इसलिए डीजल की खरीद, टैंकरों की आमद, स्टॉक रजिस्टर, वितरण रिकॉर्ड और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों का मिलान करना जरूरी होगा।

इसके अलावा, डिपो में डीजल की वास्तविक खपत और रिकॉर्ड में दर्ज खपत के बीच भी तुलना की जा सकती है। इससे किसी संभावित अंतर या अनियमितता की जानकारी मिल सकती है।

स्टेशन मास्टरों की भूमिका पर भी सवाल

जांच अधिकारी ने अपनी प्रारंभिक जानकारी में स्टेशन मास्टरों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि समय-समय पर दस्तावेजों की जांच की जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई गई।

यदि रिकॉर्ड की नियमित जांच होती, तो किसी भी प्रकार की अनियमितता का पता पहले ही लगाया जा सकता था। हालांकि, इस संबंध में भी अंतिम जिम्मेदारी विस्तृत जांच के बाद ही तय की जा सकती है।

मामले में यह भी जांच का विषय है कि डीजल से जुड़े रिकॉर्ड की निगरानी के लिए कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार थे और किस स्तर पर रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाता था।

मंडलीय स्तर पर कार्रवाई को लेकर भी चर्चा

मामले में रोडवेज मंडल के स्तर पर जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि जांच को लंबा खींचे जाने से मामले की गंभीरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि, इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों का पक्ष जानना आवश्यक है।

यदि जांच प्रक्रिया लंबी चलती है, तो रिकॉर्ड और दस्तावेजों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए निष्पक्ष जांच के लिए दस्तावेजों को सुरक्षित रखते हुए स्वतंत्र तरीके से जांच की आवश्यकता है।

वित्तीय पारदर्शिता पर उठे सवाल

रोडवेज जैसे सार्वजनिक परिवहन संस्थान में डीजल की खरीद और खपत से जुड़े रिकॉर्ड का सीधा संबंध वित्तीय प्रबंधन से होता है। इसलिए डीजल की मात्रा, टैंकर की आपूर्ति, डिपो में स्टॉक और बसों में खपत के रिकॉर्ड में किसी भी तरह का अंतर वित्तीय पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।

बांदा डिपो में सामने आए इस मामले के बाद अब सवाल उठ रहा है कि क्या डीजल से जुड़े पुराने रिकॉर्ड की भी स्वतंत्र जांच कराई जाएगी। यदि लंबे समय से दस्तावेजों में अनियमितता की बात सामने आती है, तो जांच का दायरा केवल एक टैंकर या एक दिन की घटना तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

स्वतंत्र जांच की मांग

मामले को लेकर अब निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है। लोगों का कहना है कि जांच ऐसी एजेंसी या अधिकारी से कराई जानी चाहिए, जिसका मामले से प्रत्यक्ष संबंध न हो।

इससे जांच प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ सकता है और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय की जा सकती है। साथ ही, यदि जांच में किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका नहीं मिलती है, तो उन्हें भी आरोपों से मुक्त किया जा सकेगा।

आगे की कार्रवाई पर टिकी नजर

फिलहाल, तीन कर्मचारियों के निलंबन के बाद मामले की जांच जारी है। वहीं, जांच अधिकारी की ओर से उच्च अधिकारियों को लिखे गए पत्र के बाद जांच प्रक्रिया को लेकर नया सवाल खड़ा हो गया है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उच्च अधिकारी इस मामले में आगे क्या कदम उठाते हैं। क्या जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा? क्या पिछले वर्षों के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होगी? और क्या डीजल सेक्शन की निगरानी से जुड़े सभी अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की जाएगी?

इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।

कुल मिलाकर, बांदा रोडवेज डिपो में करीब 20 हजार लीटर डीजल से जुड़े मामले ने निगम की रिकॉर्ड व्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तीन कर्मचारियों के निलंबन और जांच अधिकारी के जांच से हटने की इच्छा जताने के बाद अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ और लंबे समय से चली आ रही संभावित अनियमितताओं के दावों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी।

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