इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से मुक्ति की अधिसूचना की रद्द, याचिकाकर्ताओं पर लगाया 5 लाख जुर्माना
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर के ग्राम शाहपुर (मोहसिनपुर) की अधिग्रहीत भूमि को अधिग्रहण से मुक्त कराने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर और गलत जानकारी देकर भूमि को अधिग्रहण से मुक्त कराने की अधिसूचना हासिल की थी। इसके बाद कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए उन पर पांच लाख रुपये का हर्जाना लगाया है।
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी या गलत बयानी के आधार पर प्राप्त आदेश को वापस लेने पर सामान्य नियम लागू नहीं होते। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में संबंधित प्राधिकारी को अवैध रूप से हासिल आदेश को निरस्त करने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल तथ्यों को छिपाने या अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता।
किस आदेश को दी गई थी चुनौती?
मामला कानपुर नगर के ग्राम शाहपुर (मोहसिनपुर) की लगभग 6-16-0 बीघा भूमि से जुड़ा है। सुमित मखीजा और अन्य याचिकाकर्ताओं ने प्रमुख सचिव की ओर से 16 मई 2008 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके माध्यम से भूमि को अधिग्रहण से मुक्त करने संबंधी अधिसूचना वापस ले ली गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भूमि का वास्तविक कब्जा कभी नहीं लिया गया और संबंधित विकास योजना भी लागू नहीं हुई। इसके अलावा, उन्होंने संशोधित मुआवजा जमा नहीं किए जाने का तर्क भी दिया था। इन्हीं आधारों पर भूमि को अधिग्रहण से मुक्त किए जाने की मांग की गई थी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के दावों को स्वीकार नहीं किया।
1959 में शुरू हुई थी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया
अदालत के समक्ष प्रस्तुत विवरण के अनुसार, कानपुर के कल्याणपुर, पनकी, पांडु टाउन एक्सपेंशन और ग्रीन बेल्ट स्कीम-40 के लिए वर्ष 1959 में कानपुर नगर क्षेत्र विकास अधिनियम, 1945 के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके बाद 29 जुलाई 1963 को अधिग्रहण का अवार्ड घोषित किया गया।
इस भूमि के मूल काश्तकार रतन थे। याचिकाकर्ताओं के पूर्वज बेलीराम और रामलाल ने 20 अगस्त 1962 को रतन से जमीन खरीदी थी। महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह खरीद अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू होने के बाद हुई थी।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को मामले के कानूनी पहलुओं के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने यह भी आया कि मूल काश्तकार रतन अधिग्रहण को चुनौती देने का अधिकार पहले ही छोड़ चुके थे। ऐसे में उनके बाद जमीन खरीदने वाले लोगों को भी ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता था।
पुराने मुकदमों की जानकारी छिपाने पर उठे सवाल
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी रिट याचिका में पूर्व में चले मुकदमों का पूरा विवरण नहीं दिया था। उनके पूर्वजों ने वर्ष 1968 में सिविल वाद संख्या 129 दायर किया था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद दाखिल सिविल अपील भी खारिज हो गई थी।
वहीं, द्वितीय अपील को याचिकाकर्ताओं ने 28 जुलाई 2006 को निष्प्रभावी बताते हुए खारिज करा लिया था। यह तारीख भूमि को अधिग्रहण से मुक्त करने वाली अधिसूचना जारी होने के बाद की थी।
ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार, मूल काश्तकार रतन अधिग्रहण को चुनौती देने का अधिकार छोड़ चुके थे। इसलिए उनके माध्यम से जमीन खरीदने वाले लोगों को भी अधिग्रहण के विरुद्ध दावा करने का अधिकार नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने माना कि इन महत्वपूर्ण तथ्यों को रिट याचिका में छिपाया गया। अदालत के मुताबिक, इस तरह की जानकारी छिपाने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और याचिकाकर्ताओं के दावे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
स्थगन आदेशों के कारण नहीं लिया जा सका कब्जा
याचिकाकर्ताओं ने भूमि का कब्जा नहीं लिए जाने को अधिग्रहण के विरुद्ध एक प्रमुख आधार बनाया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों ने अलग-अलग रिट याचिकाओं, सिविल वाद, अपील और द्वितीय अपील के दौरान स्थगन आदेश प्राप्त किए थे। इन्हीं न्यायिक आदेशों के कारण भूमि का कब्जा लेने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि कब्जा नहीं लिए जाने के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्राप्त स्थगन आदेशों ने ही अधिग्रहण की प्रक्रिया को प्रभावित किया था।
अधिग्रहण से मुक्ति की अधिसूचना को क्यों माना अवैध?
हाईकोर्ट ने मामले में संबंधित कानूनों के प्रावधानों की भी व्याख्या की। अदालत के अनुसार, भूमि का अधिग्रहण वर्ष 1945 के कानूनी प्रावधानों के तहत किया गया था। उस अधिनियम की अनुसूची में भू-अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 48-ए को शामिल किया गया था, लेकिन धारा 48 को नहीं अपनाया गया था।
इसके बाद 1945 का अधिनियम उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 581 के तहत निरस्त हो गया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में उसमें अपनाए गए 1894 के अधिनियम के प्रावधान भी प्रभावहीन हो गए थे।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 17 केवल उसी अधिनियम के तहत अर्जित भूमि पर लागू होती है। ऐसे में इस प्रावधान के आधार पर वर्ष 1945 के अधिनियम के तहत अधिग्रहीत भूमि को मुक्त नहीं किया जा सकता था।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि भूमि को अधिग्रहण से मुक्त करने वाली अधिसूचना शुरू से ही अवैध और अधिकारविहीन थी। इसलिए उसे वापस लेने के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता था।
अदालत ने लगाया पांच लाख रुपये का हर्जाना
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी प्राधिकारी के पास समीक्षा की शक्ति न होने पर वह अपने आदेश को वापस नहीं ले सकता। हालांकि, धोखाधड़ी या गलत बयानी के आधार पर प्राप्त आदेश इस सामान्य नियम का अपवाद है।
अदालत के अनुसार, यदि प्रमुख सचिव के आदेश को रद्द कर दिया जाता तो धोखाधड़ी से हासिल की गई अवैध अधिसूचना फिर से प्रभावी हो सकती थी। इसलिए याचिकाकर्ताओं को राहत देने का कोई औचित्य नहीं था।
खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत के साथ धोखाधड़ी की और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए करीब 65 वर्षों तक ऐसी भूमि पर कब्जा बनाए रखा, जिस पर उनका कोई वैध अधिकार नहीं था।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सुमित मखीजा और अन्य की याचिका खारिज कर दी तथा याचिकाकर्ताओं पर पांच लाख रुपये का हर्जाना लगाया। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में तथ्यों को छिपाकर या गलत जानकारी देकर कानूनी लाभ हासिल नहीं किया जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सही तथ्यों का प्रस्तुतिकरण अनिवार्य है।

