सोनभद्र में बया के अनोखे घोंसले बने आकर्षण का केंद्र, नर की कारीगरी पर फिदा होती है मादा

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रिपोर्ट – ज्ञान प्रकाश चतुर्वेदी 

सोनभद्र: प्रकृति अपने भीतर ऐसे कई रहस्य और खूबसूरत नजारे समेटे हुए है, जिन्हें देखकर इंसान भी हैरान रह जाता है। सोनभद्र के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों पेड़ों की डालियों से उल्टे लटकते बया पक्षी के घोंसले लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। घास के महीन रेशों और तिनकों से बेहद बारीकी से बुने गए ये घोंसले देखने में किसी कुशल कारीगर की बनाई कलाकृति जैसे नजर आते हैं।

खास बात यह है कि बया के इस अनोखे आशियाने को तैयार करने में नर बया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह अपने लिए उपयुक्त पेड़ और मजबूत डाल तलाशने के बाद घास, पत्तियों तथा पौधों के लचीले रेशे जुटाता है। इसके बाद चोंच और पैरों की मदद से इन रेशों को आपस में बुनकर घोंसले का आकार देना शुरू करता है। धीरे-धीरे यही साधारण से दिखने वाले तिनके एक मजबूत और आकर्षक घोंसले का रूप ले लेते हैं।

उल्टा लटका घोंसला है बया की खास पहचान

बया पक्षी का घोंसला सामान्य पक्षियों के घोंसले से काफी अलग दिखाई देता है। यह पेड़ की डाल से नीचे की ओर लटका होता है और इसका प्रवेश मार्ग संकरा होता है। घोंसले का ऊपरी हिस्सा डाल से मजबूती से जुड़ा रहता है, जबकि नीचे की तरफ रहने और प्रजनन के लिए अलग कक्ष बनाया जाता है।

इसकी खास बनावट इसे बारिश और तेज हवा जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों से बचाने में मदद करती है। वहीं, संकरा प्रवेश मार्ग भी घोंसले की संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि पेड़ की ऊंची डाल से लटकता हुआ बया का घोंसला पहली नजर में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।

नर बया घंटों करता है घोंसले की बुनाई

ग्रामीणों के मुताबिक, नर बया घोंसला तैयार करने में काफी मेहनत करता है। इसके लिए वह आसपास उपलब्ध घास और पौधों के लचीले रेशों का इस्तेमाल करता है। पहले वह डाल के पास घोंसले का आधार तैयार करता है और फिर धीरे-धीरे उसकी बुनाई को आगे बढ़ाता है।

घोंसला तैयार करने की प्रक्रिया में बया की चोंच और पैरों का तालमेल देखने लायक होता है। वह एक-एक रेशे को व्यवस्थित तरीके से बुनता है। इसके परिणामस्वरूप घोंसले की संरचना मजबूत होती जाती है। हालांकि, हर घोंसला पहली कोशिश में पूरी तरह तैयार हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार नर बया को अपनी संरचना में बदलाव करना पड़ता है।

मादा बया करती है घोंसले की जांच

बया के जीवन में घोंसले की भूमिका केवल रहने तक सीमित नहीं है। प्रजनन के दौरान नर बया घोंसला तैयार करने के साथ मादा को आकर्षित करने की कोशिश करता है। मादा घोंसले का निरीक्षण करती है और उसकी बनावट तथा मजबूती को परखती है।

यदि मादा को घोंसला पसंद आता है तो वह उसे स्वीकार कर सकती है। वहीं, पसंद नहीं आने पर नर को घोंसले में सुधार करना पड़ सकता है या वह नया घोंसला तैयार कर सकता है। यही कारण है कि कई बार एक ही पेड़ पर बया के कई घोंसले दिखाई देते हैं, जिनमें कुछ अधूरे भी हो सकते हैं।

इस तरह बया का घोंसला केवल पक्षी का आशियाना नहीं, बल्कि उसके जीवन और प्रजनन व्यवहार का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

पानी के आसपास के पेड़ों को दी जाती है प्राथमिकता

ग्रामीण इलाकों में अक्सर बया के घोंसले ऐसे पेड़ों पर देखने को मिलते हैं, जो पानी के स्रोत के आसपास या खुले स्थानों में मौजूद होते हैं। घोंसले के लिए पेड़ और डाल का चुनाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मजबूत डाल होने पर घोंसले को लटकाने और उसे स्थिर रखने में सुविधा होती है।

सोनभद्र जैसे प्राकृतिक विविधता वाले इलाके में पेड़ों और ग्रामीण परिवेश के बीच बया पक्षी आसानी से नजर आ जाता है। खासकर मानसून और उसके आसपास के मौसम में जब पेड़ों पर हरियाली रहती है, तब लटकते हुए घोंसले दूर से ही दिखाई देने लगते हैं।

ग्रामीणों के लिए कौतूहल का विषय बने घोंसले

ग्रामीण विनय मिश्रा बताते हैं कि गांवों के आसपास बया पक्षी वर्षों से इसी तरह पेड़ों पर अपने घोंसले बनाते रहे हैं। उनके मुताबिक, बया जिस बारीकी से घास और तिनकों को बुनता है, वह देखने में बेहद आकर्षक लगता है। तेज हवा और बारिश के बावजूद घोंसले का टिके रहना भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय रहता है।

वहीं, मझिगांव गांव के ग्रामीण शनि चौबे का कहना है कि बया का घोंसला केवल सुंदर दिखाई देने वाली संरचना नहीं है, बल्कि यह पक्षियों की प्राकृतिक क्षमता और मेहनत का उदाहरण भी है। एक छोटे से पक्षी द्वारा उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल करके ऐसी संरचना तैयार करना लोगों को प्रकृति के करीब ले जाता है।

प्रकृति की अनोखी कारीगरी का उदाहरण है बया

बया पक्षी का घोंसला प्रकृति में मौजूद अद्भुत अनुकूलन और निर्माण क्षमता का सुंदर उदाहरण माना जा सकता है। नर बया द्वारा तिनकों और घास के रेशों को बुनकर तैयार की गई संरचना में मजबूती के साथ-साथ उपयोगिता भी दिखाई देती है। वहीं, मादा द्वारा घोंसले का निरीक्षण और उसे स्वीकार करने की प्रक्रिया बया के सामाजिक व्यवहार को रोचक बनाती है।

दरअसल, आधुनिक दौर में जब लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे दृश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक जीवन की झलक दिखाते हैं। पेड़ों पर लटके बया के घोंसले यह याद दिलाते हैं कि पक्षियों की दुनिया भी अपनी अलग व्यवस्था और कौशल से भरी हुई है।

सोनभद्र में इन दिनों पेड़ों पर नजर आ रहे बया के घोंसले इसलिए भी खास हैं क्योंकि वे ग्रामीणों के बीच प्रकृति के प्रति जिज्ञासा और आकर्षण पैदा कर रहे हैं। घास के छोटे-छोटे रेशों से तैयार यह आशियाना वास्तव में बया की मेहनत, प्राकृतिक अनुकूलन और अद्भुत कारीगरी का जीवंत नमूना है।

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