ब्रजभाषा को जीवंत रखने के लिए व्यवहार में लाना जरूरी: शैलजाकांत मिश्र
रिपोर्ट – योगेश भारद्वाज
गोवर्धन। ब्रजभाषा के संरक्षण, संवर्धन और व्यावहारिक प्रयोग की दिशा में शनिवार को एक महत्वपूर्ण पहल हुई। सूरदास जी की तपोस्थली पारासौली में उनकी कुटी के निकट नवनिर्मित सूरदास ब्रजभाषा अकादमी के भवन का शुभारंभ उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र ने फीता काटकर किया। इस अवसर पर ‘ब्रजभाषा का मानकीकरण और व्यावहारिकता’ विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया। इसमें साहित्यकारों, विद्वानों, शोधकर्ताओं और ब्रजभाषा के जानकारों ने भाषा के संरक्षण और भविष्य को लेकर अपने विचार साझा किए।
ब्रजभाषा को दैनिक व्यवहार से जोड़ने पर जोर
अकादमी के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि शैलजाकांत मिश्र ने सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ब्रजभाषा को केवल साहित्य, पुस्तकों और शोध तक सीमित रखकर जीवंत नहीं रखा जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि ब्रजभाषा का प्रयोग आम बोलचाल, सामाजिक संवाद और दैनिक जीवन में निरंतर किया जाए।
उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा समय के साथ विकसित होती है। इसलिए बदलते समय और सामाजिक जरूरतों के अनुरूप ब्रजभाषा को भी व्यावहारिक स्वरूप देने की आवश्यकता है। यदि दूसरी भाषाओं के कुछ प्रचलित शब्द ब्रजभाषा में सहज रूप से प्रयोग किए जा सकते हैं, तो उन्हें अपनाने में संकोच नहीं होना चाहिए। इससे भाषा की मूल पहचान और भाव को बनाए रखते हुए उसे आधुनिक जीवन के अनुरूप अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान
दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं साहित्यकार डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी ने अकादमी की स्थापना को ऐतिहासिक पहल बताया। उन्होंने कहा कि यह स्थान सूरदास जी की तपोस्थली के निकट होने के साथ-साथ महाप्रभु वल्लभाचार्य की बैठक के आसपास स्थित है। ऐसे में यहां ब्रजभाषा अकादमी की स्थापना साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है।
संत हरिओम बाबा ने भी ब्रज क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ब्रज की पहचान यहां की भाषा, लोक परंपराओं, साहित्य, संगीत और धार्मिक विरासत से जुड़ी हुई है। इसलिए इन सभी पक्षों को साथ लेकर संरक्षण की दिशा में काम किया जाना आवश्यक है।
शोध और अभिलेखीकरण को मिलेगा बढ़ावा
अकादमी के निदेशक डॉ. केशव देव शर्मा ने ब्रजभाषा में संबोधन करते हुए अकादमी के भावी कार्यों की रूपरेखा रखी। उन्होंने कहा कि ब्रजभाषा के संरक्षण के लिए शोध कार्यों को प्रोत्साहित करना, व्यवस्थित डाटाबेस तैयार करना और नियमित पत्रिका का प्रकाशन जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सूरदास जी के पदों सहित ब्रज के समृद्ध साहित्य का संकलन, संरक्षण और व्यवस्थित अभिलेखीकरण किया जाना चाहिए। इसके साथ ही ब्रजभाषा के रचनाकारों, साहित्यकारों और विद्वानों को एक मंच पर लाकर अकादमी को व्यापक स्तर पर सक्रिय बनाने का प्रयास किया जाएगा।
डॉ. शर्मा के अनुसार, अकादमी केवल एक भवन तक सीमित न रहकर ब्रजभाषा से जुड़े शोध, साहित्य, लोक संस्कृति और रचनात्मक गतिविधियों का केंद्र बने, यही प्रयास रहेगा।
आकाशवाणी और दूरदर्शन की सामग्री का होगा उपयोग
दूरदर्शन मथुरा के निदेशक सत्यव्रत सिंह ने ब्रजभाषा से जुड़ी पुरानी रिकॉर्डिंग और अभिलेखीय सामग्री के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आकाशवाणी के अभिलेखागार में करीब आठ हजार टेप सुरक्षित हैं। इनमें लगभग 2400 रिकॉर्डिंग ब्रजभाषा के लोकगीत, वार्ताएं, ढोला, रेखाचित्र, नौटंकी और अन्य कार्यक्रमों से संबंधित हैं।
उन्होंने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन के पास उपलब्ध इस समृद्ध सामग्री का उपयोग ब्रजभाषा अकादमी के शोध, अभिलेखीकरण और प्रचार-प्रसार के लिए किया जा सकता है। इससे ब्रजभाषा के पुराने स्वरूप, लोकगीतों और लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
लोक कलाकारों और नई प्रतिभाओं को मंच देने की जरूरत
ब्रज माधुरी की एंकर चंद्रवती ने कहा कि केवल साहित्य को संरक्षित कर देना ही ब्रजभाषा संरक्षण के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही ब्रज क्षेत्र के लोक कलाकारों और उभरती प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें उचित मंच उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जब ब्रजभाषा लोक कलाकारों, युवाओं और आम लोगों के बीच निरंतर प्रयोग में रहेगी, तभी इसका वास्तविक संरक्षण संभव होगा। इसलिए अकादमी को साहित्य के साथ-साथ लोक कला और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।
विद्वानों और साहित्यकारों ने साझा किए विचार
दो दिवसीय संगोष्ठी का संचालन हंसराज कॉलेज, दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर एवं साहित्यकार डॉ. नृत्य गोपाल शर्मा ने किया। संगोष्ठी में ब्रजभाषा के मानकीकरण, व्यावहारिक प्रयोग, शोध, साहित्य संरक्षण और लोकजीवन में भाषा की भूमिका पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के अंत में परिषद के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी राजीव पांडेय ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, विद्वानों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि मनीष शर्मा, सत्यप्रकाश शर्मा ‘सोटानंद’, पूरन कौशिक, नरेंद्र कुमार नरेंद्र, ब्रज संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. उमेश चंद्र शर्मा, नीतू गोस्वामी, रेनू उपाध्याय, कपिल देव उपाध्याय, विट्ठल पारीक जयपुर, डॉ. रश्मि वर्मा, कुबेर दत्त गौतम, पूनम शर्मा पूर्णिमा अलीगढ़, हरी बाबू ओम, देवेंद्र शर्मा सूर श्याम सेवा मंडल, देवी प्रसाद गौड़, महेंद्र सिंगला, दूधनाथ यादव, गीता शोध संस्थान के समन्वयक चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार और राजस्व समन्वयक चंद्रिका प्रसाद राय सहित अनेक लोग मौजूद रहे।

