कानपुर में नकली एंटी रैबीज वैक्सीन का खुलासा, व्हाट्सऐप चैट से खुला खरीद-फरोख्त का राज
रिपोर्ट: हनुमंत सिंह पिंटू
कानपुर नगर।कानपुर में नकली एंटी रैबीज वैक्सीन की खरीद-फरोख्त के मामले ने दवा कारोबार की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली में पकड़ी गई संदिग्ध नकली अभयरैब (Abhayrab) एंटी रैबीज वैक्सीन की जांच के दौरान इसका कनेक्शन कानपुर के बिरहाना रोड स्थित दवा बाजार से सामने आया। इसके बाद दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश औषधि विभाग की जांच आगे बढ़ी और कानपुर की दवा फर्मों के रिकॉर्ड खंगाले गए। मामले में कलक्टरगंज थाने में तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
दिल्ली से सामने आया कानपुर कनेक्शन
मामले की शुरुआत दिल्ली के भागीरथ पैलेस क्षेत्र में संदिग्ध एंटी रैबीज वैक्सीन की बरामदगी से हुई। जांच के दौरान संबंधित वैक्सीन के निर्माता इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड ने बरामद नमूनों को अपनी निर्मित वैक्सीन नहीं बताया। इसके बाद दिल्ली की जांच एजेंसियों ने वैक्सीन की सप्लाई चेन खंगालनी शुरू की। जांच में सप्लाई का एक सिरा कानपुर तक पहुंचा।
इसके बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम ने कानपुर पहुंचकर बिरहाना रोड स्थित न्यू आरजे एजेंसी से जुड़े लोगों से पूछताछ की। इसी दौरान स्थानीय औषधि विभाग ने भी संबंधित फर्मों के दस्तावेजों और खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड की जांच शुरू कर दी।
न्यू आरजे एजेंसी के रिकॉर्ड में सामने आई बड़ी जानकारी
औषधि विभाग की जांच में न्यू आरजे एजेंसी के रिकॉर्ड में अभयरैब वैक्सीन की खरीद और बिक्री से संबंधित जानकारी मिली। रिपोर्ट के मुताबिक फर्म के दस्तावेजों में 1,859 वायल की खरीद और 1,798 वायल की बिक्री का रिकॉर्ड दर्ज था। वहीं, 61 वायल का संतोषजनक हिसाब नहीं मिल सका। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि संदिग्ध वैक्सीन की आपूर्ति किन-किन स्थानों तक हुई थी।
इससे पहले औषधि विभाग की कार्रवाई के दौरान न्यू आरजे एजेंसी और दूसरी संबंधित फर्म को सील किया गया था। विभाग ने खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेजों को भी जांच के दायरे में लिया।
बिल को लेकर दोनों पक्षों के बयान अलग
जांच के दौरान न्यू आरजे एजेंसी और एलिक्सिर क्योर के बीच दवा की खरीद को लेकर बयानों में अंतर सामने आया। न्यू आरजे एजेंसी की ओर से बताया गया कि संदिग्ध वैक्सीन एलिक्सिर क्योर से खरीदी गई थी। वहीं, एलिक्सिर क्योर के संचालक तरनदीप सिंह ने जांच के दौरान इन बिलों से खुद को अलग बताया।
हालांकि, इसके बाद जांच में एक महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य सामने आया। न्यू आरजे एजेंसी से जुड़े राजिंदर सिंह ने अपने मोबाइल फोन में तरनदीप सिंह के साथ हुई व्हाट्सऐप बातचीत जांच अधिकारियों को दिखाई। रिपोर्ट के अनुसार चैट में इनवॉयस से संबंधित बातचीत सामने आई, जिसके बाद अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों और डिजिटल जानकारी का मिलान शुरू किया।
व्हाट्सऐप चैट से बढ़ा जांच का दायरा
जांच अधिकारियों के लिए व्हाट्सऐप चैट इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि इसमें बिल और खरीद से संबंधित बातचीत के संकेत मिले। इसके बाद संबंधित मोबाइल नंबर पर अधिकारियों ने संपर्क किया। जांच के दौरान सामने आए बयानों और दस्तावेजों के बीच अंतर को देखते हुए औषधि विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया।
दरअसल, एक ही खरीद-बिक्री को लेकर दोनों फर्मों के दस्तावेजों में अलग-अलग जानकारी सामने आने से जांच का दायरा बढ़ गया। अब अधिकारियों की नजर इस बात पर है कि संदिग्ध वैक्सीन की सप्लाई चेन कहां से शुरू हुई और किन-किन कारोबारियों के माध्यम से आगे पहुंची।
592 वायल की भी हुई जांच
कानपुर की न्यू आरजे एजेंसी से संबंधित जांच में 592 वायल मिलने की जानकारी भी सामने आई है। औषधि विभाग ने इनमें से नमूने जांच के लिए भेजे हैं, जबकि शेष वायल को सीज कर सुरक्षित रखा गया है।
इसके अलावा, खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड में आगरा समेत अन्य स्थानों पर वैक्सीन की आपूर्ति का विवरण भी जांच के दौरान सामने आया। अधिकारियों द्वारा अब यह पता लगाया जा रहा है कि संबंधित बैच की कितनी वायल बाजार में पहुंचीं और उनका वास्तविक वितरण कहां-कहां हुआ।
तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर
मामले में औषधि निरीक्षक देवयानी दुबे की तहरीर पर कलक्टरगंज थाने में न्यू आरजे एजेंसी की प्रोपराइटर बलजीत कौर, राजिंदर सिंह और एलिक्सिर क्योर के संचालक तरनदीप सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस और औषधि विभाग दस्तावेजों, खरीद-बिक्री रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की जांच कर रहे हैं।
इस मामले में प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली में संदिग्ध नकली एंटी रैबीज वैक्सीन पकड़े जाने के बाद कानपुर में भी जांच की गई थी। जांच के बाद उपलब्ध तथ्यों के आधार पर एफआईआर दर्ज कराई गई है।
आगे और फर्मों की हो सकती है जांच
कानपुर के थोक दवा बाजार से जुड़े इस मामले में जांच का दायरा आगे बढ़ सकता है। औषधि विभाग पहले ही संबंधित फर्मों के रिकॉर्ड की जांच कर चुका है और अन्य मेडिकल स्टोरों तक संदिग्ध वैक्सीन की सप्लाई की संभावना भी खंगाली जा रही है।
वहीं, नकली या संदिग्ध दवाओं की पहचान के लिए नियामक एजेंसियां नमूनों की जांच और दस्तावेजों के सत्यापन पर जोर दे रही हैं। ऐसे में जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस नेटवर्क में कितने कारोबारी जुड़े थे और संदिग्ध वैक्सीन की वास्तविक सप्लाई कितने क्षेत्रों तक हुई।
कानपुर में सामने आया यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एंटी रैबीज वैक्सीन का उपयोग रेबीज से बचाव के लिए किया जाता है। ऐसे में दवा की गुणवत्ता और उसकी आपूर्ति की प्रमाणिकता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। फिलहाल पुलिस और औषधि विभाग की जांच जारी है और आगे की कार्रवाई जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर की जाएगी।

