पढ़िए गया तीर्थ की कथा: जानिए गयासुर से लेकर विष्णुपद मंदिर और पिंडदान की परंपरा तक का रहस्य
Digital UP News
गया तीर्थ को सनातन परंपरा में पितरों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। बिहार के गया में स्थित यह पवित्र क्षेत्र धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ प्राचीन कथाओं और परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गया तीर्थ की महत्ता की कथा गयासुर और भगवान विष्णु से जुड़ी हुई है।
कैसे हुई गयासुर की उत्पत्ति?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब ब्रह्माजी सृष्टि की रचना कर रहे थे, उसी दौरान असुर कुल में गया नामक असुर की उत्पत्ति हुई। हालांकि, अन्य असुरों के विपरीत गया के स्वभाव में आसुरी प्रवृत्तियां नहीं थीं। वह देवताओं का सम्मान करता था और भगवान की आराधना में विश्वास रखता था।
इसके बावजूद उसके मन में यह विचार रहता था कि असुर कुल में जन्म लेने के कारण उसे समाज और देवताओं के बीच वह सम्मान नहीं मिलेगा, जिसका वह अधिकारी बनना चाहता है। इसलिए उसने कठोर तपस्या करके पुण्य अर्जित करने का संकल्प लिया।
भगवान विष्णु से मिला वरदान
गयासुर की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उसके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब गयासुर ने ऐसी इच्छा व्यक्त की, जिसका संबंध केवल उसके अपने कल्याण से नहीं, बल्कि दूसरे जीवों के कल्याण से भी था।
गयासुर ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उसके शरीर में निवास करें और जो भी व्यक्ति उसे देखे, उसके पाप नष्ट हो जाएं तथा उसे पुण्य की प्राप्ति हो।
भगवान विष्णु ने उसे वरदान प्रदान किया। इसके बाद गयासुर जहां भी जाता, उसके दर्शन मात्र से लोगों के पाप दूर होने की मान्यता बनने लगी। परिणामस्वरूप अनेक लोग मृत्यु के बाद स्वर्ग के अधिकारी होने लगे।
यमराज के सामने खड़ी हुई समस्या
पौराणिक मान्यता के अनुसार, गयासुर के इस वरदान से यमराज की व्यवस्था प्रभावित होने लगी। जिन लोगों ने जीवन में पाप किए थे, वे भी यदि गयासुर के दर्शन कर लेते तो उनके पाप समाप्त हो जाते।
ऐसे में कर्मों के अनुसार मिलने वाले फल की व्यवस्था प्रभावित होने लगी। यमराज ने ब्रह्माजी से इस विषय में समाधान करने का आग्रह किया। इसके बाद ब्रह्माजी ने गयासुर को रोकने के लिए एक उपाय सोचा।
गयासुर की पीठ पर हुआ यज्ञ
ब्रह्माजी ने गयासुर से कहा कि उसका शरीर अत्यंत पवित्र है और वे उसकी पीठ पर सभी देवताओं के साथ यज्ञ करना चाहते हैं। गयासुर ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।
इसके बाद ब्रह्माजी और अन्य देवता उसकी पीठ पर बैठ गए। मान्यता के अनुसार, देवताओं के बैठने के बावजूद गयासुर अचल नहीं हुआ। तब देवताओं ने विचार किया कि जिस भगवान विष्णु के वरदान से गयासुर को इतनी शक्ति मिली है, यदि स्वयं भगवान विष्णु भी उसके शरीर पर विराजमान हो जाएं तो वह स्थिर हो सकता है।
इसके बाद भगवान विष्णु भी वहां पहुंचे और गयासुर के शरीर पर विराजमान हुए। भगवान को अपने शरीर पर देखकर गयासुर ने देवताओं और अपने आराध्य भगवान विष्णु की मर्यादा बनाए रखने के लिए स्वयं अचल होने का निर्णय लिया।
गयासुर ने मांगा लोककल्याण का वरदान
गयासुर ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे उसे पत्थर की शिला के रूप में स्थापित कर दें। भगवान विष्णु उसकी भावना से प्रसन्न हुए और उससे एक और वरदान मांगने को कहा।
तब गयासुर ने ऐसी इच्छा व्यक्त की, जिसे लोककल्याण से जोड़ा जाता है। उसने प्रार्थना की कि भगवान विष्णु सभी देवताओं के साथ इसी शिला पर अप्रत्यक्ष रूप से विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख तीर्थ बने।
भगवान विष्णु ने उसे आशीर्वाद दिया कि इस स्थान पर पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से उन्हें शांति और मुक्ति का लाभ प्राप्त होगा। इसी मान्यता के कारण यह क्षेत्र आगे चलकर गया तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
विष्णुपद मंदिर और भगवान विष्णु के चरण चिह्न
गया में स्थित विष्णुपद मंदिर इस धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहां एक शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न स्थापित हैं, जिन्हें श्रद्धालु भगवान के दिव्य स्वरूप से जोड़कर देखते हैं।
गया में पिंडदान और श्राद्ध की परंपरा के अंतर्गत फल्गु नदी के तट, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट का विशेष महत्व बताया जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने पितरों के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
पिंडदान की परंपरा कितनी प्राचीन है?
पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, इसकी कोई एक निश्चित ऐतिहासिक तिथि बताना कठिन है। हालांकि, गया की धार्मिक परंपराओं में इसे अत्यंत प्राचीन माना जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार, सतयुग में ब्रह्माजी द्वारा यहां पिंडदान किए जाने की मान्यता है।
इसके अलावा, महाभारत के वन पर्व में भी गया की यात्रा से संबंधित उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी अपने पिता महाराजा दशरथ के लिए गया में पिंडदान किया था।
गया की परंपराओं में यह भी बताया जाता है कि विभिन्न कालखंडों में अनेक राजा, विद्वान और संत यहां पिंडदान के लिए पहुंचे। मौर्य और गुप्त काल से जुड़ी परंपराओं के साथ-साथ कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस और चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों के गया आगमन का भी उल्लेख मिलता है।
आज भी जारी है धार्मिक परंपरा
आज भी गया देश के प्रमुख पितृतीर्थों में शामिल है। पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और विधि-विधान के साथ श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान करते हैं।
इस प्रकार, गया तीर्थ की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग तक सीमित नहीं है। यह परंपरा गयासुर की लोककल्याण की भावना, भगवान विष्णु के आशीर्वाद और पितरों के प्रति श्रद्धा से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि गया आज भी सनातन धार्मिक परंपरा में पितृकर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में अपना विशेष स्थान रखता है।

