कानपुर में फेसलेस सेवा के बावजूद आरटीओ के चक्कर काट रहे आवेदक, 17 दिन बाद मिली आरसी
रिपोर्ट- हरिशंकर शर्मा
कानपुर। परिवहन विभाग की सेवाओं को फेसलेस और ऑटो अप्रूवल व्यवस्था से जोड़कर आम लोगों को कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर से राहत देने की पहल की गई है। शासन की ओर से इसका उद्देश्य प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सरल और समयबद्ध बनाना है। हालांकि, कानपुर में एक वाहन स्वामी की शिकायत ने इस व्यवस्था के जमीनी क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आवेदक का आरोप है कि फेसलेस व्यवस्था लागू होने के बावजूद उसे अपने वाहन के पुनः पंजीयन यानी री-रजिस्ट्रेशन से जुड़े काम के लिए विभागीय कार्यालय के चक्कर लगाने पड़े।
मामला एक मोटरसाइकिल के पुनः पंजीयन से जुड़ा बताया जा रहा है। पीड़ित के अनुसार उसने अपने वाहन के आवश्यक दस्तावेज कनिष्ठ बाबू विनीता सिंह के पास 7 सितंबर 2026 को जमा किए थे। आवेदक का कहना है कि दस्तावेज जमा करने के बाद उसे तत्काल सेवा का लाभ नहीं मिल सका और करीब 17 दिन बाद आरसी उपलब्ध कराई गई। इस दौरान उसे अपने काम की स्थिति जानने और प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करने के लिए विभाग के चक्कर लगाने पड़े।
फेसलेस व्यवस्था पर उठे सवाल
परिवहन विभाग की फेसलेस सेवाओं का मूल उद्देश्य यही है कि आवेदकों को सामान्य प्रक्रियाओं के लिए बार-बार कार्यालय में उपस्थित न होना पड़े। इसके जरिए आवेदन, दस्तावेजों की जांच और स्वीकृति जैसी प्रक्रियाओं को डिजिटल माध्यम से पूरा करने की दिशा में कदम उठाया गया है। ऐसे में यदि किसी सेवा के लिए आवेदक को बार-बार कार्यालय जाना पड़े या उसे अपने आवेदन की स्थिति जानने के लिए कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़े, तो इससे फेसलेस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पीड़ित का आरोप है कि उसने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपने दस्तावेज जमा कर दिए थे, इसके बावजूद उसके मामले का निस्तारण समय से नहीं हुआ। उसका कहना है कि यदि सेवा को फेसलेस और ऑटो अप्रूवल व्यवस्था के तहत लाया गया है, तो फिर आवेदक को विभागीय कार्यालय में अनावश्यक रूप से उपस्थित होने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
14 अगस्त से कई सेवाओं में बदलाव
बताया गया है कि 14 अगस्त 2026 से परिवहन विभाग की कई सेवाओं को ऑटो अप्रूवल और फेसलेस व्यवस्था से जोड़ा गया है। इस व्यवस्था के पीछे शासन की मंशा नागरिकों को सुविधाजनक, पारदर्शी और कम समय में सेवाएं उपलब्ध कराने की है। डिजिटल व्यवस्था के विस्तार से लोगों को विभागीय कार्यालयों में लंबी कतारों और अनावश्यक भागदौड़ से राहत मिलने की उम्मीद की गई है।
हालांकि, कानपुर में सामने आया यह मामला इस बात की जांच की जरूरत बताता है कि नई व्यवस्था का पालन निचले स्तर तक किस तरह हो रहा है। खासकर ऐसे मामलों में जहां आवेदन और दस्तावेज निर्धारित प्रक्रिया के तहत जमा किए जा चुके हैं, वहां आवेदक को अनावश्यक रूप से कार्यालय बुलाए जाने या उसे लंबे समय तक इंतजार कराने की शिकायतों पर विभागीय स्तर से निगरानी जरूरी हो जाती है।
बाबुओं की कार्यप्रणाली पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। आवेदक का आरोप है कि दस्तावेज जमा करने के बावजूद उसकी फाइल का काम समय पर पूरा नहीं किया गया। इसके कारण उसे करीब 17 दिन तक इंतजार करना पड़ा। हालांकि, संबंधित कर्मचारी की ओर से इस मामले में क्या कारण बताया गया, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
फेसलेस व्यवस्था की सफलता केवल तकनीकी प्रणाली तैयार करने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी अनुपालन पर भी निर्भर करती है। यदि डिजिटल प्रक्रिया लागू होने के बाद भी आवेदकों को वही पुरानी प्रक्रिया से गुजरना पड़े, तो व्यवस्था के उद्देश्य पर असर पड़ सकता है। इसलिए आवेदन की समयसीमा, जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी और लंबित मामलों की नियमित समीक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।
एआरटीओ प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण
इस मामले में एआरटीओ प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विभागीय अधिकारियों के सामने यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है कि शासन की ओर से लागू की गई नई व्यवस्था का वास्तविक लाभ आम लोगों तक पहुंचे। साथ ही, यदि किसी कर्मचारी की कार्यप्रणाली के कारण आवेदकों को परेशानी हो रही है, तो शिकायत के आधार पर उसकी जांच और आवश्यक कार्रवाई की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
आवेदक के मामले में 7 सितंबर को दस्तावेज जमा किए जाने और 17 दिन बाद आरसी मिलने के दावे ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, पूरे मामले की वास्तविक स्थिति संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और अधिकारियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
पारदर्शिता के लिए निगरानी जरूरी
दरअसल, फेसलेस सेवाओं की अवधारणा का उद्देश्य ही नागरिक और विभागीय कर्मचारी के बीच अनावश्यक प्रत्यक्ष संपर्क को कम करना है। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और समय की बचत करने में मदद मिल सकती है। इसलिए जरूरी है कि ऑनलाइन व्यवस्था में आवेदन की स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाई दे और आवेदक को हर चरण की जानकारी डिजिटल माध्यम से मिलती रहे।
इसके अलावा, यदि किसी आवेदन में तकनीकी या दस्तावेज संबंधी कमी है तो उसकी सूचना भी समय रहते आवेदक को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे व्यक्ति को बार-बार कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

