आईएनएस त्रिशूल फ्रांस के टूलॉन पहुंचा, वरुण अभ्यास के 24वें संस्करण में लेगा हिस्सा
रिपोर्ट- अमित सिंह यादव
टूलॉन/फ्रांस। भारत और फ्रांस के बीच समुद्री सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में भारतीय नौसेना का युद्धपोत आईएनएस त्रिशूल 22 सितंबर 2026 को फ्रांस के टूलॉन पहुंच गया। भारतीय नौसेना और फ्रांसीसी नौसेना के बीच आयोजित होने वाले द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास ‘वरुण’ के 24वें संस्करण में आईएनएस त्रिशूल भाग लेगा। यह अभ्यास दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच लंबे समय से जारी रक्षा और समुद्री सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
‘वरुण’ अभ्यास के दौरान दोनों देशों की नौसेनाएं विभिन्न पेशेवर और परिचालन गतिविधियों में हिस्सा लेंगी। इस दौरान बंदरगाह तथा समुद्री क्षेत्र में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके अलावा दोनों नौसेनाओं के personnel को एक-दूसरे के अनुभवों, कार्यप्रणालियों और परिचालन प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलेगा। इससे दोनों देशों के बीच आपसी तालमेल को और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
टूलॉन पहुंचा आईएनएस त्रिशूल
भारतीय नौसेना का आईएनएस त्रिशूल 22 सितंबर को फ्रांस के टूलॉन पहुंचा। इसके साथ ही ‘वरुण’ अभ्यास के 24वें संस्करण में भारत की भागीदारी की औपचारिक शुरुआत हुई। फ्रांस के टूलॉन बंदरगाह पर भारतीय नौसेना के जहाज का पहुंचना दोनों देशों के बीच समुद्री संबंधों की निरंतरता को दर्शाता है।
दरअसल, भारत और फ्रांस के बीच रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से सहयोग चला आ रहा है। विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक प्रशिक्षण और परिचालन सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों की नौसेनाएं नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ संपर्क और अभ्यास करती रही हैं। ऐसे में ‘वरुण’ अभ्यास दोनों नौसेनाओं को संयुक्त रूप से अपनी क्षमताओं और प्रक्रियाओं को परखने का अवसर देता है।
क्रॉस-डेक विजिट से बढ़ेगी आपसी समझ
अभ्यास के दौरान क्रॉस-डेक विजिट भी आयोजित की जाएगी। इसके तहत दोनों देशों के नौसैनिक एक-दूसरे के युद्धपोतों का दौरा कर उनकी कार्यप्रणाली और संचालन व्यवस्था को करीब से समझ सकेंगे। इस तरह की गतिविधियां नौसैनिकों के बीच पेशेवर संवाद को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसके अलावा, दोनों पक्षों के बीच ऑपरेशनल बातचीत भी होगी। इन बातचीत के माध्यम से नौसैनिक अभियानों से जुड़े अनुभवों और बेहतर कार्य प्रणालियों को साझा करने का अवसर मिलेगा। परिणामस्वरूप, दोनों नौसेनाओं के बीच परिचालन स्तर पर समन्वय और समझ को और मजबूत किया जा सकेगा।
खेल-कूद गतिविधियां भी होंगी आयोजित
‘वरुण’ अभ्यास केवल सैन्य और परिचालन गतिविधियों तक सीमित नहीं रहेगा। कार्यक्रम के दौरान दोनों देशों के नौसैनिकों के बीच खेल-कूद से जुड़ी गतिविधियां भी आयोजित की जाएंगी। इन गतिविधियों का उद्देश्य दोनों देशों के personnel के बीच आपसी संपर्क और सौहार्द को बढ़ावा देना है।
इस प्रकार पेशेवर गतिविधियों के साथ-साथ अनौपचारिक संवाद के अवसर भी दोनों नौसेनाओं के बीच बेहतर संबंध विकसित करने में सहायक होंगे। साथ ही, इससे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले नौसैनिकों को एक-दूसरे की कार्य संस्कृति को समझने का अवसर मिलेगा।
इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाने पर जोर
‘वरुण’ अभ्यास का एक प्रमुख उद्देश्य दोनों नौसेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी परिचालन तालमेल को बढ़ाना है। आधुनिक समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग देशों की नौसेनाओं के बीच प्रभावी समन्वय महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे अभ्यासों के जरिए संयुक्त प्रक्रियाओं, संचार और परिचालन समन्वय को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है।
वहीं, नियमित संयुक्त अभ्यास दोनों पक्षों को अपनी कार्यप्रणालियों की समीक्षा करने और आवश्यकतानुसार उनमें सुधार करने का अवसर भी देते हैं। इस दौरान साझा अनुभवों से दोनों नौसेनाओं की पेशेवर समझ विकसित होती है।
भारत-फ्रांस समुद्री साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा
आईएनएस त्रिशूल का फ्रांस पहुंचना भारत और फ्रांस के बीच मजबूत समुद्री साझेदारी को भी रेखांकित करता है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग का दायरा समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों में विस्तृत हुआ है। समुद्री क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास और नौसैनिक आदान-प्रदान इस सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इसके साथ ही, दोनों देशों के बीच नियमित नौसैनिक गतिविधियां आपसी विश्वास को मजबूत करने में भी योगदान देती हैं। ‘वरुण’ जैसे अभ्यासों के माध्यम से दोनों नौसेनाओं को साथ काम करने, अनुभव साझा करने और परिचालन प्रक्रियाओं को समझने का अवसर मिलता है।
समुद्री सहयोग के बढ़ते दायरे का संकेत
आईएनएस त्रिशूल की टूलॉन यात्रा को भारत और फ्रांस के बीच बढ़ते समुद्री सहयोग के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच नियमित संवाद और संयुक्त गतिविधियां समुद्री क्षेत्र में सहयोग को निरंतर आगे बढ़ाने में सहायक हैं।
अभ्यास के दौरान होने वाली विभिन्न गतिविधियों से दोनों पक्षों को अपनी क्षमताओं और कार्य प्रणालियों के बारे में बेहतर समझ हासिल होगी। साथ ही, इससे भविष्य में समुद्री सहयोग के नए अवसरों के लिए भी आधार तैयार हो सकता है।

